भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

बढ़ते गये। इन्द्र ने क्रोधित होकर इन पर अपने वज्र का प्रहार किया जिसके कारण इनकी हड्डी टूटी हो गई तब से ही यह हनुमान कहलाये।

वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। वे आज्ञेय, महावीर तथा माक्षति के नाम से प्रसिद्ध हैं। वे सब से महान् वीर हैं। वे सात चिरंजीवियों में से एक हैं। वे ब्रह्मचर्य के साक्षर रूप हैं। वे ज्ञानी शिरोमणि हैं।

हनुमान को अग्निमा, लघिमा, गरिमा आदि सारी सिद्धियां प्राप्त थीं। श्री राम ने भी इनको ही सीता की खोज के लिए अपना दूत चुना।

समुद्र लांघ कर लंका पहुंचना सभी वानरों के लिये एक महान् समस्या थी। जाम्बवन्त के द्वारा प्रेरित होकर हनुमान लंका-यात्रा के लिए कटिबद्ध हो गये। उन्होंने सवों में आशा तथा साहस का संचार करते हुये ये शब्द कहे—“मैं उस वार्य का पुत्र हूँ जो पर्वतों को ध्वस्त कर देता है। मैं मेघ पर्वत की सहस्र बार परिक्रमा कर सकता हूँ। मैं सारे समुद्र की सोख सकता हूँ। समुद्र को उलांच सकता हूँ। मैं पर्वतों को ध्वस्त कर सकता हूँ तथा सूर्य और चन्द्रमा का अतिक्रमण कर सकता हूँ।”

इस प्रकार से गर्जन करते हुए हनुमान लंका को पधारे। रास्ते में नागों की जननी सुरसा ने उनके बल, वीर्य, कौशल तथा ज्ञान की परीक्षा की। हनुमान सफल निकले।

लंका में जाकर सीता को उन्होंने राम-श्रृंगट्टी दी। लंका-दहन किया तथा सन्देश लेकर वानरों को प्रसन्न करते हुए श्री राम के पास लौट आए। उन्होंने श्री सीता जी की चूड़ामणि श्री राम को प्रदान की।