भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ऊर्ध्वरेता योगी

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के द्वारा, राज योगी, कामेच्छा पर विजय प्राप्त करता है और कैवल्य प्राप्त करता है । ज्ञान योगी, विवेक, वैराग्य, विचार, शम, दम, और तितिक्षा के द्वारा अपने को पवित्र करता है । निरंतर अलिंग आत्मा का चिंतन कीजिये और काम-वासना का नाश कीजिये । सर्वो में आत्माको देखिये । नाम और रूपों का त्याग कीजिये और वास्तविक तत्व (सत् चित् आनंद) को गहण कीजिये ।

क्रोध और मांसल शक्ति भी श्रोत्र में परिवर्तित की जा सकती है जिस मनुष्य में श्रोत्र शक्ति अधिक है, वह अमित मानसिक कार्य कर सकता है । वह अत्यन्त बुद्धिमान होता है । उसके मुख पर आध्यात्मिक कान्ति और नेत्रों में दीदीप्यमान प्रकाश होता है वह भित-भाषण से भोताओं के मनों पर बड़ा भारी प्रभावित डाल सकता है । उसका भाषण श्रोत्रस्वी होता है । उसका व्यक्तिव आश्चर्य (आदर) उत्पन्न करने वाला होता है । भगवान् शंकर (जो एक अखंड ब्रह्मचारी थे) ने अपनी श्रोत्र शक्ति के द्वारा अनेक आश्चर्य जनक कार्य किये । उन्होंने अपनी श्रोत्र शक्ति के द्वारा भारत के विविध स्थान में विद्वान् पंडितों तथा धर्माचार्यों के साथ शास्त्रार्थ कर दिग्विजय की और समस्त भारत में अद्वैत मत की स्थापना की । योगी निरय, अखंड ब्रह्मचर्य के द्वारा अपने में इस श्रोत्र-शक्ति को संचित करता रहता है ।

ऐ मेरे प्रिय पाठकगण ! इस वीर्य सात्र की अत्यन्त, अत्यन्त माध्वानी के साथ रक्षा कीजिये । मन वचन और कर्म के द्वारा पवित्र होकर ऊर्ध्वरेता योगी बनिये ।