भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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स्वमदोष

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स्वमदोष के समय जो चीज बाहर निकलती है वह केवल शिरन की गिल्टियों का ख़ाव (रस) होता है, जिसके साथ कुछ वीर्य अवश्य मिला रहता है। यह रस भी वीर्य ही का मौलिक (मुख्य) ग्रंश है। इसकी भी रोक होनी चाहिये।

मैथुन से नाड़ी मंडल नष्ट हो जाता है। शक्ति का अत्यधिक ह्रास होता है। स्वमदोष में केवल शिरन की गिल्टियों का रस बाहर निकलता है। यद्यपि वीर्य की भी हानि होती है अवश्य, परन्तु विशेष नहीं क्योंकि इस में वीर्य परनाल की भांति बहकर अधिक बाहर नहीं आता। स्वमदोष कामवासना को उत्तेजित नहीं करता। परन्तु ऐच्छिक मैथुन साधक की आध्यात्मिक उन्नति में अत्यन्त बाधक होता है। इस कार्य से जो संस्कार उत्पन्न होंगे वे बहुत गहरे होंगे जिससे पूर्व संस्कार जो चित्त में पहिले से ही जमे हुए हैं वे और भी अधिक बलवान हो जायेंगे और कामवासना को उत्तेजित करेंगे। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि उस अग्नि में घी डालना जो शनैः शनैः बुझने जा रही है। यह नष्ट संस्कार के उत्पन्न न होने देने का कार्य बड़ा कठिन होगा। आपको मैथुन का पूर्णतया त्याग कर देना चाहिये। मन आपको अनुचित अनुशासन देकर नाना प्रकार से भ्रम (मोह) में डालने का प्रयत्न करेगा। सचेत (सावधान) रहिये। उसकी आत्मा न मानिये परन्तु विवेक बुद्धि के द्वारा आत्मा की आवाज को सुनने का प्रयत्न कीजिए।

शनी को स्वमदोष नहीं होते। जो ब्रह्मचर्य में स्थित है उसको बुरा स्वप्न नहीं होता। स्वप्न आप की मानसिक पवित्रता के माप-तोल का सूचक है। यदि आप को अपवित्र