भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य सम्बन्धी तीन प्रेरणात्मक पत्र २१६

सदा कौपीन या लंगोट पहनिये । भावना कीजिये “मैं नित्यप्रति अधिकाधिक शुद्ध बनता जा रहा हूँ ।” भीष्म, हनुमान आदि अखंड ब्रह्मचारियों के जीवन की याद रखिये । आप बल तथा प्रेरणा को प्राप्त करेंगे ।

सरल जीवन बिताइए । विलासिता का परित्याग कीजिए । जब तक आप ब्रह्मचर्य में संस्थित न हो जाय तब तक आपको सतत तथा उग्र प्रयास करने की आवश्यकता है ।

ईश्वर आपको शुद्धता तथा भक्ति से परिपूर्ण बनावे ।

आपका निजस्वरूप —स्वामी शिवानन्द

२.—ब्रह्मचय का अभ्यास

ईश्वर-सन्तान,

यदि आप मन को ध्यान, जप, प्रार्थना, सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय तथा विचार में लगाए रखें तो काम-वासना कमजोर पड़ जायगी । (जप आदि) नियमित साधना के द्वारा मन शुद्ध बन जाता है । विषयों का चिंतन न कीजिए । इन्द्रियों का दमन तथा मन शमन दोनों का अभ्यास एक ही साथ किया जाना चाहिये । मन पर दोनों ओर से आक्रमण करना चाहिए । वाहर से इन्द्रियों का दमन भीतर से कामनाओं का उन्मूलन । तब आपका मन शीघ्र ही वश में हो जायगा ।

ब्रह्मचर्य के अभ्यास के द्वारा मनुष्य अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करता है । काम-वृत्ति अत्यन्त शक्तिशाली है । इसको वश में लाने के लिए उग्र साधना की आवश्यकता