ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
६. ईश्वर की भक्ति तथा ईश्वरार्पण आपको ब्रह्मचर्य की साधना में मद्दायता देगा जप, कीर्तन, स्वाध्याय, प्रार्थना, मन्त्रगन्थों का अध्ययन—ये सब कामुक विचारों को विनष्ट कर डालेंगे। ईश्वर के प्रति गम्भीर भक्ति का विकास कीजिए। नित्य प्रति उसकी कृपा के लिए प्रार्थना कीजिये। ईश्वर के प्रेम में वृद्धि लाइये। तब निम्न विषे स्वतः ही दूर हो जायेंगे। जितना भी संभव हो सके ईश्वर के नाम का जप कीजिये। प्रातः चार बजे उठकर जप तथा ध्यान का अभ्यास कीजिए। रात्रि को भी ऐसा कीजिए। ईश्वर की भक्ति के द्वारा आप आसानी से कामुक शक्ति को श्रोजस् में रूपांतरित कर सकते हैं।
७. सिनेमा, उपन्यास, अखबार, बेकार की गपशप तथा कुसंग का परित्याग कीजिए। केवल प्रेरणात्मक आध्यात्मिक पुस्तकों का स्वाध्याय कीजिये। सत्संग कीजिये। आध्यात्मिक जीवन बिताइये। सदा कौषीन या लंगोटी को पहनिये। जब तक आप ब्रह्मचर्य में संस्थित न हों तब तक सतत प्रयास की आवश्यकता है। सदा सावधान रहिये। जब आप अपने संकल्प पालन में विफल हों स्वयं को दण्डित कीजिये। गन्नि का आहार त्यागिये। अधिकाधिक जप कीजिये—यही दंड है।
८. केवल शुभ वस्तुओं को ही देखिये। शुभ बातों का श्रवण कीजिये। केवल शुभ विचारों को ही मन में आने दीजिये। सारे गन्दे दृश्य, संगीत तथा वार्तालाप का त्याग कीजिये।
९. ब्रह्मचर्य के आठ खंडनों का परित्याग कीजिये। (अ) दर्शन : (विपरीत लिंग के व्यक्ति को कामुक दृष्टि से देखना)।