भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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कामवासना की प्रबलता

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लिये निरन्तर उग्र और दृढ़ साधना की आवश्यकता है ब्रह्मचर्य में यत्किञ्चित् सफलता प्राप्त कर लेने पर आपकी अभिमान नहीं करना चाहिये। यदि आपकी परीक्षा ली गई तो आप बुरी तरह असफल होंगे। आपको अपने दोनों का सदा ध्यान रखते हुये उनसे मुक्त होने का निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिये। भरसक प्रयत्न की आवश्यकता है। केवल तभी आप इस कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकेंगे।

एक महानुभाव जो विवाहित थे और जिन्होंने धूम्र-पान और मदिरा का त्याग कर दिया था, ब्रह्मचर्य का अभ्यास करना चाहते थे। उनकी स्त्री भी इस कार्य के लिये सहमत थी। परन्तु वे स्वयं इस कार्य में सफलता प्राप्त करना कठिन मानते थे। विशेष कर उनकी कठिनाई नेत्र-इन्द्रिय की थी। अभी अभी जब वे मुश्कले मिले तो उन्होंने कहा—“गली ही मेरा मुख्थ शत्रु है। तात्पर्य यह कि आखें ज्यों ही वे सुसज्जित स्त्रियों को देखती हैं, आकर्षित हो जाती हैं।” एक साधक कहता है—“जब मैं प्राणायाम, जप और ध्यान का दृढ़ अभ्यास करता था, उस समय मेरा मन कामोत्तेजक परिस्थितियों में भी कामातुर नहीं होता था। परन्तु जब मैंने अभ्यास छोड़ दिया तो मेरा मन, गलियों में अलंकृत कुल-स्त्रियों को तथा सिनेमा घरों के सामने स्त्रियों के चित्रों को देखकर तुरत आकर्षित हो जाता था। समुद्र तट और माल रोड (माल सड़क) ही मेरे शत्रु हैं।”

श्री भट्टहरि का कथन है—“भोजन के लिये जो कुछ भी भिक्षा द्वारा प्राप्त हो जाय और वह भी नीरस ऐसी भिक्षा