भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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तो वह शास्त्रज्ञा के अन्तर्गत माना जाएगा लेकिन वासना से प्रेरित होकर के ब्रह्मचर्य नष्ट करना, वो हिंसा है । शास्त्रों में लिखा है –

‘व्यर्थीकारेण शुक्रस्य ब्रह्महत्यामवाप्नुयात् ।’

वृथा वीर्य का नाश करने से ब्रह्म-हत्या का पाप लगता है ।

जो पूर्ण ब्रह्मचारी है, उसको विशेष साधना नहीं करनी पड़ती है; उसे स्वतः अखण्ड भगवत्सृति होने लगती है ।

श्रीशंकराचार्य जी ने लिखा है – ‘ब्रह्मचर्य की अखण्डता से सहज ही परमात्मदर्शन होता है ।’

कोई सोच भी नहीं सकता है कि ब्रह्मचारी को कितना आनंद प्राप्त होता है ‘ब्रह्मचारी न काञ्चन आर्तिमाच्छ्रुति ।’ ब्रह्मचारी को कभी किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता किन्तु जो मृगतृष्णातुल्य काम-सुख के चक्र में ब्रह्मचर्य क्षीण करते हैं वे घोर पतन, घोर अशांति की ओर जाते हैं । श्रीभर्तृहरि जी ने वैराग्यशतक में लिखा है कि ‘भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः’ हम भोगों को नहीं भोग पाये, प्रत्युत भोगों ने हमको ही भोग लिया अर्थात् नष्ट कर डाला ।

संसार में प्रत्येक व्यक्ति आरोग्य और दीर्घ जीवन की इच्छा रखता है । उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घजीवी बनने के लिए आयुर्वेद में शरीर रूपी भवन के तीन उपस्तम्भ बताए गए हैं – आहार, निद्रा, और ब्रह्मचर्य ।

‘त्रय उपस्तम्भाः आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति’

यदि इनमें से एक भी ठीक नहीं होता है तो शरीर रूपी मकान जर्जर होकर गिर जाता है ।

इसलिए वीर्य के संरक्षण से ही मनुष्य स्वस्थ और सुखी रह सकता है । व्यभिचारी पुरुष प्रायः अस्वस्थ और दुखी देखे जाते हैं क्योंकि वे अपने वीर्य का नाश कर इस अवस्था को पहुँचते हैं, ‘वीर्य

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