भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मस्य साधना

भोजन न कीजिये जो पेट में जाकर कब्ज आदि को पैदा करते हों तथा शरीर में गर्मी पैदा करते हों। उत्तेजक आहारों का त्याग कीजिये। ताजे फल, मेवा, तथा दूध, तथा सात्विक भोजन ब्रह्मचर्य के अनुकूल हैं। अच्छा स्वास्थ्य रखने के लिए ही भोजन कीजिये। स्वाद के लिये कभी भी भोजन न कीजिए। धीरे धीरे खाइए तथा खूब चवाकर खाइए।

३. विचारः—विपरीत लिंग के विषयमें न लोजिए। लैंगिक विचारों को रोककर मन को दिव्य, शुद्ध तथा ईश्वरीय विचारों से पूर्णतः भर डालिए। मन को पूर्णतः 'लमरखिए। सदा ही अपने शरीर तथा मन को किसी न किसी उपयोगी काम में लगाए रखिए। दिलचस्पी लीजिए तथा अपने काम में 'सुख का अनुभव कीजिए। भीष्म, हनुमान आदि अखण्ड-ब्रह्मचारियों का चिन्तन कीजिए तथा उनके द्वारा प्रेरणा ग्रहण कीजिए। अलिंग आत्मा से तादात्म्य सम्बन्ध स्थापित कीजिए। आत्मा में लिंग नहीं, सदा जग कीजिए—“ओ३म् अखण्ड सन्निदानन्द आत्मा”। विचार का अभ्यास कीजिए। अपने मन में यह बात अच्छी तरह से जमा लीजिए कि विषय भोग तथा लैंगिक सुख विषाक्त हैं, आमक हैं, मिस्र्या तथा दुखद हैं। ब्रह्मचर्य में कभी ही जीवन में बहुत से रोगों तथा क्लेशों का कारण बन जाता है। ऐसा भाव रखिए कि सभी लिंगों मातेश्वरी की ही स्वरूप हैं। उनको मानसिक नमस्कार कीजिए। मन ही मन उनको नमस्कार कीजिए तथा माता समझिए। मानसिक जप कीजिए। “ओ३म् दुर्गायै नमः।” लिंगों के चरणों की ओर देखिए। थोड़ा मिलिए। जब बहुत आचर्यक हो तो बहुत श्र्लय