भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

उत्तेजित करने वाले होते हैं। इनसे हृदय में अशिक्ष, सुदृढ़ और अर्वाञ्छित भाव उत्पन्न होते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण, राम, जीसस या भगवान बुद्ध के सुन्दर चित्रों को देखने से तथा सूरदास, तुलसीदास तथा अन्य महात्माओं के प्रभावशाली भजनों को सुनने से हृदय में शिक्ष भाव और वास्तविक भक्ति उत्पन्न होती है। इनसे शरीर में रोमांच होकर प्रेमशुद्धि बढ़ने लगते हैं तथा मन को सहसा भाव समाधि प्राप्त हो जाती है। अब आपको अन्तर स्पष्ट हो गया होगा।

कोई भी वस्तु जिससे मन में अशुद्ध विचार उत्पन्न हों वह कुसंगति है। ऐ मेरे सुयोग्य साथकों! सांसारी मनुष्यों के संग का त्याग कीजिये। संसार के कोलाहल तथा शहरों के शोर गुरुल से दूर रहिये। जो मनुष्य मामारिक विषय संबंधी बात-चीत करते हैं वे आप को शत्रु ही दूषित कर देंगे। आपका मन संशय-युक्त होकर इधर-उधर भटकने लगेगा। आपका पतन हो जायगा। यदि आप किसी एकांत स्थान को जाकर साधु महात्मा के संग में रहें तो आप अवश्य आपति की परिधि से परे रहेंगे। उत्तमशील प्रवीण पुरुषों के आकर्षक तेज और उनकी प्रबल विचार धाराओं का, कामी मनुष्यों के मन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। सत्संग नित्य कीजिये।

स्वप्रदीप

मनुष्य में अथिक शक्ति व्यय होती है। इस कार्य में समूचा नाड़ी मंडल उत्तेजित हो जाता है। परन्तु स्वप्न में जब वीर्य बाहर निकलता है तो ऐसा नहीं होता। इसके अतिरिक्त स्वप्रदीप में वास्तविक सार पदार्थ नहीं आता।