भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य साधना

गति के साथ नाड़ी मंडल के द्वारा दूरस्थ इन्द्रियों तक पहुँच जाती है। यह स्थूल शरीर एक मांसल सांन्ना है, जिसको मन ने ही अपने अनुभव और सुख के लिए, संस्कार और वासनाओं के द्वारा बनाया है। वह अशिक्षित कामुक मनुष्य की प्रचंड-द्रोही इन्द्रियों को प्रवृत्त कर देता है। वही मन एक अनुशासित जितेन्द्रिय योगी का आशाकारी, स्वामी-भक्त सेवक बन जाता है। सजग ब्रह्मचारी को नित्य अपने विचारों पर पूर्ण सावधानी के साथ दृष्टि रखनी चाहिए। उसे चाहिए कि वह किसी भी वृषित विचार को अपने मन रूपी कारखाने के द्वार में न प्रवेश होने दे। यदि उसका मन अपने लक्ष्य (ध्यान का पदार्थ) पर पूर्णतया स्थित है तो फिर दुर्विचार के मन में प्रवेश करने के लिए कोई स्थान ही नहीं है। यदि कोई दुर्विचार मन के कूट द्वार से प्रवेश हो भी जाय तो मनुष्य को चाहिए कि वह उसे स्वीकार ही न करे। यदि उसने उसे ग्रहण कर लिया तो वह विचार-धारा समस्त शरीर में फैल जायगी। इन्द्रियों और समस्त नाड़ी मंडल प्रज्वलित होने लगेंगी। यह अत्यन्त मार्मिक स्थिति है।

दुर्विचार के उत्पन्न होते ही उसे प्रतिपक्ष-भावना प्रयाली के अनुसार, शुद्ध सात्विक विचारों द्वारा जड़ से उखाड़ कर फेंक देना चाहिए। यदि आपकी इच्छा शक्ति दृढ़ है तो वह दुर्विचार वृत्त ही दकेल दिया जा सकता है। प्राणायाम, प्रार्थना, आत्म विचार, ध्यान, सत्संग आदि के द्वारा दुर्विचारों को मानसिक-शिल्प शाला के प्रवेश-द्वार पर ही विनष्ट किया जा सकता है। आरंभ में शुद्ध होगा। जब आप शुद्ध हो जायेंगे, जब आपकी इच्छा