भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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कामवासना की प्रबलता

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और मनुष्य में समान रूप से रहते हैं। मनुष्य में यदि कुछ विशेषता है तो वह केवल धर्म, विवेक और विचार शक्ति की ही है। यदि उसमें ये गुण नहीं हैं तो वह भी ठीक एक द्विपद पशु ही है।

संसार में काम ही सबसे बड़ा शत्रु है। वही मनुष्य का भक्षण करता है। मैथुन के अनंतर अत्यन्त शक्ति ही नता प्राप्त होती है। स्त्री को प्रसन्न करने तथा उसकी आवश्यकता व विलासिताओं को पूरा करने के लिये धन कमाने में आपको अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है। धन एकत्रित कर लेने में आपको नाना प्रकार के छल कपट व पाप कर्म करने पड़ते हैं। आपको अपनी स्त्री तथा बच्चों के मानसिक शोक, चिन्ताओं में भी भाग लेना पड़ता है। तत्त्वतः आपको अपने कुटुम्ब को पालन करने में सहस्रों वाधाओं का सामना करना पड़ता है। क्योंकि कोई भी दो व्यक्ति एक मत के नहीं होते अतः घर में हर समय कलह रहती है। आपको अपने उत्तरदायित्व तथा अपनी आवश्यकताओं को बरबस बढ़ाते रहना पड़ता है। आपकी मति प्रमित हो जाती है। वीर्य क्षय के कारण जो भारी हानि होती है उसके फलतः आपके शरीर में नाना प्रकार की व्याधियाँ, शिथिलता, दुर्बलता तथा शक्ति हीनता उत्पन्न हो जाती है। तदनुसार आप शोष मृत्यु का द्वार खटखटाने लगते हैं। अतः आप अखंड ब्रह्मचारी बनकर अपने आपको शोक, दुःख और वाधाओं से मुक्त कीजिये।

एक बार के प्रसंग में जो शक्ति व्यय होती है वह एक दिन के मानसिक कार्य की मानसिक शक्ति तथा सात