ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
ब्रह्मचर्य का तात्पर्य
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ब्रह्मचर्य मोक्ष का आधार है। यदि आधार हट नहीं है तो अधिक वर्षा में सकान गिर जायगा। ठीक इसी प्रकार यदि आप ब्रह्मचर्य में स्थित नहीं है और यदि आप का मन कुसित विचारों से चलायमान हो जाता है तो आप का पतन हो जायगा। आप निर्विकल्प समाधि—जो योग रूपी नियन्त्रण की शिक्षा है, को नहीं प्राप्त कर सकते।
श्रुति का वचन है “नायमात्मा बलहीनेन लभ्य”—यह आत्मा निर्वल व्यक्ति के द्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता। गीता का कथन है “वदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरति”—जो उस ब्रह्म को प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें ब्रह्मचर्य का आचरण करना चाहिए। गीता अध्याय ८, श्लोक ११, “त्रिविधं नधस्थेदं द्वारं नाशनमात्मनः; कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतन्नर्थं त्यजेत्”—अर्थात् हे अर्जुन ! काम, क्रोध और लोभ ये नर्क के तीन द्वार हैं अतः तू इन तीनों का त्याग कर। गीता अध्याय १६, श्लोक २१।
श्री लंवीचस का कथन है कि जो मनुष्य कामुकता या मैथुन से अपवित्र है, उसकी प्रार्थना देवतागण नहीं सुनते। इस्लाम धर्म के अनुसार भी जब मनुष्य हज करने के लिए मक्का जाता है तो उसके लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है। यहूदी धर्म परिपद् के अनुसार भी देव मन्दिर में प्रवेश करने तथा देव दर्शन के पूर्व ब्रह्मचर्य रूपी पवित्रता की आवश्यकता है। प्राचीन भारत, मिश्र और यूनान देशों की धर्म-सम्प्रदाय के अनुसार भी भगवान के पूजन के पूर्व तथा पूजन के समय मनुष्य के लिए ब्रह्मचर्य रूपी पवित्रता, अनिवार्य है। ईसाई धर्म में भी ठीक ऐसा ही है, नामकरण संस्कारादि धर्म-कार्यों में इस पवित्रता की
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ब्रह्मचर्य साधना
आवश्यकता है।
इसाई धर्म का सर्वोच्च आदर्श यही पवित्रता थी। ईसाई धर्म के पादार्थों ने भी ब्रह्मचर्य की विशेष प्रशंसा की उन्होंने विवाह प्रणाली को तो अमुल्य ही माना और वह भी केवल उन लोगों के लिए जो कि ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने में असमर्थ थे। यूतान के पादरी सर्वदा ब्रह्मचारी होते हैं; उनका चुनाव योगी संन्यासियों में से ही किया जाता है।
जिम मनुष्य ने थोड़ा बहुत ही ब्रह्मचर्य का अभ्यास किया है, वह किसी भी प्रकार की व्याधि क्यों न हो उसे बहुत सुगमता से हटा देगा। यदि किसी साधारण मनुष्य को ठीक होने में एक माह की आवश्यकता है, तो वह केवल एक ही सप्ताह में पूर्ण स्वस्थ हो जायगा।
ब्रह्मचर्य के अभ्यास से शक्ति प्राप्त होती है। पूर्ण मानसिक और शारीरिक ब्रह्मचर्य के द्वारा योगी सिद्धि (पूर्णता) प्राप्त करता है। उससे वह आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ होता है। जब पवित्रता रहती है, तो मन की बुत्तियों का अपव्यय नहीं होता। मन की एकाग्रता सुगम हो जाती है। मन की एकाग्रता और पवित्रता साथ-साथ रहती हैं। यद्यपि साधु या शास्त्री अत्यन्त कम भाषण करता है, तथापि सुनने वालों के मन पर उसका विशिष्ट प्रभाव पड़ता है। इसका कारण उसकी श्रोत्र शक्ति है, जो उसने वीर्य की रक्षा तथा उसकी शुद्धि के द्वारा प्राप्त की है।
ब्रह्मचर्य के अभ्यास से उत्तम स्वास्थ्य, अन्तः शक्ति, मन की शान्ति, और दीर्घायु प्राप्त होती है। वह मन
ब्रह्मचर्य का महत्व
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और मांस पेशियों को पुष्ट करता है। वह शारीरिक और मानसिक शक्ति को सुरक्षित रखने में सहायता प्रदान करता है। वह साहस और प्राण शक्ति की वृद्धि करता है। वह मनुष्य को दैनिक जीवन-संग्राम में कठिनाइयों का सामना करने के लिए बल प्रदान करता है, अखंड ब्रह्मचारी सारे संसार को चलायमान कर सकता है, वह महात्मा ज्ञानदेव की भांति प्रकृति और पंचमहाभूतों पर शासन कर सकता है।
ऐ मेरे प्रिय मित्रों! क्या आपने ब्रह्मचर्य की आवश्यकता को समझ लिया है? क्या आपने उसके वास्तविक अभिप्राय और महत्व को भली प्रकार जान लिया है? जो शक्ति आप अनेक साधनों द्वारा बड़ी कठिनाई व प्रयत्न के साथ प्राप्त करते हैं, वह शक्ति यदि नित्य नष्ट कर दी जाय, तो फिर आप किस प्रकार से बलवान और स्वस्थ रहने की आशा कर सकते हैं? जब तक पुरुष और स्त्रियां, बालक और बालिकायें सब ब्रह्मचर्य व्रत का भरसक पालन नहीं करेंगे तब तक बलवान और स्वस्थ बनना उनके लिए असंभव है।
ब्रह्मचर्य का महत्व
स्वर रहित कोई भी भाषा नहीं हो सकती। विना टाट, दीवार या अन्य आधार के आप चित्र नहीं खींच सकते। ठीक इसी प्रकार आप विना ब्रह्मचर्य के उत्तम स्वास्थ्य और आध्यात्मिक जीवन नहीं प्राप्त कर सकते। ब्रह्मचर्य में भौतिक और आध्यात्मिक उत्पत्ति प्राप्त होती है। ब्रह्मचर्य ग्रहण प्राप्त करने का मूल कारण है। वह शुद्ध
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शांतिमय आध्यात्मिक जीवन तथा ज्ञान का आधार है। जिस ब्रह्म-निद्रा की आकांक्षा संत, जिज्ञासु और योगाभ्यासी साधक करते हैं, उसका ब्रह्मचर्य ही एक अवलंबन है। वह हमारे काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि आंतरिक शत्रुओं के साथ युद्ध करने के लिए एक अमोघ शस्त्र है। वह परम सुख, अखंड और अविनाशी आनन्द का देने वाला है। बड़े-बड़े ऋषि, देवता, गंधर्व आदि भी नैष्ठिक ब्रह्मचारी के चरणों की सेवा करते हैं। केवल इस ब्रह्मचर्य की शक्ति के द्वारा ही मनुष्य सुषुम्ना के द्वार को खोल कर कुण्डलिली शक्ति का उत्थान करता है। आठ सिद्धियाँ और नव निधियाँ तो ब्रह्मचारी के चरणों में रमण करती हैं तथा उसकी आशा का पालन करने के लिए सदा उद्यत रहती हैं। यम भी ब्रह्मचारी से दूर भागता है। वास्तविक ब्रह्मचारी के गौरव, महत्व और प्रभुता का कौन वर्णन कर सकता है !
अर्जुन एक वीर योद्धा था, परन्तु रणक्षेत्र में उसने भी क्षिप्रि होकर शस्त्र त्याग दिया। उस समय भगवान् श्री कृष्ण ने किस प्रकार स्थिर और शांत चित्त होकर अर्जुन को गीता के सिद्धांतों का उपदेश दिया। यह उनके ब्रह्मचर्य की शक्ति का कारण था।
भीष्म पितामह के कानों को देखिए उनमें दिव्य शक्तियाँ थीं वे अपनी कनिष्ठ अंगुली के द्वारा संसार को हिला सकते थे। उन्होंने जीवन पर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करने का संकल्प किया। उनका प्रथम नाम देवव्रत था; परन्तु 'देवताओं ने उन्हें 'भीष्म' (भयानक) नाम—'वया नाम तथा गुण' की लोकोक्ति के अनुसार—केवल
ब्रह्मचर्य का महत्व
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उनके गुणों ही के कारण दिया। उनमें इच्छा मृत्यु की शक्ति थी। इन्द्रजीत को यह वरदान था कि उसको केवल वही मनुष्य मार सकेगा जिसने कि पूरे १४ वर्षों तक सर्व प्रकार से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया हो—वह था लक्ष्मण जिसने इन्द्रजीत का अपने ब्रह्मचर्य के बल के द्वारा वध किया। विशाल पर्वत को उखाड़ कर ले आना तथा अन्य बड़े बड़े कार्यों का करना हनुमान के लिए कुछ भी नहीं था। यह सब ब्रह्मचर्य की शक्ति का प्रताप था।
“ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाध्वन्त”—बेदों की घोषणा है कि ब्रह्मचर्य और तप के द्वारा देवताओं ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की। हनुमान किस प्रकार महावीर हो गया? वह यह ब्रह्मचर्य रूपी शस्त्र ही था कि जिसके द्वारा उसने अतीत बल और साहस की प्राप्ति की। वह यही ब्रह्मचर्य रूपी शस्त्र था कि भीष्म पितामह ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की। वह यही आदर्श ब्रह्मचारी लक्ष्मण था कि जिसने तीनों लोकों को जीतने वाले महा शक्तिशाली रायण-पुत्र मेघनाथ को पराजित किया। राजाधिराज पृथ्वीराज की वीरता और महानता का कारण भी उसके ब्रह्मचर्य का बल ही था। तीनों लोकों में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो ब्रह्मचारी प्राप्त न कर सके। प्राचीन काल के महर्षिगण ब्रह्मचर्य के मूल्य को पूर्णतया समझते थे; यही कारण है कि उन्होंने ब्रह्मचर्य के महत्व की प्रशंसा सुन्दर सुन्दर छन्दों में वर्णन की है।
पुराणों के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि दूरदर्शिता और अलौकिक दृष्टि ब्रह्मचर्यों के प्रायः विशेष अधिकार हैं। श्री वेस्टर भेक का कहना है कि भ्रष्टता से पवित्रता
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का नाश होता है। रायो नेत्रो जाति में “शामन्त” : लिए ब्रह्मचर्य की आज्ञा केवल इसीलिए है कि उनका ऐसा विश्वास है कि कोई भी औषधि यदि किसी विद्याहित पुरुष के द्वारा दी गई है तो उसका प्रयोग फल-दायक नहीं हो सकता।
जिस प्रकार तेलवत्ती के द्वारा ऊपर की ओर गमन कर प्रकाश के साथ जलता रहता है, ठीक उसी प्रकार वीर्य भी योगाभ्यास के द्वारा ऊपर की ओर गमन कर अजोश शक्ति में परिवर्तित होता रहता है। इस नरतन रूपी शब्द में ब्रह्मचर्य एक चमत्कार होता हुआ दीपक है।
ब्रह्मचर्य जीवन रूपी एक पूर्ण विकसित पुष्प है जिसके चारों ओर बल, संतोष, ज्ञान, पवित्रता और धैर्य रूपी मधु-मखियां भनभनाती हुई विचरण करती हैं। या शूँ कहिए कि जो मनुष्य ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाला है वह उपरोक्त गुणों से संपन्न होगा। शास्त्रों की घोषणा है—“ब्रह्मचर्य के अभ्यास से आयु, तेज, बल, साहस, ज्ञान, धन, यश, पुण्य और प्रेम की वृद्धि होती है।”
ब्रह्मचर्य के द्वारा वृद्धि शुद्ध और तीव्र होती है। शक्ति और धैर्य की प्राप्ति होती है। ब्रह्मचारी तीनों लोकों का अधिपति होता है। ब्रह्मचर्य के बिना किसी प्रकार का योग या आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं। आत्मसाक्षात्कार के लिए ब्रह्मचर्य एक नितांत आवश्यक गुण है।
जिस मनुष्य के पास ब्रह्मचर्य रूपी शक्ति है, वह अमित शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कार्य कर सकता है। उसके वदन पर ब्रह्मतेज चमकता है। वह मित भाषण अथवा अपनी उपस्थिति मात्र से ही लोगों को प्रभावित
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कर सकता है। गांधी जी को देखिए। उन्होंने यह शक्ति, अहिंसा, सत्य और ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त की थी। उन्होंने केवल इसी शक्ति के द्वारा सारे संसार को प्रकंपित किया था।
यह कहना यथार्थ है कि एक सच्चे ब्रह्मचारी में अमिता बल शुद्ध मस्तिष्क, प्रबल इच्छाशक्ति, तीव्र बुद्धि, उत्तम विचार, धारणा और स्मरण शक्ति होती है। स्वामी दयानन्द ने अपनी इस शक्ति के द्वारा एक महाराजा की गाड़ी को रोक दिया। उन्होंने अपने हाथों से एक तलवार को तोड़ डाला। यह ब्रह्मचर्य का महत्व है। जीसस, शंकर, ज्ञान देव, समर्थ स्वामी रामदास तथा अन्य सभी आध्यात्मिक नेतागण ब्रह्मचारी थे।
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तीसरा अध्याय
आधुनिक शिक्षा
यदि आप आधुनिक शिक्षा-प्रणाली की हमारी प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के साथ तुलना करें तो आप को इन दोनों में बड़ा अन्तर मिलेगा। पहली बात तो यह है कि आधुनिक शिक्षा-प्रणाली अत्यधिक व्यय-शाली है। चरित्र निर्माण तथा धार्मिक शिक्षा का तो इसमें पूर्णतया अभाव ही है। गुरुकुल में प्रत्येक विद्यार्थी पवित्र होता था। प्रत्येक विद्यार्थी धार्मिक शिक्षा में निपुण होता था। प्राचीन ज्ञान व शिक्षा-प्रणाली का यह विशेष लक्षण था। प्रत्येक विद्यार्थी को प्राणायाम, मंत्र-योग, आसन, सदाचार-पद्धति, गीता, रामायण, महाभारत और उपनिषदों का ज्ञान होता था। प्रत्येक विद्यार्थी में विनय, आत्म संयम, आत्मा पालन, सेवा-भाव, आत्म-समर्पण, सद्-व्यवहार, नम्रता, दयालुता तथा मुमुक्षुत्व (आत्म-ज्ञान प्राप्त
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आधुनिक शिक्षा
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करने की शुभेच्छा) आदि गुणों का पूर्ण विकास रहता था।
आजकल कालेजों के विद्यार्थियों में इन सदुगुणों में से एक भी सदुगुण नहीं मिलता। आत्म-संयम किस चिड़िया का नाम है, यह तो वे जानते ही नहीं। विलासी जीवन और आत्म अनुकूलता तो उनमें बचपन ही से प्रारम्भ हो जाता है। अभिमान, धृष्टता और आज्ञा-भंग आदि दुर्गुण तो उनमें कूट-कूट कर भरे रहते हैं। वे पक्के नास्तिक और उग्र अनात्मवादी हो गए हैं। बहुतों को तो यह कहने में लज्जा प्रतीत होती है कि वे ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। ब्रह्मचर्य और आत्म-संयम का उनको तनिक भी ज्ञान नहीं है। सुन्दर आकर्षण पोशाक, अभ्रमच-भोजन, कुसंगति, नाटक सिनेमा देखना, तथा पाश्चात्य रहन सहन के कारण वे दुर्बल और कौधी हो गए हैं। ब्रह्मविद्या, आत्म-ज्ञान, आध्यात्मिक विद्या, वैराग्य, मोक्ष बन्धन, आत्मा की शांति तथा उसके आनंद से वे नितांत अनभिज्ञ हैं। चालढाल, लोकव्यवहार, विप्यासक्ति, लोलुपता तथा विलासिता ने उनके भीतर घर कर लिया है। कालेज के कुछ एक विद्यार्थियों की जीवन-कहानी यदि आप सुनें तो आपको अत्यन्त कष्ट उत्पन्न होगी। गुरुकुल में छात्र-गण आरोग्य, बलवान और दीर्घजीवी होते थे। बंगाल के स्वास्थ्य विभाग अधिकारियों की विज्ञति के अनुसार कलकत्ता और ढाका में ७५ फी सदी विद्यार्थी अस्वस्थ हैं तथा कर्बई स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की विज्ञति के अनुसार करांची में ६० फी सदी विद्यार्थी अस्वस्थ है। वास्तव में यह भी अनुसन्धान किया गया है कि समस्त भारतवर्ष में विद्यार्थियों का स्वास्थ्य
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अशिष्ट (अष्ट) व शोचनीय है। इसके अतिरिक्त जिन दुष्ट-मनों व दुष्टवहारों के कारण उनके स्वास्थ्य का हान हो रहा है, वे दिनों दिन बढ़ रहे हैं। आजकल की स्कूलों और कालेजों में मदाचार की तथा धर्म की शिक्षा नहीं दी जाती। अर्वाचीन सभ्यता ने हमारे बालक बालिकाओं को बिलकुल अशक्त बना दिया है। वे क्रमिम (बनावटी) जीवन यापन करते हैं। बच्चों के बच्चे उत्पन्न होते हैं। यह कुल मर्यादा की अष्टा है। सिनेमा निदास्पद हो गया है। वह भावुकता तथा कामोत्पत्ति का प्रेरक है। आजकल सिनेमाओं में, रामायण और महाभारत की कहानियों के रहते हुए भी अधिकतर असभ्य दृश्य तथा अशिष्ट खेलों का ही प्रदर्शन किया जाता है। सुभे पुनः यहां जोर देकर कहना पड़ता है कि भारतवर्ष में जो आजकल शिक्षा प्रणाली प्रचलित है उसमें पूर्णतया तीव्र परिवर्तन करने की तत्काल आवश्यकता है। कहीं कहीं कालेजों में प्रोफेसर लोग अपने विद्यार्थियों को फेसनेबल (सानदार) बल्ल पहिनने के लिए वाध्य करते हैं। इतना ही नहीं वे उन विद्यार्थियों से पूछा करते हैं जो स्वच्छ व सादे बल्ल पहिनते हैं। कैसी करुणास्पद अवस्था है ! स्वच्छता एक वस्तु है और फेसन एक अन्य ! इस प्रकार की फेसन सांसारिक जीवन तथा इन्द्रिय-मुख भोगों में जड़ पकड़ लेती है।
अध्यापकों तथा माता पिताओं के कर्तव्य विद्यार्थियों के मदाचार तथा उनके वस्तुतः चरित्र-निर्माण कार्य में, अध्यापकों और प्रोफेसर्स का बड़ा भारी उत्तरदायित्व है। उनको स्वयं पूर्ण मदाचारी और पवित्र
अध्यापक तथा माता पिताओं क कर्तव्य
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होना चाहिए। उन्हें धार्मिक होने चाहिये। अन्यथा वह ठीक वैसा ही होगा जैसा कहा है—“अंधे की लकड़ी, को अंधे ने ही पकड़ी” अर्थात् अंधा मनुष्य ही अन्य अंधे मनुष्य को राह बताता है। प्रत्येक अध्यापक को चाहिए कि वह अपने अधिकार के महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व का पूर्णरूप से अनुभव करे। केवल युक्त भाषण-कला में मानसिक निपुणता प्राप्त कर लेना ही अध्यापक का वास्तविक शृंगार नहीं है। जब विद्यार्थी युवा अवस्था को प्राप्त होते हैं तो उनके स्थूल शरीरों में कुछ वृद्धि और परिवर्तन होने लगते हैं आवाज बदल जाती है। मन में नये भाव व विचार उत्पन्न होने लगते हैं। वे स्वभावतया विकल्क्षण (जिज्ञासु) बन जाते हैं। वे गलियों में अपने मित्रों से सलाह करते हैं। उन्हें कुत्सित सलाह मिलती है। वे दुर्ग्यसनों के कारण अपने स्वास्थ्य को नष्ट करते हैं। लिंग संबंधी स्वास्थ्य, आरोग्य शास्त्र, ब्रह्मचर्य, दीर्घायु तथा क्रोध व भावुकता पर विजय प्राप्त करने की विधि, आदि आदि विषयों का उन्हें पूरा पूरा ज्ञान प्राप्त कराया जाना चाहिए।
माता पिताओं को चाहिए कि वे अपने बच्चों को महाभारत और रामायण की कहानियां सुनावें। जो ब्रह्मचर्य और सदाचार से संबंध रखती हैं।
माता पिताओं को चाहिए कि वे अपने बच्चों को वारंवार ब्रह्मचर्य के विषय में शिक्षा देते रहें। यह उनका एक विशिष्ट कर्तव्य है। जब बालक और बालिकाओं में तपस्वावस्था के लक्षण दीखने लगे, तो उन्हें सब बातें दूर रूप से कह देना आवश्यक है। धीरे धीरे बताने में
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कोई लाभ नहीं है। लिंग संबंधी विषयों को छुपाकर नहीं रखना चाहिए। यदि माता पिताओं को अपने बच्चों के सामने इस महत्वपूर्ण विषय पर बातचीत करने में लज्जा प्रतीत होती है तो वह एक नितंत अवास्तविक मर्यादा है। छुप रहने से उनकी उत्सुकता और भी अधिक बढ़ जायगी। यदि बच्चे इन सब बातों को तथा समय अच्छी प्रकार से समझ लेंगे तो, वह निश्चय है कि न तो वे कुपय-नामी मित्रों के संग से मार्ग-भ्रष्ट ही होंगे और न उनमें दुर्धसनों की उत्पत्ति ही होगी।
ऐ पाठशालाओं और विश्वविद्यालयों के शिक्षक बून्द ! अव निद्रा भंग कीजिए। विद्यार्थियों को ब्रह्मचर्य, सदाचार और धार्मिक मार्ग में प्रशिक्षित कीजिए। उन्हें सच्चे ब्रह्मचारी बनाइये। इस श्रेष्ठ कार्य को अबहेलना न कीजिये। आप इस विशिष्ट कार्य के लिए न्यायानुसार उत्तरदायी हैं। यह आपका योग है। यदि आप इस कार्य को उत्साहसहित उचित रीतिसे करें तो आपको आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति हो सकती है। सच्चे और न्यायी बनिए। सजग रहिए। बालक और बालिकाओं को ब्रह्मचर्य की आवश्यकता प्रदर्शित करते हुए उन्हें उन विविध प्रकारों से सुपरिचित कीजिए कि जिनके द्वारा वे वीर्य (जो उनमें गुप्त आत्म-शक्ति है) को सुरक्षित रख सकें।
जिन अध्यापकों ने प्रथम अपने आपको सुशिक्षित कर लिया है उन्हें चाहिए कि वे अपने विद्यार्थियों के साथ गुप्त वर्तलाप करें तथा उन्हें ब्रह्मचर्य के संबंध में नियमित रूप से अभ्यास योग्य शिक्षाएं प्रदान करें। श्रीमान् एच० पेकन्हेम बॉल्श (एस० पी० जी० कालेज, टिचना-
अध्यापकों तथा माता पिताओं के कर्तव्य २६
पहली के भूतपूर्व प्रिंसिपल और वर्तमान में बड़े पादवी) अपने विद्यार्थियों के साथ ब्रह्मचर्य और आत्मसंयम संबंधी विषयों पर नियमित रूप से वार्तालाप किया करते थे।
संसार का भविष्य भाग्य (प्रारब्ध) अध्यापकों तथा विद्यार्थियों पर निर्भर है। यदि अध्यापकगण अपने विद्यार्थियों को ठीक प्रकार से धार्मिक मार्ग में शिक्षा दें तो संसार में आदर्श नागरिक, योगी, जैवन्तुओं की भरमार होगी, जो सर्वत्र प्रसन्नता, शान्ति, आनन्द और प्रकाश फैलाने में समर्थ होंगे। पाठशालाओं और कालेजों में प्राचीन काल के ब्रह्मन्तरियों के जीवन चरित्र, ब्रह्मचर्य और तत्संबंधी महा भारत और रामायण की कहानियों के प्रदर्शन, मैजिक लैण्टर्न द्वारा नियमित रूप से होने चाहिए। इससे विद्यार्थियों को उनके चरित्र निर्माण तथा उन्नत बनने में बड़ी सहायता मिलेगी। धन्य है वह जो वास्तव में अपने विद्यार्थियों को सच्चे ब्रह्मचारी बनाने के लिए प्रयत्न करता है। धन्य, धन्य है वह जो खुद नैष्ठिक ब्रह्मचारी बनने का उद्योग करता है। भगवान श्री कृष्ण उन सब पर प्रसन्न हों ! अध्यापक, प्रोफेसर तथा विद्यार्थी गण यशस्वी हों !
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चौथा अध्याय
ब्रह्मचारी कौन है ?
ब्रह्मचारी वह है जो पूर्ण पवित्रता का जीवन यापन करते हुए ब्रह्मसाक्षात्कार करने का प्रयत्न करता है। पवित्रता से जीवन यापन करना ही ब्रह्मचर्य है। 'अनुगीता' में कहा है "जो मनुष्य अनुशासन-कार्य के परे चला गया है और जो ब्रह्म में स्थित हुआ ब्रह्म ही की भांति संसार में भ्रमण करता है, वह ब्रह्मचारी कहा जाता है।"
ब्रह्मचारी दो प्रकार के होते हैं—एक नैष्ठिक ब्रह्मचारी जो जीवन पर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है और दूसरा उपाकुर्वन् ब्रह्मचारी जो वेद अथवा शास्त्राध्ययन की समाप्ति के पश्चात् गृहस्थ बन जाता है।
केवल सच्चा ब्रह्मचारी ही भक्ति और योगाभ्यास के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति कर सकता है बिना ब्रह्मचर्य के किसी प्रकार की भी आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है। अतः
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ब्रह्मचर्य में सफलता प्राप्त करने के लिए कुछ आध्यात्मिक साधन नीचे दिए जाते हैं:—
कामुक वृत्तियों तथा विचारों से मुक्त रहना ही ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचारी को काम-दृष्टि से भी मुक्त रहना चाहिए। भगवान् जीसस का कथन है “यदि आपकी कामातुर दृष्टि ही हो गई तो आप अपने हृदय में अभिन्ना कर चुके हैं” सच्चा ब्रह्मचारी स्त्री, कागज, लकड़ी या पत्थर के टुकड़े को स्पर्श करने में कुछ भी भिन्नता का अनुभव नहीं करेगा।
अखण्ड ब्रह्मचारी
अखंड ब्रह्मचारी जिसने बारह वर्षों तक अपने जीवन की एक बूंद भी क्षय नहीं की है। सहज में ही बिना कुछ प्रयत्न के समाधि को प्राप्त कर सकता है। प्राण और मन उसके सर्वथा अधीन होते हैं। बाल ब्रह्मचारी, अखंड ब्रह्मचारी का ही एक पर्यायवाची शब्द है। अखंड ब्रह्मचारी में, धारणा शक्ति (ममत्वे की शक्ति), स्मृति शक्ति (याद रखने की शक्ति), और विचार शक्ति (अन्वेषण या ज्ञान करने की शक्ति) होती है। उसकी बुद्धि और शान शक्ति शुद्ध और तीव्र होती है अतः उसके लिए मनन और निदिध्यासन की आवश्यकता नहीं होती अखंड ब्रह्मचारी बहुत ही कम पाए जाते हैं। परन्तु कुछ अवश्य मिलेंगे। आप भी अखंड ब्रह्मचारी हो सकते हैं, यदि आप उचित रीति व मन्त्रों से प्रयत्न करें। केवल जटा पट्टा होने तथा सारे शरीर में राख लगा लेने से कोई भी अखंड ब्रह्मचारी नहीं बन सकता। वह ब्रह्मचारी जिसने
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ब्रह्मचर्य साधना
अपने स्थूल शरीर और इन्द्रियों को तो बस में कर लिया है, परन्तु जिसके मन में सदा कामवासनायें जाग्रत रहती हैं, पक्का पाखंडी है। उसका कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए। वह किसी समय प्रकट हो जायगा। वह ब्रह्मचारी नहीं कहा जा सकता।
यदि आप १२ वर्षों तक अखंड ब्रह्मचारी रह सकते हैं तो आप बिना किसी अन्य साधना के ईश्वर साक्षात्कार कर लेंगे। आप जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे। यहां अखंड शब्द की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।
नैष्ठिक ब्रह्मचारी बनिये। नैष्ठिक ब्रह्मचारी वह है जो जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहने का व्रत धारण करता है। वह बिना ग्रहस्थी बने तत्काल सन्यास ग्रहण कर सकता है।
प्रिय श्याम! आप वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं जिसने जीवन पर्यन्त मन, कर्म और वचन से ब्रह्मचारी रहने का व्रत धारण किया है। अब आप के सम्मुख सूर्य भी कंपा-यमान होगा। चूंकि, उसको, आप के ब्रह्मचर्य की शक्ति के द्वारा छेदन किये जाने का भय है। आप अब सूर्यों के भी तेजस्वी सूर्य हैं।
ऊर्ध्वरेता योगी
अब मैं ऊर्ध्वरेता योगी के विषय में कुछ वर्णन करूंगा। ऊर्ध्वरेता योगी वह है जिसमें वीर्य शक्ति और शक्ति के रूप में परिणत होकर उसके मरित्थक में संचित रहती है जो पुनः ध्यानादि अभ्यासों के निमित्त काम में लाई जाती है। ऊर्ध्वरेता योगी में, जो वीर्य शक्ति और शक्ति के रूप में परिणत होती है, उस परिवर्तन की क्रिया को रूपान्तरण
ऊर्ध्वरेता योगी
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ह्वते हैं। ऊर्ध्वरेता योगी को स्वप्नदोष नहीं होता। वह केवल अपने वीर्य को श्रोत्र शक्ति में परिणत ही नहीं करता बल्कि अपनी योगिक तथा पूर्ण ब्रह्मचर्य शक्ति के द्वारा अपने अंड कोशों में वीर्य की उत्पत्ति का भी अवरोध करता है। यह एक बड़ा भारी रहस्य है। एलोपेथी डाक्टरों का विश्वास है कि ऊर्ध्वरेता योगी में भी वीर्य की उत्पत्ति निरंतर होती रहती है और वह वीर्य-द्रव पुनः रक्त में विलीन हो जाता है। वह उनकी भूल है। वे योग के वास्तविक गुप्त रहस्यों को नहीं समझते। वे ग्रंथकार में हैं। उनकी दृष्टि का विकास केवल विश्व के स्थूल पदार्थों तक ही है। योगी अपनी चक्षु (आत्मिक दृष्टि) के द्वारा पदार्थों की सूक्ष्म गुप्त प्रकृति को भी समझने में समर्थ होता है। योगी वीर्य के सूक्ष्म स्वभावपर नियंत्रण करता है और तदनुसार वीर्य की उत्पत्ति मात्र का अवरोध करता है। योग-विज्ञान के अनुसार वीर्य (शुक्र) सूक्ष्म स्थिति में सारे शरीर में विद्यमान रहता है। वह, कामोत्पत्ति तथा काम वासनाओं के प्रभाव से, जननेन्द्रियों में एकत्रित होकर विस्मित रूप को धारण करता है। केवल पहिले से बने हुए स्थूल वीर्य के उद्गार का अवरोध करना ही नहीं, परंतु, स्थूल यीज रूप से, उसकी उत्पत्ति का अवरोध करना ही ऊर्ध्वरेता योगी बनना है। ऊर्ध्वरेता योगी शीघ्र ही ब्रह्मसाक्षात्कार कर सकता है। इस संबंध में उसके लिये केवल श्रवण पर्याप्त है। पाश्चात्य आध्यात्म-विज्ञान के अनुसार गुप्त विचार के द्वारा वीर्य को श्रोत्र शक्ति में परिणत करना ही लैंगिकरूपान्तरण कहलाता है। जिस प्रकार रसायनिब पदार्थ अग्नि के द्वारा तथा भाप रूप में परिणत कर शुद्ध किया
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ब्रह्मचर्य साधना
जाता है ( जो पुनः स्थूल रूप को धारण करता है ), ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक साधना तथा आत्मोन्नति के शुद्ध सात्विक विचारों के द्वारा, वीर्य भी शुद्ध किया जाकर ओज शक्ति में परिणत किया जाता है । योग शास्त्र के अनुसार ऊर्ध्वरेता योगी वह कहलाता है जिस में वीर्य-शक्ति ऊपर की ओर उठकर मस्तिष्क में प्रवेश करती है ।
रुद्रान्तरण की विधि अत्यन्त कठिन है, तथापि, आध्यात्मिक मार्ग में साधक के लिये परमावश्यक है । वह कर्मयोग, भक्ति योग, राजयोग तथा वेदान्त में साधक लिये एक परम आवश्यक गुण या योग्यता है । इसके लिये आप को भरसक प्रयत्न करना चाहिये भविष्य जन्मों में तो आप इस के लिये प्रयत्न करेंगे ही तो फिर इसी समय क्यों नहीं ?
ओज वह आध्यात्मिक शक्ति है । जो मस्तिष्क में संचित रहती है । शुद्ध विचार, ध्यान, जप, पूजन, आसन तथा प्राणायाम के अभ्यास से वीर्य-शक्ति ओज शक्ति में बदलकर मस्तिष्क में एकत्र हो जाती है । यही ओज शक्ति पुनः भगवत् चिंतन तथा अन्य आध्यात्मिक कार्यों के लिये काम में लाई जाती है ।
हठ-योगी सिद्धासन, शीर्षासन, सर्वांगसन, मूलवंध, महासुद्रा, नौलि किया आदि अभ्यासों के द्वारा अपनी वीर्य-शक्ति को ओज शक्ति में परिणत करता है ।
भक्त नवधा भक्ति (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, बंदन, दास्य, साक्ष्य, आत्मनिवेदन) के अभ्यास तथा जप के द्वारा अपने मनके मल का नाश करता है और उसे भगवान में लगाता है । यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभ्यास
ऊर्ध्वरेता योगी
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के द्वारा, राज योगी, कामेच्छा पर विजय प्राप्त करता है और कैवल्य प्राप्त करता है । ज्ञान योगी, विवेक, वैराग्य, विचार, शम, दम, और तितिक्षा के द्वारा अपने को पवित्र करता है । निरंतर अलिंग आत्मा का चिंतन कीजिये और काम-वासना का नाश कीजिये । सर्वो में आत्माको देखिये । नाम और रूपों का त्याग कीजिये और वास्तविक तत्व (सत् चित् आनंद) को गहण कीजिये ।
क्रोध और मांसल शक्ति भी श्रोत्र में परिवर्तित की जा सकती है जिस मनुष्य में श्रोत्र शक्ति अधिक है, वह अमित मानसिक कार्य कर सकता है । वह अत्यन्त बुद्धिमान होता है । उसके मुख पर आध्यात्मिक कान्ति और नेत्रों में दीदीप्यमान प्रकाश होता है वह भित-भाषण से भोताओं के मनों पर बड़ा भारी प्रभावित डाल सकता है । उसका भाषण श्रोत्रस्वी होता है । उसका व्यक्तिव आश्चर्य (आदर) उत्पन्न करने वाला होता है । भगवान् शंकर (जो एक अखंड ब्रह्मचारी थे) ने अपनी श्रोत्र शक्ति के द्वारा अनेक आश्चर्य जनक कार्य किये । उन्होंने अपनी श्रोत्र शक्ति के द्वारा भारत के विविध स्थान में विद्वान् पंडितों तथा धर्माचार्यों के साथ शास्त्रार्थ कर दिग्विजय की और समस्त भारत में अद्वैत मत की स्थापना की । योगी निरय, अखंड ब्रह्मचर्य के द्वारा अपने में इस श्रोत्र-शक्ति को संचित करता रहता है ।
ऐ मेरे प्रिय पाठकगण ! इस वीर्य सात्र की अत्यन्त, अत्यन्त माध्वानी के साथ रक्षा कीजिये । मन वचन और कर्म के द्वारा पवित्र होकर ऊर्ध्वरेता योगी बनिये ।
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ब्रह्मचर्य साधना
ब्रह्मचर्य का माप—दण्ड
प्रत्येक मनुष्य में अनेक इच्छाएँ होती हैं। उन सब में मुख्य बलवती इच्छा है कामेच्छा (मंथन की इच्छा), सब ही इच्छाएँ इस मुख्य इच्छा पर आधारित रहती हैं भन, पुत्र, सपुष्टि, घर, गाय बैल आदि की इच्छाएँ सब इस मुख्य इच्छा के पीछे रहती हैं। इस अखिल ब्रह्मांड का मष्टि कर्म चलता रहै, इस कारण से मगवान ने इस इच्छा को इस प्रकार अत्यन्त बलवती बनाई है। अन्यथा विश्वविद्यालयों से निकले हुए छात्रों की भाँति जीवनसुखों की भी संसार में भरमार होती। विश्वविद्यालयों की डिग्रियाँ प्राप्त करना आसान है। परंतु काम की प्रवृत्ति को रोकना एक महान कठिन कार्य है। जिसने कामवासना का सर्वथा त्याग कर दिया है और जिसने अपने आपको मानसिक ब्रह्मचर्य में स्थापित कर दिया है, वह स्वयं ब्रह्म है।
मनुष्यों में निरय यह शिकायत सुनी जाती है कि उन्हें ब्रह्मचर्य में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं होती यद्यपि वे उसके लिये भरसक प्रयत्न और अभ्यास भी करते हैं। इसके लिये उनको भयभीत और हताश होने की आवश्यकता नहीं है। यह उनकी भारी भूल है। आध्यात्मिक प्रदेश में भी वायु तथा सर्दा गर्मी नापने के गंज हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म हैं। आध्यात्मिक माप-दण्ड के द्वारा मानसिक पवित्रता की उत्पत्ति (वृद्धि) सूक्ष्म से सूक्ष्म स्थिति में जानी जा सकती है। पवित्रता की स्थिति को ग्रहण करने (समझने) के लिये आप के लिये सद्वृद्धि की आवश्यकता है। कठिन साधना, परा वैराग्य और मुमुक्षुत्व के द्वारा मानसिक पवित्रता की उच्चतम स्थिति शीघ्र ही जानी जा सकती है यदि कोई मनुष्य गायत्री