ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
जाता है ( जो पुनः स्थूल रूप को धारण करता है ), ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक साधना तथा आत्मोन्नति के शुद्ध सात्विक विचारों के द्वारा, वीर्य भी शुद्ध किया जाकर ओज शक्ति में परिणत किया जाता है । योग शास्त्र के अनुसार ऊर्ध्वरेता योगी वह कहलाता है जिस में वीर्य-शक्ति ऊपर की ओर उठकर मस्तिष्क में प्रवेश करती है ।
रुद्रान्तरण की विधि अत्यन्त कठिन है, तथापि, आध्यात्मिक मार्ग में साधक के लिये परमावश्यक है । वह कर्मयोग, भक्ति योग, राजयोग तथा वेदान्त में साधक लिये एक परम आवश्यक गुण या योग्यता है । इसके लिये आप को भरसक प्रयत्न करना चाहिये भविष्य जन्मों में तो आप इस के लिये प्रयत्न करेंगे ही तो फिर इसी समय क्यों नहीं ?
ओज वह आध्यात्मिक शक्ति है । जो मस्तिष्क में संचित रहती है । शुद्ध विचार, ध्यान, जप, पूजन, आसन तथा प्राणायाम के अभ्यास से वीर्य-शक्ति ओज शक्ति में बदलकर मस्तिष्क में एकत्र हो जाती है । यही ओज शक्ति पुनः भगवत् चिंतन तथा अन्य आध्यात्मिक कार्यों के लिये काम में लाई जाती है ।
हठ-योगी सिद्धासन, शीर्षासन, सर्वांगसन, मूलवंध, महासुद्रा, नौलि किया आदि अभ्यासों के द्वारा अपनी वीर्य-शक्ति को ओज शक्ति में परिणत करता है ।
भक्त नवधा भक्ति (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, बंदन, दास्य, साक्ष्य, आत्मनिवेदन) के अभ्यास तथा जप के द्वारा अपने मनके मल का नाश करता है और उसे भगवान में लगाता है । यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभ्यास