भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

आवश्यकता है।

इसाई धर्म का सर्वोच्च आदर्श यही पवित्रता थी। ईसाई धर्म के पादार्थों ने भी ब्रह्मचर्य की विशेष प्रशंसा की उन्होंने विवाह प्रणाली को तो अमुल्य ही माना और वह भी केवल उन लोगों के लिए जो कि ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने में असमर्थ थे। यूतान के पादरी सर्वदा ब्रह्मचारी होते हैं; उनका चुनाव योगी संन्यासियों में से ही किया जाता है।

जिम मनुष्य ने थोड़ा बहुत ही ब्रह्मचर्य का अभ्यास किया है, वह किसी भी प्रकार की व्याधि क्यों न हो उसे बहुत सुगमता से हटा देगा। यदि किसी साधारण मनुष्य को ठीक होने में एक माह की आवश्यकता है, तो वह केवल एक ही सप्ताह में पूर्ण स्वस्थ हो जायगा।

ब्रह्मचर्य के अभ्यास से शक्ति प्राप्त होती है। पूर्ण मानसिक और शारीरिक ब्रह्मचर्य के द्वारा योगी सिद्धि (पूर्णता) प्राप्त करता है। उससे वह आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ होता है। जब पवित्रता रहती है, तो मन की बुत्तियों का अपव्यय नहीं होता। मन की एकाग्रता सुगम हो जाती है। मन की एकाग्रता और पवित्रता साथ-साथ रहती हैं। यद्यपि साधु या शास्त्री अत्यन्त कम भाषण करता है, तथापि सुनने वालों के मन पर उसका विशिष्ट प्रभाव पड़ता है। इसका कारण उसकी श्रोत्र शक्ति है, जो उसने वीर्य की रक्षा तथा उसकी शुद्धि के द्वारा प्राप्त की है।

ब्रह्मचर्य के अभ्यास से उत्तम स्वास्थ्य, अन्तः शक्ति, मन की शान्ति, और दीर्घायु प्राप्त होती है। वह मन