ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहस्थियों के लिए ब्रह्मचर्य
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करना निरा असंभव नहीं है। पूर्वकाल में भी ऋद्धियों ने इसमें सफलता प्राप्त की है। सदाचार धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन, सत्संग, जप, ध्यान, प्राणायाम, सात्विक और मिताहार, ब्रह्मविचार, आत्मविश्लेषण और आत्म संशोधन, यम, नियम, तथा गीता के १७वें अध्याय में वर्णन किये गये शारोरिक, वाचक और मानसिक तपों का अभ्यास—ये सब ही ब्रह्मचर्य में सफलता प्राप्त करने के साधन हैं। लोग अनियमित, असत्, अपरिमित, अधार्मिक तथा अशिक्षित-जीवन व्यतीत करते हैं। यही कारण है कि वे दुःख पाते और उन्हें अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति में सफलता प्राप्त नहीं होती। जिस प्रकार हाथी अपनी ही सूँड से अपने सिर पर धूल उछालता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य अपनी मूर्खता के कारण क्लेश तथा बाधाओं को बुलाकर अपने गले बांधते हैं।
आजकल हमारे नवयुवक, पाश्चात्य सभ्यता के अनुसार, जब कभी वे कहीं बाहर जाते हैं तो अपनी पहिनियों को भी अपने साथ ले जाते हैं। इससे उनमें सर्वदा स्त्रियों के संग में रहने का दुर्व्यसन पड़ जाता है। पुनः तनिक भी वियोग उनके लिए बड़े भारी दुःख का कारण होता है। जब उनकी स्त्रियाँ मर जाती हैं, तो उन्हें बहुत आघात पहुंचता है और भी ऐसे मनुष्यों के लिए केवल एक माह के लिये भी ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करना अति कठिन सा हो जाता है। ऐ अभागो, दुःखी, दुर्बल प्राणियों ! ऐ आध्यात्मिक दीवालियों ! अपनी धर्मपहिनियों से जितना अधिक हो सके, दूर रहने का प्रयत्न कीजिये। उनके साथ कम वानचीत कीजिये। गोभीर रहिये। उनके साथ परिहास