ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य संबंधी तीन प्रेरणात्मक पत्र
१—ब्रह्मचर्य का अभ्यास
ईश्वर की भक्ति का विकास कीजिये तथा उसकी कृपा प्राप्त कीजिये। उसके लिये अपनी पिपासा को बढ़ाइये। इससे सारे निम्न आकर्षण नष्ट हो जायेंगे।
विचार का अभ्यास कीजिये। विषय-जीवन से दुरा, विपत्ति तथा रोग पैदा होते हैं। ब्रह्मचर्य के द्वारा अमृतत्व, शान्ति, बल, स्वास्थ्य, दीर्घायु, स्मरण शक्ति, संकल्प शक्ति आदि की प्राप्ति होती है। आत्मा सदा लिंग रहित है। इसके याद रखिये।
चार बजे प्रातः उठिये। ध्यान, जप, कीर्तन, प्रार्थना तथा गीता जैसे प्रेरणात्मक ग्रन्थों का स्वाध्याय कीजिये। मन को शुद्ध विचारों के द्वारा भर दीजिये।
सत्संग कीजिये। सिनेमा, उपन्यास तथा सारे प्रकार की कुर्बगति का परित्याग कीजिये। शीर्षासन, सर्वांगासन, सिद्धासन, उड्डियान बन्ध का अभ्यास कीजिये। शरीर तथा मन को सदा किसी न किसी उपयोगी कार्य में लगाये रखिये। अपने कार्य में सदा दिलचस्पी लीजिये। सात्विक आहार कीजिये। मिताहार कीजिये। समय समय पर उपवास कीजिये। ऐसा भाव रखिये कि सारी जियाँ आपकी माता हैं। या जगन्माता की स्वरूप हैं। उनको मानसिक नमस्कार कीजिये। उनके साथ अधिक न मिलिये।
जब सौंदर्य मन को अक्रुष्ट करे तो उस ईश्वर की याद कीजिए जो कि उस सौंदर्य का स्रष्टा है। शुद्धता का चिंतन कीजिये।
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