भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य का तात्पर्य

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ब्रह्मचर्य मोक्ष का आधार है। यदि आधार हट नहीं है तो अधिक वर्षा में सकान गिर जायगा। ठीक इसी प्रकार यदि आप ब्रह्मचर्य में स्थित नहीं है और यदि आप का मन कुसित विचारों से चलायमान हो जाता है तो आप का पतन हो जायगा। आप निर्विकल्प समाधि—जो योग रूपी नियन्त्रण की शिक्षा है, को नहीं प्राप्त कर सकते।

श्रुति का वचन है “नायमात्मा बलहीनेन लभ्य”—यह आत्मा निर्वल व्यक्ति के द्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता। गीता का कथन है “वदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरति”—जो उस ब्रह्म को प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें ब्रह्मचर्य का आचरण करना चाहिए। गीता अध्याय ८, श्लोक ११, “त्रिविधं नधस्थेदं द्वारं नाशनमात्मनः; कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतन्नर्थं त्यजेत्”—अर्थात् हे अर्जुन ! काम, क्रोध और लोभ ये नर्क के तीन द्वार हैं अतः तू इन तीनों का त्याग कर। गीता अध्याय १६, श्लोक २१।

श्री लंवीचस का कथन है कि जो मनुष्य कामुकता या मैथुन से अपवित्र है, उसकी प्रार्थना देवतागण नहीं सुनते। इस्लाम धर्म के अनुसार भी जब मनुष्य हज करने के लिए मक्का जाता है तो उसके लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है। यहूदी धर्म परिपद् के अनुसार भी देव मन्दिर में प्रवेश करने तथा देव दर्शन के पूर्व ब्रह्मचर्य रूपी पवित्रता की आवश्यकता है। प्राचीन भारत, मिश्र और यूनान देशों की धर्म-सम्प्रदाय के अनुसार भी भगवान के पूजन के पूर्व तथा पूजन के समय मनुष्य के लिए ब्रह्मचर्य रूपी पवित्रता, अनिवार्य है। ईसाई धर्म में भी ठीक ऐसा ही है, नामकरण संस्कारादि धर्म-कार्यों में इस पवित्रता की