भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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दुराचारी जीवन से हानियाँ

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द्विप्रगति व स्फूर्ति से गिलहरी की भांति कूदते फादते प्रसन्नता पूर्वक चलने के स्थान में हमारे अधिकांश नव-युवक आज कल वीर्य शक्ति की हीनता के कारण पीतमुख लड़खड़ाते हुए पैरों के साथ ही चलते दिखाई देते हैं। क्या यह वास्तव में शोक जनक अवस्था नहीं है ?

अपने वीर्य को अत्यधिक नष्ट करने वाले मनुष्य छोटी छोटी बातों के लिए कुद्ध हो जाते हैं। उनके मन स्थिर न रह कर छोटी छोटी बातों से उद्विग्न होते रहते हैं। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते, वे क्रोध, ईर्ष्या, आलस्य, भय आदि दुर्गुणों के दास बन जाते हैं। यदि आपकी इन्द्रियाँ आपके वश में नहीं हैं तो आप ऐसे मूर्खता के कार्य करने लगेंगे जिन को करने का साहस एक छोटा बच्चा भी नहीं करेगा।

वीर्य शक्ति के नष्ट हो जाने के पश्चात् जो अनिष्ट परिणाम होते हैं, उन्हें जरा ध्यान पूर्वक देखिये। ब्रह्मचर्य के अभाव में वीर्य शक्ति को इस प्रकार अकारण ही नष्ट कर देने से मनुष्य, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक दुर्बलता को प्राप्त करता है। शरीर और मन उत्साह सहित कार्य नहीं कर सकते। आपको अधिक थकावट और दुर्बलता का अनुभव होगा। नष्ट शक्ति को पुनः प्राप्त करने के लिए आपको दूध, फल तथा अन्य पौष्टिक पदार्थों का सेवन करना आवश्यक प्रतीत होगा। परन्तु स्मरण रहे कि इन चीजों से आपकी हानि की पूर्ति कदापि नहीं हो सकती। एक बार जो खो गया वह सदा के लिए चला गया। आरामो अप्रसन्नता, शिथिलता, उदासीनता तथा