भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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कुसंगति का प्रभाव

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कुसंगति का प्रभाव

जब आप किसी नाच पार्टी में उपस्थित होते हैं या जब आप “मिस्ट्रीज ग्रोफ़् दी कोर्ट ग्रोफ़् लंदन” नामक पुस्तक का अध्ययन करते हैं तो आपके मन की स्थिति कैसी होती है ! जब आप बनारस में किसी महान संत की सत्संग सभा में उपस्थित होते हैं या जब आप न्यूयॉर्क में भागीरथी के तट पर किसी एकांत स्थान में निवास करते हैं या जब आप आत्मोन्नति करने वाले उपनिषद् जैसे साहित्यों का अध्ययन करते हैं तो आपकी मनोदशा किस प्रकार की होती है ? तुलना कीजिये और अपनी मानसिक स्थिति के अन्तर को देखिये ।

स्मरण रखिये कि कुसंगति के तुल्य संसार में मनुष्य का सर्वनाश करने वाली अन्ध कोई वस्तु नहीं है । साधकों को चाहिये कि वे कुसंगति का सर्वथा त्याग करें । उन्हें चाहिये कि काम संबंधी श्रयोग्य कहानियों को कभी नहीं सुने तथा धनी मनुष्यों की विलासी-पद्धतियों का भी अनुसरण न करे । उन्हें तीखे भोजन, वाहन (सवारों), राजनीति, शैमी वस्त्र, फूल, इत्र आदि चीजों का भी त्याग करना चाहिये, क्योंकि इनसे मन सहज ही में उत्तेजित हो जाता है । वह (मन) विलासी मनुष्यों के मार्गों का अवलंबन करने लगेगा । वासनायें उत्पन्न होने लगेगी । आसक्ति भी होने लगेगी । जिन स्थानों में अश्लील भजन या गाने गाये जाते हैं, उन स्थानों को भी साधकों को त्याग करना चाहिये ।

अश्लील निवृत्त, असभ्य भाषण और वे उपन्यास जिन में वदिन कहानियों का वर्णन हो,—ये सब ही काम को