ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
अन्वकारमय जीवन यापन करना पड़ेगा। शारीरिक और मानसिक शक्ति दिनों दिन क्षीण होती जायगी।
शारीरिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए जीवन में शुद्धता की बड़ी आवश्यकता है। लड़के तथा लड़कियाँ अपने शारीरिक अंगों के दुरुपयोग से मौन रूप में सहते हैं। वे शारीरिक अंग हमारे जीवनतत्त्व (मात्र) के ल्य लिए प्रणाली का काम करते हैं। जिससे मानसिक तथा शारीरिक विकास में बाधा पहुँचती है। यहाँ कारण है कि इस अज्ञानता के कारण आजकल बालक और बालिकाओं को अधिकतर दुःख उठाना पड़ता है। जब हमारे मानवी शरीर में प्राकृतिक रसतरलों की कमी होगी तो हमारे नाड़ी मंडल के शक्तियों में भी उसी अनुपात से अवश्य कमी होगी। यही कारण है कि इन्द्रिय संबंधी व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। व्याधियों की संख्या बढ़ रही है। नवयुवक रक्त हीनता, स्मरणशक्ति का ह्रास तथा दुर्बलता के शिकार बनते हैं। उन्हें अपनी पढ़ाई तक छोड़नी पड़ती है। व्याधियों का विस्तार इस प्रकार हो रहा है कि हजारों वैद्यों तथा डाक्टरों ने अपने अपने औषधालय खोल दिये हैं हजारों प्रकार के इंजेक्शन प्रचलित हो चुके हैं। फिर भी कष्ट दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। लोगों को अपने प्रयत्नों में सफलता प्राप्त नहीं होती। इसका क्या कारण है ? कारण दूर नहीं है। वह दुर्धर्षनों तथा असाधारण मंथन के कारण वीर्य का नाश ही है। वह अशुद्ध मन और अशुद्ध शरीर के कारण ही है।
यदि मनुष्य जीवन में उन्नति प्राप्त करना चाहता