भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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जो धर्म-मर्यादा, शास्त्र-मर्यादा का उल्लंघन करके ब्रह्मचर्य को नष्ट कर रहे हैं, क्या वे कभी स्वप्न में भी सुख या शान्ति प्राप्त कर सकते हैं ? भगवान् श्रीकृष्ण के वचन हैं -

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ (गी. १६/२३)

‘जो पुरुष शास्त्र विधि की अवहेलना करके, मनमाना आचरण करता है, उसे न सिद्धि प्राप्त होती है, न परमगति और न ही सुख-शान्ति ।’

इसलिए सदैव शास्त्र और संतों की बनायी हुई मर्यादा के अनुसार ही सबको चलना चाहिए, तभी लोक और परलोक दोनों में सुख और शान्ति प्राप्त हो सकती है अन्यथा असंभव है ।

ये जो आजकल चल रहा है यानी वीर्य का मनोरंजन में नाश किया जा रहा है, ये बहुत ही हानिकारक है । जिसके जीवन में है, वह तुरंत छोड़ दे । जिस वीर्य-शक्ति से सुन्दर संतान की उत्पत्ति होती है, उसी वीर्य शक्ति को जो मनोरंजन में नष्ट कर रहे हैं, वे हत्यारे हैं। गोरखनाथ जी ने लिखा है -

वीर्य की एक बूँद में जीव बसें नौ लाख ।

मन मरोर नारी तजी यह गोरख की साख ॥

वीर्य की एक बूँद में नौ लाख जीव होते हैं, एक बूँद वीर्य-नाश से असंख्य जीवों की हत्या होती है । योग-दर्शन के भाष्य में भाष्यकार श्रीवेदव्यास जी ने भी लिखा है - ‘नानुपहत्य भूतानि विषयोप-भोगः सम्भवति ।’ बिना हिंसा के भोग नहीं होता है । इसलिए ब्रह्मचर्य नष्ट करने वाला हिंसक होता है; इसका दण्ड उसे जरूर भोगना पड़ेगा । यद्यपि संतानोत्पत्ति की इच्छा से यदि ब्रह्मचर्य खण्डित किया गया है

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