ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 237 में से
संदर्भ में पढ़ें२०
ब्रह्मचर्य साधना
शांतिमय आध्यात्मिक जीवन तथा ज्ञान का आधार है। जिस ब्रह्म-निद्रा की आकांक्षा संत, जिज्ञासु और योगाभ्यासी साधक करते हैं, उसका ब्रह्मचर्य ही एक अवलंबन है। वह हमारे काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि आंतरिक शत्रुओं के साथ युद्ध करने के लिए एक अमोघ शस्त्र है। वह परम सुख, अखंड और अविनाशी आनन्द का देने वाला है। बड़े-बड़े ऋषि, देवता, गंधर्व आदि भी नैष्ठिक ब्रह्मचारी के चरणों की सेवा करते हैं। केवल इस ब्रह्मचर्य की शक्ति के द्वारा ही मनुष्य सुषुम्ना के द्वार को खोल कर कुण्डलिली शक्ति का उत्थान करता है। आठ सिद्धियाँ और नव निधियाँ तो ब्रह्मचारी के चरणों में रमण करती हैं तथा उसकी आशा का पालन करने के लिए सदा उद्यत रहती हैं। यम भी ब्रह्मचारी से दूर भागता है। वास्तविक ब्रह्मचारी के गौरव, महत्व और प्रभुता का कौन वर्णन कर सकता है !
अर्जुन एक वीर योद्धा था, परन्तु रणक्षेत्र में उसने भी क्षिप्रि होकर शस्त्र त्याग दिया। उस समय भगवान् श्री कृष्ण ने किस प्रकार स्थिर और शांत चित्त होकर अर्जुन को गीता के सिद्धांतों का उपदेश दिया। यह उनके ब्रह्मचर्य की शक्ति का कारण था।
भीष्म पितामह के कानों को देखिए उनमें दिव्य शक्तियाँ थीं वे अपनी कनिष्ठ अंगुली के द्वारा संसार को हिला सकते थे। उन्होंने जीवन पर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करने का संकल्प किया। उनका प्रथम नाम देवव्रत था; परन्तु 'देवताओं ने उन्हें 'भीष्म' (भयानक) नाम—'वया नाम तथा गुण' की लोकोक्ति के अनुसार—केवल