भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

१६

ब्रह्मचर्य साधना

उत्तम स्वास्थ्य, शारीरिक बल और मानसिक शक्ति के रक्षण में सहायक हैं। वास्तव में स्वास्थ्य और बल प्राप्त करने के अनेक विधान हैं। ये विधान निश्चयात्मक अत्यन्त आवश्यक हैं। परन्तु इन सब में ब्रह्मचर्य सर्वश्रेष्ठ है। ब्रह्मचर्य के बिना आपके सब व्यायाम निरर्थक हैं। स्वास्थ्य और आनन्द के राज्य-द्वार को खोलने के लिए ब्रह्मचर्य एक मात्र कुञ्जी है। वह परम कल्याण और आनन्द रूपी भवन की नींव है। वह वास्तविक मनुष्यत्व की रक्षा करने वाली एक मात्र उत्तम वस्तु है। वीर्य (प्राण शक्ति) जो आपके जीवन का आधार है, जो प्रार्थों का प्राण है, जो आपके सुन्दर कपोलों में और चमकीले नेत्रों में प्रकाशित होता है, आपके लिए एक वास्तविक निधि है। इस बात का अच्छी तरह से स्मरण रखिए। जीवन के इस सार-भूत तत्व का महत्व तथा इसकी आवश्यकता को पूर्ण रूप से समझिए। वीर्य ही पूर्ण शक्ति है। वीर्य ही परम धन है। वीर्य ही ईश्वर है। वीर्य ही गति-युक्त ईश्वर है। वीर्य ही इच्छा-शक्ति संचालक है। वीर्य ही आत्म-बल है। वीर्य ही ईश्वर की विभूति है। गीता में कहा है—“पौरुषम् शुभु” मनुष्यों में मैं पौरुषत्व अर्थात् संतान उत्पन्न करने की शक्ति हूँ। वीर्य विचार, बुद्धि और ज्ञान का सार तत्व है।

ब्रह्मचर्य से मनुष्य की मानसिक शक्ति अधिक बढ़ती है। मानसिक शक्ति शारीरिक बल से कोई अधिक श्रेष्ठ है। महात्मा गांधी जी को लीजिए। शरीर से तो वे बड़े दुबले पतले थे परन्तु उनका तीव्र बुद्धि-बल वक्ता की प्रशंसनीय था। वह केवल उनके ब्रह्मचर्य के ही कारण था।