भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य साधना

मन के भीतर प्रचुरता से प्रवेश करें, तो उन्हें रोकने या दवाने का प्रयत्न न कीजिए। अपने इष्ट मन्त्र का जप कीजिए। अपने दोषों तथा दुर्गुणों का विचार न कीजिए। यह पर्याप्त होगा यदि आप अपने दोषों को अच्छी प्रकार से जान लें। दुर्गुणों पर आक्रमण न कीजिए। ऐसा करने पर वे पुनः आप पर आक्रमण करेंगे। “मेरे भीतर इतने दोष और दुर्बलतायें भरी हुई हैं” इस प्रकार की चिंता न कीजिए। सत्य से असत्य पर विजय प्राप्त की जाती है। सात्विक वृत्तियों को उत्पन्न कीजिए। ध्यान और प्रतिपत्तु भावना के द्वारा शुद्ध सात्विक गुणों की वृद्धि होने से अशुद्ध दुर्गुणों का आप ही नाश हो जायगा। यह उचित रीति है।

दुर्विचार

मन में कुविचार के प्रवेश करते ही इन्द्रिय में उत्तेजना उत्पन्न हो जाती है। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है? क्योंकि यह बहुधा वारंवार हुआ करता है, इस लिए आपको इसमें कुछ आश्चर्य प्रतीत नहीं होता। शक्तिशाली सूर्य के उदय होते ही अखिल विश्व देदीप्यमान हो जाता है। यह भी एक महान् आश्चर्य है, आश्चर्यों का आश्चर्य है। क्योंकि नित्यप्रति ऐसा होता है, इसलिए आप इसे एक साधारण घटना समझते हैं। आत्मारूपी एक ही ज्ञान सूर्य सर्व मस्तिकों को प्रकाशमान करता है। यह आश्चर्यों का आश्चर्य है। अज्ञानता के कारण आप इस परमावश्यक विषय को तुच्छ समझते हैं। मन विदुषुत (विजली) की बड़ी शैटरी (यंत्र) है। वह वास्तव में एक डायनेमो (विजली पैदा करने का यंत्र)