भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ध्वजचर्य साधना

को मैं दिन में केवल एक बार करता हूँ; विज्ञाने के लिए केवल पृथ्वी है; परिचर्या के लिये शरीर ही मेरा भूख (नोषर) है; वस्त्र के लिए महलों पट्टियां लगी हुई पुरानी कपल है; ऐसा होने पर भी दुःख इस बात का है कि दुष्ट काम मेरा पीछा नहीं छोड़ता है।”

श्रीमान् जेरोम, यूस्टोचियम नामक कुमारिक से, काम की प्रवलना और संयम-संप्रम के विषय में लिखते हैं:—

“ओ ! जब मैं सूर्य की ताप से संतप्त रेगिस्तान में थकेला रहना था और जब मैं वहां तपस्वियों के रहने योग्य भयंकर निवासस्थान की विजनता का अनुभव करता था, उस समय कई बार मैंने रोम के आनन्दों का चिन्तन किया। मेरे शरीर पर एक फटी पुरानी गुदड़ी थी; मेरे शरीर का चमड़ा हस्त्रियों के समान काला था। प्रति दिन मैं रोता और विलाप करता और यदि अतिच्छा पूर्ण मुझे तिरा आ जाती तो मेरा कुश शरीर ही पृथ्वी पर गिर पड़ता। खाने पीने के संबंध में मैं कुछ नहीं कहता, क्योंकि इस प्रकार के रेगिस्तान में रोगियों तक को भी टंठे पानों के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में भी मैं जो बिपैले सांप विच्छू व जंगली जानवरों के मध्य में रहता हुआ, नरक के भय से अपने आपको इस कारागार का दंड दे रहा था—बहुधा ध्यान में सुन्दर कन्याओं के समुदाय को देखा करता था। भूख के कारण मेरा चहरा पीला पड़ा हुआ था, फिर भी इस दुर्बल शरीर में भी मेरा मन आसना से संतप्त हो रहा था। कामेच्छा की अग्नि मृतक शरीर में भी प्रवलित रहती है।”