ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
है तो उसमें मोह, स्मरण शक्ति की व्यग्रता तथा विचार शक्ति का हास होकर अन्त में वह नाश को प्राप्त होता है। जब मनुष्य रोप युक्त होता है, तो फिर संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो उसके कोष को शांत कर सके। वह कठोर और अपशब्दों की मार करेगा और क्या नहीं कर देवेगा। वह अनियंत्रित हो जाता है। कलह जब आरम्भ होती है तो पहिले पहिल कुछ कड़े शब्दों के साथ ही होती है, परन्तु उसका अन्त हाथाहाथी 'लडम लढी, लुरा लुरी और मार काट में होता है। अज्ञानी मनुष्यों के कामरूपी भयंकर रोग को दूर करने तथा साधकों को ब्रह्म-स्थिति में पहुँचाने के लिये ब्रह्मचर्य के अतिरिक्त कोई भी अधिक प्रभावशाली औषधि नहीं है।
सब प्रकार के मैथुन संबंधी अत्यियमित व्यवहार हस्त मैथुन, गुदा मैथुन (पुरुष मैथुन) आदि आदि निन्दित पाशवी स्वभावों का सर्वथा त्याग करना चाहिये। इनसे नाड़ी मंडल का सर्वथा नाश होकर अत्यन्त दुर्गति प्राप्त होती है। भोजन में यत्किचित् परिवर्तन, प्राणायाम का अभ्यास तथा यत्किचित् जप के करने से आपको भ्रमवश यह नहीं समझ लेना चाहिये कि आपने काम-वासना का सर्वथा त्याग कर दिया है। आप किसी भी समय प्रलोभन में आ सकते हैं। नित्य सावधानी और कठिन साधना की पूरी पूरी आवश्यकता है। संकुचित प्रयत्न के द्वारा आप पूर्ण ब्रह्मचर्य को प्राप्त नहीं कर सकते। जिस प्रकार एक प्रबल शत्रु को मारने के लिये मशीनगन (एक प्रकार की तोप) की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार इस कामरूपी प्रबल शत्रु का वध करने के