ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगृहस्थियों के लिए ब्रह्मचर्य
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अवलंबन कर रहे हैं और जो ४० वर्ष से अधिक की अवस्था वाले गृहस्थी हैं, उन्हें चाहिये कि वे अपनी धर्म-पत्नी के साथ जहां तक हो सके बहुत ही कम प्रसंग करें। यदि वे शीघ्र उत्पत्ति चाहते हैं और केवल इसी जन्म में भगवद-सान्ताकार करना चाहते हैं, तो उन्हें चाहिये कि वे शारीरिक ब्रह्मचर्य की ओर पूरा पूरा ध्यान दें। आध्यात्मिक मार्ग में मनमानी छूट को स्थान नहीं है।
एक साधक असंतोष पूर्वक कहता है “जब मैं ध्यान करता हूँ तो मेरे चित्त से, अशुद्ध विचारों के तह के तह निकलने लगते हैं। कभी कभी तो वे इतने उग्र और भयंकर होते हैं कि मैं चकरा जाता हूँ और नहीं समझ सकता कि उन्हें किस प्रकार रोका जाय। मैं सत्य और ब्रह्मचर्य में पूर्ण रूप से व्यवस्थित नहीं हूँ। असत्य बोलने का स्वभाव और काम वासनाएँ अभी तक मुझ में गुप्त रूप से सता रही हैं। स्त्री का चिंतन मात्र मेरे मन में उद्भेग उत्पन्न कर देता है। मेरा मन और हृदय इतना कोमल है कि मैं उन विचारों पर नियंत्रण नहीं कर सकता। ज्योंही मन में विचार प्रवेश करता है, त्योंही मन ध्यान और दिन भर की शान्ति तत्काल धूल में मिल जाती है। मैं अपने मन को सम्भालता हूँ, फुसलाता हूँ, डराता हूँ, फिर भी सब निरर्थक। मन बड़ा उपद्रव करता है। मैं नहीं समझ सकता कि इस काम पर किस प्रकार विजय प्राप्त की जाय। चिड़ निहाट, श्रृंखार, कोष, लोभ, घृणा, आसक्ति आदि दुर्गुण मुझमें अभी तक गुप्त रूप से विद्यमान हैं। जहां तक मैंने अपने मन का विश्लेषण किया है, मैं कह सकता हूँ कि फंस ही मेरा मुख्य और बलवान शत्रु है। मैं आप