भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य का माप—दण्ड

प्रत्येक मनुष्य में अनेक इच्छाएँ होती हैं। उन सब में मुख्य बलवती इच्छा है कामेच्छा (मंथन की इच्छा), सब ही इच्छाएँ इस मुख्य इच्छा पर आधारित रहती हैं भन, पुत्र, सपुष्टि, घर, गाय बैल आदि की इच्छाएँ सब इस मुख्य इच्छा के पीछे रहती हैं। इस अखिल ब्रह्मांड का मष्टि कर्म चलता रहै, इस कारण से मगवान ने इस इच्छा को इस प्रकार अत्यन्त बलवती बनाई है। अन्यथा विश्वविद्यालयों से निकले हुए छात्रों की भाँति जीवनसुखों की भी संसार में भरमार होती। विश्वविद्यालयों की डिग्रियाँ प्राप्त करना आसान है। परंतु काम की प्रवृत्ति को रोकना एक महान कठिन कार्य है। जिसने कामवासना का सर्वथा त्याग कर दिया है और जिसने अपने आपको मानसिक ब्रह्मचर्य में स्थापित कर दिया है, वह स्वयं ब्रह्म है।

मनुष्यों में निरय यह शिकायत सुनी जाती है कि उन्हें ब्रह्मचर्य में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं होती यद्यपि वे उसके लिये भरसक प्रयत्न और अभ्यास भी करते हैं। इसके लिये उनको भयभीत और हताश होने की आवश्यकता नहीं है। यह उनकी भारी भूल है। आध्यात्मिक प्रदेश में भी वायु तथा सर्दा गर्मी नापने के गंज हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म हैं। आध्यात्मिक माप-दण्ड के द्वारा मानसिक पवित्रता की उत्पत्ति (वृद्धि) सूक्ष्म से सूक्ष्म स्थिति में जानी जा सकती है। पवित्रता की स्थिति को ग्रहण करने (समझने) के लिये आप के लिये सद्वृद्धि की आवश्यकता है। कठिन साधना, परा वैराग्य और मुमुक्षुत्व के द्वारा मानसिक पवित्रता की उच्चतम स्थिति शीघ्र ही जानी जा सकती है यदि कोई मनुष्य गायत्री