ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऊर्ध्वरेता योगी
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ह्वते हैं। ऊर्ध्वरेता योगी को स्वप्नदोष नहीं होता। वह केवल अपने वीर्य को श्रोत्र शक्ति में परिणत ही नहीं करता बल्कि अपनी योगिक तथा पूर्ण ब्रह्मचर्य शक्ति के द्वारा अपने अंड कोशों में वीर्य की उत्पत्ति का भी अवरोध करता है। यह एक बड़ा भारी रहस्य है। एलोपेथी डाक्टरों का विश्वास है कि ऊर्ध्वरेता योगी में भी वीर्य की उत्पत्ति निरंतर होती रहती है और वह वीर्य-द्रव पुनः रक्त में विलीन हो जाता है। वह उनकी भूल है। वे योग के वास्तविक गुप्त रहस्यों को नहीं समझते। वे ग्रंथकार में हैं। उनकी दृष्टि का विकास केवल विश्व के स्थूल पदार्थों तक ही है। योगी अपनी चक्षु (आत्मिक दृष्टि) के द्वारा पदार्थों की सूक्ष्म गुप्त प्रकृति को भी समझने में समर्थ होता है। योगी वीर्य के सूक्ष्म स्वभावपर नियंत्रण करता है और तदनुसार वीर्य की उत्पत्ति मात्र का अवरोध करता है। योग-विज्ञान के अनुसार वीर्य (शुक्र) सूक्ष्म स्थिति में सारे शरीर में विद्यमान रहता है। वह, कामोत्पत्ति तथा काम वासनाओं के प्रभाव से, जननेन्द्रियों में एकत्रित होकर विस्मित रूप को धारण करता है। केवल पहिले से बने हुए स्थूल वीर्य के उद्गार का अवरोध करना ही नहीं, परंतु, स्थूल यीज रूप से, उसकी उत्पत्ति का अवरोध करना ही ऊर्ध्वरेता योगी बनना है। ऊर्ध्वरेता योगी शीघ्र ही ब्रह्मसाक्षात्कार कर सकता है। इस संबंध में उसके लिये केवल श्रवण पर्याप्त है। पाश्चात्य आध्यात्म-विज्ञान के अनुसार गुप्त विचार के द्वारा वीर्य को श्रोत्र शक्ति में परिणत करना ही लैंगिकरूपान्तरण कहलाता है। जिस प्रकार रसायनिब पदार्थ अग्नि के द्वारा तथा भाप रूप में परिणत कर शुद्ध किया