भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य (बिन्दु-संरक्षण)

‘ब्रह्मचर्य’ का अभिप्राय वीर्य-रक्षा से है । वीर्य सम्पूर्ण शरीर का सार है । प्रभु के द्वारा प्रदान की गयी जीवनी-शक्ति (वीर्य) यह प्रभु की अद्भुत कृपा है । मनुष्य जिस मार्ग में भी चलना चाहे, ब्रह्मचर्य (बिन्दु-संरक्षण) से उसको बहुत बड़ा बल यानी बहुत बड़ी सामर्थ्य मिलती है क्योंकि ब्रह्मचर्य सम्पूर्ण शक्तियों का खजाना है -

‘वीर्यमेव बलम्, बलमेव वीर्यम् ।’

वीर्य ही बल है और बल का नाम ही वीर्य है । आज तक संसार में जितने भी बड़े-बड़े बलवान् योद्धा या प्रतिभावान् पुरुष हुए, सबको ब्रह्मचर्य का आश्रय लेना पड़ा क्योंकि बिना वीर्यरक्षा के शारीरिक बल तथा मनोबल किसी को प्राप्त हो ही नहीं सकता है ।

दीर्घ-जीवन, उत्तम-स्वास्थ्य, दिव्य-ज्ञान तथा अखण्ड-स्मृति आदि की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्य ही परम साधन है । यहाँ तक कि -

‘ब्रह्मर्चण तपसा देवा मृत्युमपाश्रत ।’

ब्रह्मचर्य रूपी तप से देवताओं ने मृत्यु तक को जीत लिया अर्थात् अमरत्व की प्राप्ति की । ऐसी सामर्थ्य ब्रह्मचर्य में है । लेकिन आज का दूषित वातावरण अमरत्व या देवत्व प्रदायक ब्रह्मचर्य को धूलि-धूसरित कर रहा है । जिसको आज के लोग मनोरंजन (मौज-मस्ती) समझ रहे हैं वह सर्वनाश का रास्ता है -

‘आयुर्वीर्यं यशश्चैव हन्यतेऽब्रह्मचर्या ।’

अर्थात् ब्रह्मचर्य के हास से आयु, वीर्य, यश, सुख, आरोग्य, तेज, बल (सामर्थ्य), विद्या, धर्म और भजन आदि सबका नाश हो जाता है ।

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