भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य साधना

अपने स्थूल शरीर और इन्द्रियों को तो बस में कर लिया है, परन्तु जिसके मन में सदा कामवासनायें जाग्रत रहती हैं, पक्का पाखंडी है। उसका कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए। वह किसी समय प्रकट हो जायगा। वह ब्रह्मचारी नहीं कहा जा सकता।

यदि आप १२ वर्षों तक अखंड ब्रह्मचारी रह सकते हैं तो आप बिना किसी अन्य साधना के ईश्वर साक्षात्कार कर लेंगे। आप जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे। यहां अखंड शब्द की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

नैष्ठिक ब्रह्मचारी बनिये। नैष्ठिक ब्रह्मचारी वह है जो जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहने का व्रत धारण करता है। वह बिना ग्रहस्थी बने तत्काल सन्यास ग्रहण कर सकता है।

प्रिय श्याम! आप वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं जिसने जीवन पर्यन्त मन, कर्म और वचन से ब्रह्मचारी रहने का व्रत धारण किया है। अब आप के सम्मुख सूर्य भी कंपा-यमान होगा। चूंकि, उसको, आप के ब्रह्मचर्य की शक्ति के द्वारा छेदन किये जाने का भय है। आप अब सूर्यों के भी तेजस्वी सूर्य हैं।

ऊर्ध्वरेता योगी

अब मैं ऊर्ध्वरेता योगी के विषय में कुछ वर्णन करूंगा। ऊर्ध्वरेता योगी वह है जिसमें वीर्य शक्ति और शक्ति के रूप में परिणत होकर उसके मरित्थक में संचित रहती है जो पुनः ध्यानादि अभ्यासों के निमित्त काम में लाई जाती है। ऊर्ध्वरेता योगी में, जो वीर्य शक्ति और शक्ति के रूप में परिणत होती है, उस परिवर्तन की क्रिया को रूपान्तरण