ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
न कीजिये । सार्थकाल में घूमने के लिये अकेले ही जाइये । आपके विश्व पूर्वजों ने क्या किया ! पाश्चात्य लोगों में जो उत्तम गुण हैं, केवल उन्हीं का अनुसरण कीजिये । वस्त्र, आभूषण, खान, पान, रहन, सहन, तथा अन्य फैशनोचिल कार्यों में उनका अधम अनुकरण करना आपतिजनक है । यदि मनुष्य ग्रहस्थ में भी पवित्रता से जीवन यापन करे और केवल समयानुकूल वंश-परम्परा के निमित्त ही स्त्री-प्रसंग करे तो वह स्वस्थ, बुद्धिमान, शक्तिशाली, सुन्दर और आत्मसमर्पण करने वाली संतानों को उत्पन्न कर सकता है । प्राचीन भारत में जब विद्वान और तपस्वी लोग, विवाह करते थे तो वे इसी उद्देश्य के लिये, इसी शिष्ट नियम का अनुसरण करते थे तथा जन साधारण को इस बात की शिक्षा देते थे कि किस प्रकार व्यवहार और मर्यादा के द्वारा ग्रहस्थी भी ब्रह्मचर्य का जीवन यापन कर सकता है ।
आपको अपनी धर्मपत्नी को गीता, उपनिषद्, भागवत, रामायण के अध्ययन तथा व्रत, खान-पान, आदि नियमों के विषय में शिक्षा देनी होगी ।
शास्त्रों का बचन है कि जब मनुष्य के एक पुत्र उत्पन्न हो जाता है, तो उसकी पत्नी उसकी माता के तुल्य हो जाती है, क्योंकि वह स्वयं ही पुत्र रूप में उत्पन्न हुआ है । ऐसी परिस्थिति में अब आप विचार कर सकते हैं कि एक पुत्रोत्पत्ति के पश्चात् भी इन्द्रिय सुख के लिए प्रसंग कर संतानोत्पत्ति करते रहना कहाँ तक उचित और मानवीय है ।
उत्तुक्क साधक, जो आत्मसाक्षात्कार के मार्ग का