ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
“यन्मनसा ध्यायति तद् वाचा वदति । यद् वाचा वदति तद् कर्मणा करोति ॥”
अर्थात् जिसका मन से विचार किया जाता है वही वाणी बोलती है; जो वाणी बोलती है वही इन्द्रियों द्वारा किया जाता है । यही कारण है कि वेदों में कहा गया है “तन्मेमनः शुभ कल्पयत्” अर्थात् मेरा मन शुभ संकल्प ही किया करें । शुभ विचारों को ग्रहण कीजिए । जिस प्रकार लकड़ी के तख्ते में एक पुरानी कील के ऊपर एक नई कील को ठोंक देने से पुरानी कील आप ही बाहर निकल पड़ती है, ठीक उसी प्रकार एक नये शुद्ध सात्त्विक विचार के द्वारा पुराना दुर्विचार आप ही दूर हो जाता ।
नेत्र मन की खिड़की है । यदि मन पवित्र और शान्त है तो नेत्र भी पवित्र और शान्त होंगे । जो मनुष्य ब्रह्मचर्य में स्थित हैं उनके नेत्र चमकीले, वासी मीठी और आकृति सुन्दर होगी ।
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