भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य साधना

है तो उसमें मोह, स्मरण शक्ति की व्यग्रता तथा विचार शक्ति का हास होकर अन्त में वह नाश को प्राप्त होता है। जब मनुष्य रोप युक्त होता है, तो फिर संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो उसके कोष को शांत कर सके। वह कठोर और अपशब्दों की मार करेगा और क्या नहीं कर देवेगा। वह अनियंत्रित हो जाता है। कलह जब आरम्भ होती है तो पहिले पहिल कुछ कड़े शब्दों के साथ ही होती है, परन्तु उसका अन्त हाथाहाथी 'लडम लढी, लुरा लुरी और मार काट में होता है। अज्ञानी मनुष्यों के कामरूपी भयंकर रोग को दूर करने तथा साधकों को ब्रह्म-स्थिति में पहुँचाने के लिये ब्रह्मचर्य के अतिरिक्त कोई भी अधिक प्रभावशाली औषधि नहीं है।

सब प्रकार के मैथुन संबंधी अत्यियमित व्यवहार हस्त मैथुन, गुदा मैथुन (पुरुष मैथुन) आदि आदि निन्दित पाशवी स्वभावों का सर्वथा त्याग करना चाहिये। इनसे नाड़ी मंडल का सर्वथा नाश होकर अत्यन्त दुर्गति प्राप्त होती है। भोजन में यत्किचित् परिवर्तन, प्राणायाम का अभ्यास तथा यत्किचित् जप के करने से आपको भ्रमवश यह नहीं समझ लेना चाहिये कि आपने काम-वासना का सर्वथा त्याग कर दिया है। आप किसी भी समय प्रलोभन में आ सकते हैं। नित्य सावधानी और कठिन साधना की पूरी पूरी आवश्यकता है। संकुचित प्रयत्न के द्वारा आप पूर्ण ब्रह्मचर्य को प्राप्त नहीं कर सकते। जिस प्रकार एक प्रबल शत्रु को मारने के लिये मशीनगन (एक प्रकार की तोप) की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार इस कामरूपी प्रबल शत्रु का वध करने के

कामवासना की प्रबलता

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लिये निरन्तर उग्र और दृढ़ साधना की आवश्यकता है ब्रह्मचर्य में यत्किञ्चित् सफलता प्राप्त कर लेने पर आपकी अभिमान नहीं करना चाहिये। यदि आपकी परीक्षा ली गई तो आप बुरी तरह असफल होंगे। आपको अपने दोनों का सदा ध्यान रखते हुये उनसे मुक्त होने का निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिये। भरसक प्रयत्न की आवश्यकता है। केवल तभी आप इस कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकेंगे।

एक महानुभाव जो विवाहित थे और जिन्होंने धूम्र-पान और मदिरा का त्याग कर दिया था, ब्रह्मचर्य का अभ्यास करना चाहते थे। उनकी स्त्री भी इस कार्य के लिये सहमत थी। परन्तु वे स्वयं इस कार्य में सफलता प्राप्त करना कठिन मानते थे। विशेष कर उनकी कठिनाई नेत्र-इन्द्रिय की थी। अभी अभी जब वे मुश्कले मिले तो उन्होंने कहा—“गली ही मेरा मुख्थ शत्रु है। तात्पर्य यह कि आखें ज्यों ही वे सुसज्जित स्त्रियों को देखती हैं, आकर्षित हो जाती हैं।” एक साधक कहता है—“जब मैं प्राणायाम, जप और ध्यान का दृढ़ अभ्यास करता था, उस समय मेरा मन कामोत्तेजक परिस्थितियों में भी कामातुर नहीं होता था। परन्तु जब मैंने अभ्यास छोड़ दिया तो मेरा मन, गलियों में अलंकृत कुल-स्त्रियों को तथा सिनेमा घरों के सामने स्त्रियों के चित्रों को देखकर तुरत आकर्षित हो जाता था। समुद्र तट और माल रोड (माल सड़क) ही मेरे शत्रु हैं।”

श्री भट्टहरि का कथन है—“भोजन के लिये जो कुछ भी भिक्षा द्वारा प्राप्त हो जाय और वह भी नीरस ऐसी भिक्षा

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ध्वजचर्य साधना

को मैं दिन में केवल एक बार करता हूँ; विज्ञाने के लिए केवल पृथ्वी है; परिचर्या के लिये शरीर ही मेरा भूख (नोषर) है; वस्त्र के लिए महलों पट्टियां लगी हुई पुरानी कपल है; ऐसा होने पर भी दुःख इस बात का है कि दुष्ट काम मेरा पीछा नहीं छोड़ता है।”

श्रीमान् जेरोम, यूस्टोचियम नामक कुमारिक से, काम की प्रवलना और संयम-संप्रम के विषय में लिखते हैं:—

“ओ ! जब मैं सूर्य की ताप से संतप्त रेगिस्तान में थकेला रहना था और जब मैं वहां तपस्वियों के रहने योग्य भयंकर निवासस्थान की विजनता का अनुभव करता था, उस समय कई बार मैंने रोम के आनन्दों का चिन्तन किया। मेरे शरीर पर एक फटी पुरानी गुदड़ी थी; मेरे शरीर का चमड़ा हस्त्रियों के समान काला था। प्रति दिन मैं रोता और विलाप करता और यदि अतिच्छा पूर्ण मुझे तिरा आ जाती तो मेरा कुश शरीर ही पृथ्वी पर गिर पड़ता। खाने पीने के संबंध में मैं कुछ नहीं कहता, क्योंकि इस प्रकार के रेगिस्तान में रोगियों तक को भी टंठे पानों के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में भी मैं जो बिपैले सांप विच्छू व जंगली जानवरों के मध्य में रहता हुआ, नरक के भय से अपने आपको इस कारागार का दंड दे रहा था—बहुधा ध्यान में सुन्दर कन्याओं के समुदाय को देखा करता था। भूख के कारण मेरा चहरा पीला पड़ा हुआ था, फिर भी इस दुर्बल शरीर में भी मेरा मन आसना से संतप्त हो रहा था। कामेच्छा की अग्नि मृतक शरीर में भी प्रवलित रहती है।”

कुसंगति का प्रभाव

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कुसंगति का प्रभाव

जब आप किसी नाच पार्टी में उपस्थित होते हैं या जब आप “मिस्ट्रीज ग्रोफ़् दी कोर्ट ग्रोफ़् लंदन” नामक पुस्तक का अध्ययन करते हैं तो आपके मन की स्थिति कैसी होती है ! जब आप बनारस में किसी महान संत की सत्संग सभा में उपस्थित होते हैं या जब आप न्यूयॉर्क में भागीरथी के तट पर किसी एकांत स्थान में निवास करते हैं या जब आप आत्मोन्नति करने वाले उपनिषद् जैसे साहित्यों का अध्ययन करते हैं तो आपकी मनोदशा किस प्रकार की होती है ? तुलना कीजिये और अपनी मानसिक स्थिति के अन्तर को देखिये ।

स्मरण रखिये कि कुसंगति के तुल्य संसार में मनुष्य का सर्वनाश करने वाली अन्ध कोई वस्तु नहीं है । साधकों को चाहिये कि वे कुसंगति का सर्वथा त्याग करें । उन्हें चाहिये कि काम संबंधी श्रयोग्य कहानियों को कभी नहीं सुने तथा धनी मनुष्यों की विलासी-पद्धतियों का भी अनुसरण न करे । उन्हें तीखे भोजन, वाहन (सवारों), राजनीति, शैमी वस्त्र, फूल, इत्र आदि चीजों का भी त्याग करना चाहिये, क्योंकि इनसे मन सहज ही में उत्तेजित हो जाता है । वह (मन) विलासी मनुष्यों के मार्गों का अवलंबन करने लगेगा । वासनायें उत्पन्न होने लगेगी । आसक्ति भी होने लगेगी । जिन स्थानों में अश्लील भजन या गाने गाये जाते हैं, उन स्थानों को भी साधकों को त्याग करना चाहिये ।

अश्लील निवृत्त, असभ्य भाषण और वे उपन्यास जिन में वदिन कहानियों का वर्णन हो,—ये सब ही काम को

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ब्रह्मचर्य साधना

उत्तेजित करने वाले होते हैं। इनसे हृदय में अशिक्ष, सुदृढ़ और अर्वाञ्छित भाव उत्पन्न होते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण, राम, जीसस या भगवान बुद्ध के सुन्दर चित्रों को देखने से तथा सूरदास, तुलसीदास तथा अन्य महात्माओं के प्रभावशाली भजनों को सुनने से हृदय में शिक्ष भाव और वास्तविक भक्ति उत्पन्न होती है। इनसे शरीर में रोमांच होकर प्रेमशुद्धि बढ़ने लगते हैं तथा मन को सहसा भाव समाधि प्राप्त हो जाती है। अब आपको अन्तर स्पष्ट हो गया होगा।

कोई भी वस्तु जिससे मन में अशुद्ध विचार उत्पन्न हों वह कुसंगति है। ऐ मेरे सुयोग्य साथकों! सांसारी मनुष्यों के संग का त्याग कीजिये। संसार के कोलाहल तथा शहरों के शोर गुरुल से दूर रहिये। जो मनुष्य मामारिक विषय संबंधी बात-चीत करते हैं वे आप को शत्रु ही दूषित कर देंगे। आपका मन संशय-युक्त होकर इधर-उधर भटकने लगेगा। आपका पतन हो जायगा। यदि आप किसी एकांत स्थान को जाकर साधु महात्मा के संग में रहें तो आप अवश्य आपति की परिधि से परे रहेंगे। उत्तमशील प्रवीण पुरुषों के आकर्षक तेज और उनकी प्रबल विचार धाराओं का, कामी मनुष्यों के मन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। सत्संग नित्य कीजिये।

स्वप्रदीप

मनुष्य में अथिक शक्ति व्यय होती है। इस कार्य में समूचा नाड़ी मंडल उत्तेजित हो जाता है। परन्तु स्वप्न में जब वीर्य बाहर निकलता है तो ऐसा नहीं होता। इसके अतिरिक्त स्वप्रदीप में वास्तविक सार पदार्थ नहीं आता।

स्वमदोष

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स्वमदोष के समय जो चीज बाहर निकलती है वह केवल शिरन की गिल्टियों का ख़ाव (रस) होता है, जिसके साथ कुछ वीर्य अवश्य मिला रहता है। यह रस भी वीर्य ही का मौलिक (मुख्य) ग्रंश है। इसकी भी रोक होनी चाहिये।

मैथुन से नाड़ी मंडल नष्ट हो जाता है। शक्ति का अत्यधिक ह्रास होता है। स्वमदोष में केवल शिरन की गिल्टियों का रस बाहर निकलता है। यद्यपि वीर्य की भी हानि होती है अवश्य, परन्तु विशेष नहीं क्योंकि इस में वीर्य परनाल की भांति बहकर अधिक बाहर नहीं आता। स्वमदोष कामवासना को उत्तेजित नहीं करता। परन्तु ऐच्छिक मैथुन साधक की आध्यात्मिक उन्नति में अत्यन्त बाधक होता है। इस कार्य से जो संस्कार उत्पन्न होंगे वे बहुत गहरे होंगे जिससे पूर्व संस्कार जो चित्त में पहिले से ही जमे हुए हैं वे और भी अधिक बलवान हो जायेंगे और कामवासना को उत्तेजित करेंगे। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि उस अग्नि में घी डालना जो शनैः शनैः बुझने जा रही है। यह नष्ट संस्कार के उत्पन्न न होने देने का कार्य बड़ा कठिन होगा। आपको मैथुन का पूर्णतया त्याग कर देना चाहिये। मन आपको अनुचित अनुशासन देकर नाना प्रकार से भ्रम (मोह) में डालने का प्रयत्न करेगा। सचेत (सावधान) रहिये। उसकी आत्मा न मानिये परन्तु विवेक बुद्धि के द्वारा आत्मा की आवाज को सुनने का प्रयत्न कीजिए।

शनी को स्वमदोष नहीं होते। जो ब्रह्मचर्य में स्थित है उसको बुरा स्वप्न नहीं होता। स्वप्न आप की मानसिक पवित्रता के माप-तोल का सूचक है। यदि आप को अपवित्र

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ब्रह्मचर्य साधना

स्वप्न नहीं होते तो आप ब्रह्मचर्य या पवित्रता में उन्नति कर रहे हैं।

सदा कौपीन पहनिये। आपको ग्रंथकोष के कोई भी रोग नहीं होंगे। इससे आपको ब्रह्मचर्य के रक्षण में भी सहायता मिलेगी। जब निद्रा में वीर्य-पात होता है तो मन जो सूक्ष्म शरीर में कार्य कर रहा था, वह प्रचंडता से उत्तेजित होकर एकाएक स्थूल शरीर में प्रवेश हो जाता है। स्वप्नदोष का यही कारण है। बहुधा अशुद्ध स्वप्नों के कारण भी ऐसा होता है। जो सात्विक भोजन करते हैं उन्हें स्वप्न दोष नहीं होता। शम, दम, सात्विक भोजन तथा इस पुस्तक के बताए हुए अन्य आध्यात्मिक अभ्यासों के द्वारा इसका अवरोध किया जा सकता है।

स्वप्न दोष प्रायः रात्रि के पिछले पहर में हुआ करते हैं। जो मनुष्य प्रातःकाल तीन और चार बजे के बीच में उठ जाया करते हैं, वे स्वप्न-दोष रूपी रोग से व्यथित नहीं होते। यदि आपको रात्रि में स्वप्न दोष हो जाय तो प्रातःकाल में शीघ्र स्नान कर लेना चाहिए। फिर वीस प्राणायाम कर ध्यान करना चाहिए। और धीरे आप इस रोग से मुक्त हो जायेंगे।

यदि आपको रात्रि में स्वप्न-दोष अधिक होता हो तो सोते समय गीली लंगोट पहिन कर सोइए। 'द्विग्न गाय' (कटि स्नान) लीजिए।

रात्रि में आपको जब जब पेशाब करने की इच्छा हो, शीघ्र ही उठकर पेशाब कीजिए। पेशाब को रोकना

स्वप्नदोष

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ही स्वप्न दोष का अन्य कारण है सोने के पहिले टडी पेशाब करके सोना चाहिए।

यदि आपको हृद कोष्ठवदता (कब्ज) की शिकायत के कारण दस्त साफ नहीं होता है और आंतें मल से भरी रहती हैं, तो इससे भी आपकी शुक्र संबंधी नाड़ियों पर दबाव पड़ेगा और तदनुसार आपको रात्रि में स्वप्न-दोष हो जायगा।

कभी कभी, टडी या पेशाब साफ न आने से, शरीर में गर्मा अधिक रहने से, अधिक घूमने फिरने से, तथा अधिक मिट्टाई, मिर्च और नमक के सेवन से भी स्वप्नदोष हो जाया करता है।

धातु संबंधी दुर्बलता, स्वप्नदोष, कामुक स्वप्न तथा दुराचारी जीवन के अन्य सभी परिणाम मनुष्य के जीवन को दुःखमय बना देंगे, यदि उचित साधना द्वारा उनकी यथा समय रोक न की गई। कैफर मोनोबोमेटा पिल्स Camphor (MonoPills) तथा अन्य प्रकार के मिक्स्चर जैसे Sp. Camphor, Tr. Belladone इत्यादि से भी स्वप्न-दोष का निवारण हो सकता है, परन्तु इनसे भी सदा के लिए रोग का छुटकारा नहीं होता। जब तक दवाई का सेवन किया जाता है, तब तक रोग से केवल क्षणिक मुक्ति मिलती है। पश्चिम के वैद्य लोग भी स्वीकार करते हैं कि इन औषधियों से सदा के लिये रोग से मुक्ति नहीं मिलती। ज्योंही औषधि का सेवन बढ़ गया कि रोग और भी अधिक बढ़ जायगा। कभी कभी ऐसा भी होता है कि इन दवाईयों के कारण रोगी गपु भुक हो जाता है। चिरस्थायी प्रभावशाली चिकित्सा

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ब्रह्मचर्य साधना

तो केवल प्राचीन योग-प्रणाली के द्वारा ही हो सकती है। 'नास्ति योगात् परं बलम्'—योगबल के अतिरिक्त अन्य कोई भी बल नहीं है। यदि आप इस पुस्तक में बताये हुये विभिन्न साधना का नित्य नियमित रूप से अभ्यास करेंगे तो आपको अवश्य सफलता प्राप्त होगी।

दुराचारी जीवन से हानियाँ

आज कल हम क्या देखते हैं? पुस्र और स्त्री, बालक और बालिकायें, अशुद्ध विचार, कामवासना और लुट्ट इन्द्रिय-जनित सुख रूपी सागर में गोता लगा रहे हैं। यह वास्तव में अति शोचनीय दशा है।

कुछ बालकों की कहानियाँ सुनकर आपको वास्तव में दुःख होगा। अस्वाभाविक साधनों के द्वारा वीर्य के अधिक नष्ट हो जाने के कारण, खिन्न चित्त हो कर अपने अन्धकारमय दीन हीन जीवन की शोचनीय दुःखद कथाओं का वर्णन करने के लिए, मेरे पास अनेक कालेज के छात्रगण आया करते हैं। काम के नशे तथा काम की उत्तेजना के कारण उनकी विवेक बुद्धि नष्ट हो गई है। जो शक्ति आप कई सप्ताह और महीनों में प्राप्त करते हैं, उसको अनायास ही क्षणिक सुख के लिए नष्ट कर देना क्या बुद्धिमान्नी है?

मैथुन से अत्यधिक शक्ति का नाश होता है। मैथुन से समूचा नाड़ी मंडल प्रभावित होकर शिथिल पड़ जाता है। स्मरण शक्ति का ह्रास, असामयिक वृद्धावस्था, नपुंसकता, नाना प्रकार के नेत्र-रोग तथा अनेक प्रकार के नाड़ी मंडल संबंधी रोग, वीर्य के अधिक नष्ट होने के कारण उत्पन्न होते हैं। शौर्य और शक्ति के सहित

दुराचारी जीवन से हानियाँ

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द्विप्रगति व स्फूर्ति से गिलहरी की भांति कूदते फादते प्रसन्नता पूर्वक चलने के स्थान में हमारे अधिकांश नव-युवक आज कल वीर्य शक्ति की हीनता के कारण पीतमुख लड़खड़ाते हुए पैरों के साथ ही चलते दिखाई देते हैं। क्या यह वास्तव में शोक जनक अवस्था नहीं है ?

अपने वीर्य को अत्यधिक नष्ट करने वाले मनुष्य छोटी छोटी बातों के लिए कुद्ध हो जाते हैं। उनके मन स्थिर न रह कर छोटी छोटी बातों से उद्विग्न होते रहते हैं। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते, वे क्रोध, ईर्ष्या, आलस्य, भय आदि दुर्गुणों के दास बन जाते हैं। यदि आपकी इन्द्रियाँ आपके वश में नहीं हैं तो आप ऐसे मूर्खता के कार्य करने लगेंगे जिन को करने का साहस एक छोटा बच्चा भी नहीं करेगा।

वीर्य शक्ति के नष्ट हो जाने के पश्चात् जो अनिष्ट परिणाम होते हैं, उन्हें जरा ध्यान पूर्वक देखिये। ब्रह्मचर्य के अभाव में वीर्य शक्ति को इस प्रकार अकारण ही नष्ट कर देने से मनुष्य, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक दुर्बलता को प्राप्त करता है। शरीर और मन उत्साह सहित कार्य नहीं कर सकते। आपको अधिक थकावट और दुर्बलता का अनुभव होगा। नष्ट शक्ति को पुनः प्राप्त करने के लिए आपको दूध, फल तथा अन्य पौष्टिक पदार्थों का सेवन करना आवश्यक प्रतीत होगा। परन्तु स्मरण रहे कि इन चीजों से आपकी हानि की पूर्ति कदापि नहीं हो सकती। एक बार जो खो गया वह सदा के लिए चला गया। आरामो अप्रसन्नता, शिथिलता, उदासीनता तथा

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ब्रह्मचर्य साधना

अन्वकारमय जीवन यापन करना पड़ेगा। शारीरिक और मानसिक शक्ति दिनों दिन क्षीण होती जायगी।

शारीरिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए जीवन में शुद्धता की बड़ी आवश्यकता है। लड़के तथा लड़कियाँ अपने शारीरिक अंगों के दुरुपयोग से मौन रूप में सहते हैं। वे शारीरिक अंग हमारे जीवनतत्त्व (मात्र) के ल्य लिए प्रणाली का काम करते हैं। जिससे मानसिक तथा शारीरिक विकास में बाधा पहुँचती है। यहाँ कारण है कि इस अज्ञानता के कारण आजकल बालक और बालिकाओं को अधिकतर दुःख उठाना पड़ता है। जब हमारे मानवी शरीर में प्राकृतिक रसतरलों की कमी होगी तो हमारे नाड़ी मंडल के शक्तियों में भी उसी अनुपात से अवश्य कमी होगी। यही कारण है कि इन्द्रिय संबंधी व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। व्याधियों की संख्या बढ़ रही है। नवयुवक रक्त हीनता, स्मरणशक्ति का ह्रास तथा दुर्बलता के शिकार बनते हैं। उन्हें अपनी पढ़ाई तक छोड़नी पड़ती है। व्याधियों का विस्तार इस प्रकार हो रहा है कि हजारों वैद्यों तथा डाक्टरों ने अपने अपने औषधालय खोल दिये हैं हजारों प्रकार के इंजेक्शन प्रचलित हो चुके हैं। फिर भी कष्ट दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। लोगों को अपने प्रयत्नों में सफलता प्राप्त नहीं होती। इसका क्या कारण है ? कारण दूर नहीं है। वह दुर्धर्षनों तथा असाधारण मंथन के कारण वीर्य का नाश ही है। वह अशुद्ध मन और अशुद्ध शरीर के कारण ही है।

यदि मनुष्य जीवन में उन्नति प्राप्त करना चाहता

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ब्रह्मचर्य साधना

मन के भीतर प्रचुरता से प्रवेश करें, तो उन्हें रोकने या दवाने का प्रयत्न न कीजिए। अपने इष्ट मन्त्र का जप कीजिए। अपने दोषों तथा दुर्गुणों का विचार न कीजिए। यह पर्याप्त होगा यदि आप अपने दोषों को अच्छी प्रकार से जान लें। दुर्गुणों पर आक्रमण न कीजिए। ऐसा करने पर वे पुनः आप पर आक्रमण करेंगे। “मेरे भीतर इतने दोष और दुर्बलतायें भरी हुई हैं” इस प्रकार की चिंता न कीजिए। सत्य से असत्य पर विजय प्राप्त की जाती है। सात्विक वृत्तियों को उत्पन्न कीजिए। ध्यान और प्रतिपत्तु भावना के द्वारा शुद्ध सात्विक गुणों की वृद्धि होने से अशुद्ध दुर्गुणों का आप ही नाश हो जायगा। यह उचित रीति है।

दुर्विचार

मन में कुविचार के प्रवेश करते ही इन्द्रिय में उत्तेजना उत्पन्न हो जाती है। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है? क्योंकि यह बहुधा वारंवार हुआ करता है, इस लिए आपको इसमें कुछ आश्चर्य प्रतीत नहीं होता। शक्तिशाली सूर्य के उदय होते ही अखिल विश्व देदीप्यमान हो जाता है। यह भी एक महान् आश्चर्य है, आश्चर्यों का आश्चर्य है। क्योंकि नित्यप्रति ऐसा होता है, इसलिए आप इसे एक साधारण घटना समझते हैं। आत्मारूपी एक ही ज्ञान सूर्य सर्व मस्तिकों को प्रकाशमान करता है। यह आश्चर्यों का आश्चर्य है। अज्ञानता के कारण आप इस परमावश्यक विषय को तुच्छ समझते हैं। मन विदुषुत (विजली) की बड़ी शैटरी (यंत्र) है। वह वास्तव में एक डायनेमो (विजली पैदा करने का यंत्र)

दुविचार

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है। वह एक बिजली घर है। नाड़ियां बिजली के तार हैं जिनके द्वारा उत्तेजना रूपी बिजली धारायें हाथ पैरादि नाना प्रकार के इन्द्रियगण तक पहुँचाई जाती हैं। यदि आप नींबू या इमली के रस को किसी सोने के बर्तन में रखते हैं, तो वह दूषित या विषैला नहीं होता। यदि आप उसे पीतल या तांबे के बर्तन में रखते हैं तो वह अवश्य दूषित होकर विषैला हो जायगा। ठीक उसी प्रकार यदि किसी ऐसे मनुष्य के मत में जो नित्य ध्यान का अभ्यास करता है कुछ विषय वृत्तियां उत्पन्न हों भी तो वे उसमें विकार या कामुक उत्तेजना उत्पन्न नहीं करतीं और न उसे अपवित्र ही बना सकती हैं। इसके विपरीत अशुद्ध मनस वाले मनुष्यों के भीतर यदि विषय वृत्तियां हैं तो वे उनमें विषय पदार्थों के देखते ही, कामोत्तेजना उत्पन्न कर देंगी।

काम, कोष, लोभ, द्वेष, दंभ, अहंकार, चालाकी, कूटनीति आदि आंतरिक कंटक कहे जाते हैं। कुछ बाहरी कंटक भी हैं जैसे कुसंगति, अश्लील चित्र, उपन्यास, अश्लील गायन, सिनेमा आदि। कोई भी वस्तु जो मन में अशुद्ध विचार उत्पन्न करे, वास्तव में वही कुसंगति है। पशुओं को भोग करते देखना भी एक प्रकार की कुसंगति है, क्योंकि उससे मन में कामवासनायें उत्तेजित हो जाती हैं। क्या आप नहीं जानते कि दो मछलियों को भोग करते देख एक मूषिक के मन में भी कामवासना उत्तेजित हो गई थी ?

मुख्य प्राण के कंपन होने के कारण मन में विचार का संचलन होता है। यह विचार शक्ति महान् विद्युत

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ब्रह्मचर्य साधना

गति के साथ नाड़ी मंडल के द्वारा दूरस्थ इन्द्रियों तक पहुँच जाती है। यह स्थूल शरीर एक मांसल सांन्ना है, जिसको मन ने ही अपने अनुभव और सुख के लिए, संस्कार और वासनाओं के द्वारा बनाया है। वह अशिक्षित कामुक मनुष्य की प्रचंड-द्रोही इन्द्रियों को प्रवृत्त कर देता है। वही मन एक अनुशासित जितेन्द्रिय योगी का आशाकारी, स्वामी-भक्त सेवक बन जाता है। सजग ब्रह्मचारी को नित्य अपने विचारों पर पूर्ण सावधानी के साथ दृष्टि रखनी चाहिए। उसे चाहिए कि वह किसी भी वृषित विचार को अपने मन रूपी कारखाने के द्वार में न प्रवेश होने दे। यदि उसका मन अपने लक्ष्य (ध्यान का पदार्थ) पर पूर्णतया स्थित है तो फिर दुर्विचार के मन में प्रवेश करने के लिए कोई स्थान ही नहीं है। यदि कोई दुर्विचार मन के कूट द्वार से प्रवेश हो भी जाय तो मनुष्य को चाहिए कि वह उसे स्वीकार ही न करे। यदि उसने उसे ग्रहण कर लिया तो वह विचार-धारा समस्त शरीर में फैल जायगी। इन्द्रियों और समस्त नाड़ी मंडल प्रज्वलित होने लगेंगी। यह अत्यन्त मार्मिक स्थिति है।

दुर्विचार के उत्पन्न होते ही उसे प्रतिपक्ष-भावना प्रयाली के अनुसार, शुद्ध सात्विक विचारों द्वारा जड़ से उखाड़ कर फेंक देना चाहिए। यदि आपकी इच्छा शक्ति दृढ़ है तो वह दुर्विचार वृत्त ही दकेल दिया जा सकता है। प्राणायाम, प्रार्थना, आत्म विचार, ध्यान, सत्संग आदि के द्वारा दुर्विचारों को मानसिक-शिल्प शाला के प्रवेश-द्वार पर ही विनष्ट किया जा सकता है। आरंभ में शुद्ध होगा। जब आप शुद्ध हो जायेंगे, जब आपकी इच्छा

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ब्रह्मचर्य साधना

“यन्मनसा ध्यायति तद् वाचा वदति । यद् वाचा वदति तद् कर्मणा करोति ॥”

अर्थात् जिसका मन से विचार किया जाता है वही वाणी बोलती है; जो वाणी बोलती है वही इन्द्रियों द्वारा किया जाता है । यही कारण है कि वेदों में कहा गया है “तन्मेमनः शुभ कल्पयत्” अर्थात् मेरा मन शुभ संकल्प ही किया करें । शुभ विचारों को ग्रहण कीजिए । जिस प्रकार लकड़ी के तख्ते में एक पुरानी कील के ऊपर एक नई कील को ठोंक देने से पुरानी कील आप ही बाहर निकल पड़ती है, ठीक उसी प्रकार एक नये शुद्ध सात्त्विक विचार के द्वारा पुराना दुर्विचार आप ही दूर हो जाता ।

नेत्र मन की खिड़की है । यदि मन पवित्र और शान्त है तो नेत्र भी पवित्र और शान्त होंगे । जो मनुष्य ब्रह्मचर्य में स्थित हैं उनके नेत्र चमकीले, वासी मीठी और आकृति सुन्दर होगी ।

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छठा अध्याय

मन, प्राण और वीर्य

मन, प्राण और वीर्य एक हैं। दूध और पानी की भांति मन और प्राण का संबंध है। मन, प्राण और वीर्य का एक ही संबंध है। यदि मन को अधीन कर लिया जाता है तो प्राण और वीर्य स्वयं अधीन हो जाते हैं। जो मनुष्य प्राण का निरोध करता है, तो उसके मन का व्यापार और वीर्य की गति आप ही आप कम हो जाती है। पुनः यदि वीर्य पर अधिकार किया जाता है और यदि उसे पवित्र विचारों और विपरीतकरनी मुद्राओं के द्वारा ऊर्ध्वरेता (यानी वीर्य को ऊपर की ओर मस्तिष्क में ले जाना) बनाया जाता है तो मन और प्राण स्वयं यश में हो जाते हैं। मन और इन्द्रियों में घनिष्ठ संबंध

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ब्रह्मचर्य

है। मन चेष्टा करता है और पंच-ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा इस संसार के अनुभवों को ग्रहण करता है। वह ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ही आनन्द को प्राप्त करता है। वह कर्मेन्द्रियों से दृष्टपूर्वक काम करवाता है। अतः इन्द्रियों को वश में करना वास्तव में मन ही को वश में करना है। यम, नियम, शम, दम, प्रत्याहार आदि के अभ्यास का उद्देश्य मन और इन्द्रियों को वश में करना ही है।

मन पंच ज्ञानेन्द्रियों के सहयोग से शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध के द्वारा आनन्द प्राप्त करता है। स्पर्श के द्वारा वह उत्तम आनन्द का अनुभव करता है। मैथुन का सुख ही मन के लिए एक विशिष्ट (सब से उत्तम) सुख है। प्रत्येक मनुष्य उसी सुख के पीछे दौड़ता है और उसी में समाप्त हो जाता है। अब रस (उत्तम खान पान) को लीजिए। रूप, आकार और सुन्दरता का सुख है। शब्द, वाद्य से प्राप्त होने वाला सुख है। अन्त में गंध को लीजिए। गंध की इन्द्रिय इतनी दुखदाई नहीं है जितनी रस की। यदि स्वादेन्द्रिय या जिह्वा वश में हो जाती है तो अन्य सब इन्द्रियां स्वयं वश में हो जाती हैं।

जिसने मन को वश में कर लिया उसने प्राण को भी वश में कर लिया। मन दो रूपों से कार्यनिमित्त होता है प्राण और वासनाओं के स्पन्दन से। यदि इन दोनों में से एक नष्ट हो जाय तो दूसरी वस्तु आप ही नष्ट हो जाती है। जब मन स्थिर होता है तो प्राण भी स्थिर हो जाता है। जब प्राण स्थिर होता है तो मन भी स्थिर होता है। जब मन और प्राण स्थिर नहीं होते तो सब इन्द्रियां चंचलता पूर्वक अपने अपने कार्यों में निमग्न रहती हैं।

मन, प्राण और वीर्य

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जीवन एक बहुत बड़ी सरिता है। इन्द्रियां उसमें पानी हैं। काम, क्रोध और लोभ रूपी उसमें बड़े बड़े मगर-मच्छ आदि जलचर हैं। जन्म और मरण रूपी दो भँवर हैं। ज्ञानी मनुष्य आत्म संयम और विचार रूपी नौका के द्वारा इस सरिता को पार करता है।

भूम शब्देन्द्रिय की प्रबलता के कारण जाल में फँस कर अपने प्राण गँवा देता है; इसी प्रकार हाथी, पतंग, मछली, तथा भ्रमर क्रमशः स्पर्श, रूप, रस तथा प्राणोन्द्रिय की प्रबलता के कारण अपने प्राणों को समाप्त कर देते हैं। जब एक ही इन्द्रिय की प्रबलता ऐसी है तो फिर मनुष्य की पंचेन्द्रियों के युक्त प्रभाव की प्रबलता किस प्रकार की होगी, उसे पाठक स्वयं समझ सकते हैं।

जिस प्रकार खनिज पदार्थों की अशुद्धता धौकनी के द्वारा जलाकर भस्म कर दी जाती है, ठीक उसी प्रकार इन्द्रियों के कलंक भी प्राणों के निरोध के द्वारा दग्ध किये जाते हैं। अतः प्राणायाम का नियम अभ्यास करना चाहिये। वह अत्यन्त परिसोधक है।

सामान्य मनुष्यों को मन पर अधिकार नहीं होता। मन इधर उधर भागता रहता है। वह विध्वंस करता है। वह मनुष्य पर अधिकार जमाता है। वह नियं हल चल और कलह की स्थिति में रहता है। उसमें भावनायें और प्रवृत्तियां उठती रहती हैं। वह इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण किये इच्छित पदार्थों के चित्रों से हर समय प्रभावित होता रहता है। प्रत्येक इन्द्रिय, अपनी वृत्ति के लिये मन को अपने विशेष भोग-पदार्थ की ओर खींचती रहती है। कर्ण जब कभी मीठी तान को सुन पाता है तो मन को अपनी

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ब्रह्मचर्य साधना

और र्खाचिता है। जिह्वा मन को काफी की बुकानों की ओर भगा कर ले जाती है। मन के लिए एक सूख भी विश्राम नहीं है? चित्ता, शोक, आकुलता, भय, व्याधियां, दुर्बल्य, घृणा, काम, कोष, आदि मन के भीतर हल चल मचाते रहते हैं तथा उसको निरन्तर संतप्त करते रहते हैं। जिसने अपने विचार, भावनायें, चित्त-वृत्तियां, प्रेरणायें तथा अपनी इन्द्रियों पर आधिपत्य प्राप्त किया है वह वास्तव में सम्राटों का सम्राट् है। वह धन्य है। ब्रह्मचर्य के पूर्णतया रक्षण के लिये सब इन्द्रियों पर सर्वथा आधिपत्य प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है।

प्रतिक्रिया के संबंध में आपको अत्यन्त सावधान रहना पड़ेगा। जिन इन्द्रियों को आपने महीनों और वर्षों पर्यन्त वश में रखा है वे ही इन्द्रियां तनिक ही असावधानी के कारण उपद्रवी हो सकती हैं। अबसर प्राप्त होते ही वे आप पर बलात् आक्रमण करेंगी। कुछ लोग जो एक या दी-वर्षों तक ब्रह्मचर्य का अभ्यास करते हैं वे ही अनन्तर अधिक कामी होकर अपनी वीर्य शक्ति का अधिक नाश करते हैं। अन्त में वे असाध्य दुराचार भी बन जाते हैं।

यह के एक भूत पर नियन्त्रण रखना कितना कठिन है। शरीर की एक इन्द्रिय को अपने आधीन रखना कितना अधिक कठिन है। पुनः यदि पांचों इन्द्रियों को एक साथ वश में रखना है, तो आप समझ सकते हैं कि वह और भी कितना अधिक कठिन होगा। वह योगी जो जितेन्द्रिय है वह इस संसार में एक प्रभान शास्त्री महाराजा ॥

वासनाओं की इतिथी कीजिये

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वासनाओं की इतिथी कीजिये

वासना, चित्त रूपी सरोवर में एक प्रकार की लहर है। पदार्थों के प्रति जो आकर्षण और आसक्ति होती है उसका कारण वासना है; वही बंधन का कारण है।

यदि आपके मन में वासना नहीं है तो आप का किसी भी व्यक्ति के प्रति आकर्षण नहीं होगा। मन में उत्पन्न होने वाली वासनाओं पर आक्रमण करने के लिए, विज्ञान-मय कोश साधक के लिए एक दुर्ग का कार्य करता है। शम के अभ्यास के द्वारा आप सब वासनाओं का एक एक करके नाश कर सकते हैं। आप बुद्धि के द्वारा विवेक से सहायता प्राप्त कर सकते हैं। ब्रह्मचर्य की प्राप्ति में वासना के त्याग से पूरी पूरी सहायता मिलती है।

वासना ही मन की अशांति का कारण है। ज्योंही वासना प्रकट होती है, त्योंही विषय-वृत्ति-प्रवाह के द्वारा मन और इच्छित पदार्थ के बीच में एक आत्मीय संबंध स्थापित हो जाता है। मन कदापि पीछे नहीं हटेगा, जब तक कि वह बान्छित पदार्थ को प्राप्त कर उसका उपभोग न कर लेगा। जब तक भोग प्राप्त न होगा, तब तक मन में अशांति ज्यों की त्यों बनी रहेगी। वृत्ति पदार्थ की ओर भागी रहेगी जब तक वह उसे प्राप्त कर उसका उपभोग न कर ले। सामान्य मनुष्य दुर्बल इच्छा के कारण किसी भी वासना को दबा नहीं सकते। जिससे किसी भी वासना को दबा सकता है। परन्तु ज्यों-उपयुक्त प्रवृत्ति प्राप्त हुआ कि वह द्विगुण-शक्ति के द्वारा पुनः प्रकट हो जाती है। जब सब वासनाओं का सर्वथा नाश हो जायगा तो फिर किसी भी बाहरी पदार्थ के