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ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

तो वह शास्त्रज्ञा के अन्तर्गत माना जाएगा लेकिन वासना से प्रेरित होकर के ब्रह्मचर्य नष्ट करना, वो हिंसा है । शास्त्रों में लिखा है –

‘व्यर्थीकारेण शुक्रस्य ब्रह्महत्यामवाप्नुयात् ।’

वृथा वीर्य का नाश करने से ब्रह्म-हत्या का पाप लगता है ।

जो पूर्ण ब्रह्मचारी है, उसको विशेष साधना नहीं करनी पड़ती है; उसे स्वतः अखण्ड भगवत्सृति होने लगती है ।

श्रीशंकराचार्य जी ने लिखा है – ‘ब्रह्मचर्य की अखण्डता से सहज ही परमात्मदर्शन होता है ।’

कोई सोच भी नहीं सकता है कि ब्रह्मचारी को कितना आनंद प्राप्त होता है ‘ब्रह्मचारी न काञ्चन आर्तिमाच्छ्रुति ।’ ब्रह्मचारी को कभी किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता किन्तु जो मृगतृष्णातुल्य काम-सुख के चक्र में ब्रह्मचर्य क्षीण करते हैं वे घोर पतन, घोर अशांति की ओर जाते हैं । श्रीभर्तृहरि जी ने वैराग्यशतक में लिखा है कि ‘भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः’ हम भोगों को नहीं भोग पाये, प्रत्युत भोगों ने हमको ही भोग लिया अर्थात् नष्ट कर डाला ।

संसार में प्रत्येक व्यक्ति आरोग्य और दीर्घ जीवन की इच्छा रखता है । उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घजीवी बनने के लिए आयुर्वेद में शरीर रूपी भवन के तीन उपस्तम्भ बताए गए हैं – आहार, निद्रा, और ब्रह्मचर्य ।

‘त्रय उपस्तम्भाः आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति’

यदि इनमें से एक भी ठीक नहीं होता है तो शरीर रूपी मकान जर्जर होकर गिर जाता है ।

इसलिए वीर्य के संरक्षण से ही मनुष्य स्वस्थ और सुखी रह सकता है । व्यभिचारी पुरुष प्रायः अस्वस्थ और दुखी देखे जाते हैं क्योंकि वे अपने वीर्य का नाश कर इस अवस्था को पहुँचते हैं, ‘वीर्य

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रक्षति रक्षितम्' जो अपने वीर्य की रक्षा करता है, वह (वीर्य) भी उम्र का संरक्षण करता है । दीर्घजीवन और उत्तम स्वास्थ्य के लिए ब्रह्मचर्य साधना बहुत आवश्यक है । 'नष्टे शुक्ले सर्व रोगा भवन्ति ।' वीर्य के अभाव में ही अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ।

अतः जो अपने स्वास्थ्य और आरोग्य को स्थिर रखते हुए मुखां जीवन को व्यतीत करने के इच्छुक हैं, उन्हें प्रयत्नपूर्वक वीर्यरक्षा करनी चाहिए ।

ब्रह्मचर्य-प्रतिष्ठायां वीर्य-लाभो भवत्यपि ।

सुरत्वं मानवो याति चान्तेयाति परांगतिम् ॥

'ब्रह्मचर्य का पालन करने से वीर्य का लाभ होता है । ब्रह्मचर्य की रक्षा करने वाले मनुष्य को सुरत्व की प्राप्ति होती है, और अन्त में परम गति भी उसे मिलती है ।

मृत्युव्याधिजरानाशी पीयूषं परमौषधम् ।

ब्रह्मचर्यं महद्यत्वं सत्यमेव वदाम्यहम् ॥

शान्तिं कान्तिं स्मृतिं ज्ञानमारोग्यञ्चापि सन्ततिम् ।

यद्वच्छति महद्भर्मं ब्रह्मचर्यं चरेदिह ।

'मृत्यु, व्याधि और जरा को नाश करने वाला, अमृत के समान महौषध ब्रह्मचर्य है । इसलिए शान्ति, कान्ति, स्मृति, ज्ञान और आरोग्य तथा संतान, इनकी जो पुरुष इच्छा करता है, वह ब्रह्मचर्य का पालन करे ।'

अखण्ड नैष्ठिक ब्रह्मचारी श्रीभीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर को ब्रह्मचर्य का उपदेश देते हुए कहते हैं कि -

आजन्म भर्गाद्यस्तु ब्रह्मचारी भवेदिह ।

न तस्य किंचिदप्राप्यमिति विद्धि नराधिप ।

बहु-कोटि ऋषीणाञ्च ब्रह्मलोके वसन्त्युत ॥

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‘जो आजन्म ब्रह्मचारी रहता है उसे संसार में कुछ भी दुःख नहीं होता है और उस पुरुष को कोई वस्तु दुर्लभ नहीं । ब्रह्मचर्य के प्रभाव से करोड़ों ऋषि ब्रह्मलोक में वास कर रहे हैं ।’

उपनिषदों में भी यही बात लिखी है –

तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति,

तेषामेवैष ब्रह्मलोकः, तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारे भवति ॥

(छान्दोग्योपनिषद्)

‘जो इस ब्रह्मलोक को ब्रह्मचर्य के द्वारा जानते हैं, उन्हीं को यह ब्रह्मलोक प्राप्त होता है तथा जो ब्रह्मचर्य से युक्त पुरुष हैं, वे सभी लोकों में विचरण कर सकते हैं ।’

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वीर्य-संरक्षण से होने वाले लाभ

शुक्रं सौम्यं सितं स्निग्धं बल पुष्टिकरं स्मृतम् ।

गर्भबीजं वपुः सारो जीवस्याश्रयमुत्तमम् ॥

‘शुक्र (वीर्य) जीवनी शक्ति का बढ़ाने वाला, श्वेत-वर्ण, चिकना, बल तथा पुष्टिकारक होता है । यह गर्भ का बीज, शरीर का सार रूप तथा जीव का प्रधान आश्रय है ।’

१. वीर्य ही हृदय को पुष्ट बनाता है ।

२. वीर्य से ही सभी अंगों में जीवनी-शक्ति संचालित होती रहती है ।

३. वीर्य से ही मस्तिष्क शान्त और विचार-शक्ति से संपन्न रहता है ।

४. वीर्य से ही निर्भयता, पराक्रम, साहस, उत्साह आदि दिव्य गुणों की वृद्धि होती है ।

५. ‘ब्रह्मचर्य’ जीवन के भव्य भवन निर्माण की आधारशिला है ।

६. वीर्य ही सन्तानोत्पत्ति का मूल है ।

७. ब्रह्मचर्य ही अन्तःकरण की पवित्रता एवं शान्ति बनाए रखने में प्रधान कारण है ।

८. ब्रह्मचर्य ही सदैव स्वस्थ, प्रसन्न व सुखी रहने का अक्षुण्ण उपाय है ।

९. जीवन की सफलता, सुन्दर स्वास्थ्य, हृष्ट-पुष्टता के लिए ब्रह्मचर्य अमृत रूप है ।

१०. दीर्घजीवन का मूल कारण वीर्य-रक्षण ही है । मनुष्य बिना ब्रह्मचर्य धारण किये हुये, कदापि पूर्णायु नहीं हो सकता है ।

११. ब्रह्मचर्य ही सब प्रकार की उन्नति का प्रधान साधन है ।

१२. जो पूर्ण ब्रह्मचारी है, वह मनुष्य नहीं देवता है ।

१३. वीर्य से ही शारीरिक-परिश्रम करने की शक्ति प्राप्त होती है ।

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१४. वीर्यवान पुरुष पुरुषार्थी होता है, उसमें दैवीय गुण स्वतः प्रकट हो जाते हैं, उसकी बुद्धि बहुत प्रखर हो जाती है, उसके चित्त में एकाग्रता आ जाती है, वह शक्तिशाली, दृढ़निश्चयी तथा निरोगी होता है ।

१५. वीर्यशक्ति से ही द्वन्द्वों (सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि) को सहने की सामर्थ्य मिलती है ।

१६. ब्रह्मचर्य से बुद्धि कुशाग्र और स्मरण शक्ति तीव्र होती है ।

१७. संसार के समस्त सुख आयु के आधीन हैं और आयु ब्रह्मचर्य के अधीन है ।

१८. शरीर में वीर्य संरक्षित होने पर आँखों में तेज, वाणी में प्रभाव, कार्य में उत्साह एवं प्राण ऊर्जा में अभिवृद्धि होती है ।

१९. वीर्य-रक्षा से शरीर में फुर्ती व चैतन्यता रहती है, आलस्य तथा तन्त्रा नहीं आती है, बीमारियों के आक्रमण को रोकने की शक्ति आती है ।

२०. ब्रह्मचर्य के प्रभाव से बड़ी-से-बड़ी विपत्ति आने पर भी धैर्य नहीं छूटता, कठिनाइयों एवं विघ्न-बाधाओं का वीरता पूर्वक सामना करने की शक्ति मिलती है ।

२१. ब्रह्मचर्य से इन्द्रियाँ सबल रहती हैं, शरीर के अंग-प्रत्यंग सुदृढ़ रहते हैं, आयु बढ़ती है तथा वृद्धावस्था जल्दी नहीं आती है ।

२२. ब्रह्मचर्य ही तप, व्रत, नियम-संयम, योग-ज्ञान, चरित्र और विनय की जड़ है ।

इसीलिए भीष्म पितामह ने कहा है कि तीनों लोकों के साम्राज्य का भले ही त्याग कर देना अथवा इससे भी कोई उत्तम वस्तु हो, उसको भी छोड़ देना किन्तु ब्रह्मचर्य को भंग नहीं करना ।

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‘हस्त-मैथुन’ एक प्राणघातक रोग

यह एक महाविनाशकारी प्राणघातक रोग है और इस रोग से करीब ९९ प्रतिशत लोग ग्रसित हैं। कुशिक्षा और कुसंग के कारण अज्ञानतावश आज केवल मनोरंजन के लिए बालक एवं नवयुवक हस्त-क्रिया के द्वारा अपने ब्रह्मचर्य का नाश करके, बाल्यावस्था से ही नष्ट हो रहे हैं। अब न वे गृहस्थ-जीवन के लायक रह पा रहे हैं और न ही विरक्ति लायक; क्योंकि वीर्य ही इस शरीर का राजा है और इसके क्षीण होने से शरीर दुर्बल और निस्तेज हो जाता है। वीर्य की एक भी बूँद निकालने का मतलब है शरीर को निचोड़कर रस निकालना। अतः ‘बिन्दु-पात’ सब प्रकार की अवनति का मूल है।

इसीलिये हस्तमैथुन के द्वारा या और भी किसी माध्यम से जो लोग वीर्यपात करते हैं, वे सावधान हो जाँएँ क्योंकि वे बिल्कुल अपनी सत्य का वर्णन कर रहे हैं और ये अनिष्टकारी चेष्टा उन्हें पुनः मनुष्य शरीर प्राप्त नहीं होने देगी।

अतः अभी भी मौका है सँभलने का। बिन्दु-नाश करना बिल्कुल बंद कर दो अन्यथा यह कुकृत्य तुम्हें जर्जर कर देगा, निकृष्टभावना से युक्त कर देगा, उत्साहहीन और खोखला कर देगा। तुम्हारी पारमार्थिक या व्यवहारिक अवनति का प्रधान कारण भी यही हस्त-मैथुन क्रिया है। गृहस्थ में तो जब पति-पत्नी का संयोग होता है, तब वीर्यपात होता है किन्तु इस हस्त-क्रिया के द्वारा लोग इसमें प्रतिपल जल रहे हैं, मर रहे हैं। ये क्रिया इतना कमजोर और परास्त कर देगी कि आप भगवन्मार्ग पर भी नहीं चल सकते हो क्योंकि ‘आरोग्यमूलं खलु धर्मसाधनम्’ नीरोग व्यक्ति ही भजन-साधन कर पाता है।

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आरोग्यता ही मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पत्ति है । यही चारों पुरुषार्थों की जड़ है -

‘धर्मार्थ काम मोक्षाणामारोग्य मूल मुत्तमम् ।’

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उत्तम साधन आरोग्य ही है और आरोग्यता का सर्वोत्तम साधन है ब्रह्मचर्य । रोगी वही होता है जो भोगी होता है । ज्यों-ज्यों वीर्यशक्ति क्षीण होती है त्यों-त्यों ही मनुष्य दुर्बल व रोगी होता चला जाता है । ब्रह्मचारी पुरुष ही आरोग्य हो सकता है । वैद्यों का कहना है कि १ वर्ष तक यदि कोई ब्रह्मचर्य का पालन करे तो उसके बड़े भयंकर रोग भी जड़मूल से नष्ट हो जाते हैं । व्यभिचारी पुरुष को कदापि आरोग्यता प्राप्त नहीं हो सकती है । अच्छे आहार और औषधियों से आरोग्यता प्राप्त नहीं होती, प्रत्युत वीर्य-रक्षा करने से प्राप्त होती है । वीर्यवान पुरुष ही आरोग्यवान होता है । चरकसंहिता में लिखा है -

आहारस्य परं धाम, शुक्रं तद्-रक्ष्यमात्मनः ।

क्षये यस्य बहून् रोगान्मरणं वा नियच्छति ॥

‘मनुष्य के भोजन का सबसे उत्कृष्ट अंश वीर्य है । अतएव यल सहित उसकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि वीर्य के क्षय होने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं और इसका अन्तिम परिणाम मृत्यु है ।’

इसलिए आज से, इसी समय से यह दृढ़ संकल्प करो कि हम किसी भी प्रक्रिया के माध्यम से वीर्यपात नहीं करेंगे ।

‘अब लौं नसानी अब न नसैहौं ।’

यद्यपि दीर्घकाल से धातुक्षय होने से अतिशय चंचल एवं दुर्बल चित्त हो जाने के कारण लोग प्रतिज्ञा करके भी संयम नहीं कर पाते हैं। हजारों बार प्रतिज्ञायें करने पर भी एक भी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हो

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पाती क्योंकि जैसे ही विषय सामने आते हैं तो उनके सामने आते ही सभी प्रतिज्ञायें ताक पर धरी रह जाती हैं । लेकिन फिर भी हिम्मत नहीं हारना है क्योंकि हिम्मत हारकर यदि इस विनाशकारी क्रिया पर नियंत्रण नहीं किया गया तो वीर्य-नाश करने वाले को रोगी, दुर्बल, जर्जर, निरुत्साही और अल्पायु होने से साक्षात् धन्वन्तरी जैसे सामर्थ्यवान वैद्य भी नहीं बचा सकते हैं । संसार में ऐसा कोई वैद्य समर्थ नहीं जो धातुक्षय करने वाले पुरुष को दवा आदि के द्वारा हृष्ट-पुष्ट और दीर्घायु बना सके । उसे बहुत जल्दी मरना पड़ेगा ‘मरणं बिन्दु पातेन’ । महाभारत में एक प्रसंग आया है – विचित्रवीर्य का विवाह हुआ था काशीराज की पुत्री अम्बिका और अम्बालिका से –

तयोः पाणी गृहीत्वा तु रूपयौवनदर्पितः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कामात्मा समपद्यत ॥ ताभ्यां सह समाः सप्त विहरन् पृथिवीपतिः । विचित्रवीर्यस्तरुणो यक्षमणा समगृह्यत ॥

उन दोनों का पाणिग्रहण करके रूप और यौवन के अभिमान से भरे हुए धर्मात्मा विचित्रवीर्य कामात्मा बन गये और असंयमपूर्ण जीवन के कारण, वे युवावस्था में ही राजयक्ष्मा (टीबी, क्षयरोग) का शिकार होकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो गए ।

श्रीपादप्रबोधानन्द जी ने लिखा है – ‘भ्रातः किं मरणं ? मृत्यु क्या है ? ‘मलैक निलय स्त्रीपिण्डे भोगस्पृहा’ ‘मल-मूत्र के पिण्ड स्त्री शरीर को भोगने की जो स्पृहा है, वही मृत्यु है ।’

श्रीबिहारिनदेव जी ने भी कहा है –

कंठ कलीली कामिनी जंघ जोँक लगि जोय । लोहू अंग न पाईयै रहो आपकौँ रोय ॥

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इसलिए अगर मृत्यु से बचना है तो चाहे गृहस्थ हो या विरक्त सबको वीर्य-रक्षण करना ही पड़ेगा अन्यथा भरी जवानी में बिना किसी रोग के ही वृद्ध पुरुष की तरह जर्जर, दुर्बल व ढीला बनना सुनिश्चित है और अकाल मृत्यु भी सुनिश्चित है । अतः शास्त्रों की आज्ञा है –

‘अकामतः स्वयमिन्द्रियस्पर्शनं वीर्यस्खलनं विहाय

वीर्यं शरीरे संरक्ष्य ऊर्ध्वरिताः सततं भव ।’

हाथ से शिश्वेन्द्रिय के द्वारा वीर्य-स्खलन नहीं करो अपितु वीर्य को शरीर में रक्षित कर ऊर्ध्वरिता बनो ।

किसी विशिष्ट चिकित्सक ने कहा है – ‘हस्तमैथुन वह जबरदस्त कुल्हाड़ा है, जिसे अज्ञानी युवक अपने ही हाथों अपने पैरों में मारता है और चेत तब होता है, जब हृदय, मस्तिष्क, आमाशय व मूत्राशय निर्बल हो जाते हैं तथा स्वप्रदोष, शीघ्रपतन, प्रमेह आदि रोग आ घेरते हैं ।’

इस कुकृत्य के कारण बहुत से लोगों का सर्वनाश हो रहा है । अज्ञानता तथा कुसंग के कारण बालक, नवयुवक तथा अन्य भी लोग इस दुष्कर्म में प्रवृत्त हो रहे हैं, प्रारम्भ में तो उन्हें इस क्रिया में बड़ा सुख प्रतीत होता है, पर कुछ दिनों में इसके हानिकारक परिणाम भी उन्हें ज्ञात होने लगते हैं । यदि उस समय भी यह रोग छूट जाय तब कुछ सुधार भी हो जाता है अन्यथा इससे जो रोग उत्पन्न होते हैं, वे स्थायी होते हैं और वे लाखों प्रयत्न करने पर भी आजीवन नहीं मिटते हैं ।

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वीर्यक्षय से होने वाली हानियाँ

आज नवयुवकों में यह रोग भीषण रूप से फैला हुआ है । एक बार जो इसके चक्र में पड़ जाता है, फिर आमरण इस संहारकारी रोग से वह मुक्त नहीं हो पाता है । यह बीमारी बड़े-बड़े विद्वानों तक में भी फैली हुई है और यह बड़ी निर्दयता से मनुष्य के शरीर को निचोड़ रही है । इससे इतनी हानियाँ होती हैं कि जिनका उल्लेख कर पाना भी संभव नहीं है ।

जिस प्रकार लकड़ी में घुन लग जाने से वह बिल्कुल खोखली हो जाती है, उसी प्रकार हस्त-क्रिया के द्वारा वीर्य के स्वचलन से लोगों की अवस्था जर्जरित हो जाती है । इससे शिश्वेन्द्रिय की सब नसें ढीली पड़ जाती हैं, इन्द्रिय-शिथिलता के कारण वीर्य बहुत जल्दी गिरने लगता है । बार-बार स्वप्रदोष होने लगता है । जरा-सी भी विषय-सम्बन्धी बात मन में उदित हुई, इतने से ही वीर्य गिरने लगता है और अन्त में कुछ दिनों बाद भरी जवानी में ही मनुष्य नपुंसक होकर बुढ़ापे का अनुभव करने लगता है ।

निरन्तर धातुक्षय होने से धातु में क्षीणता आ जाती है और दृष्टि की कमी, क्षुधा, तृषा, मन्दाग्नि, स्वप्रदोष, उन्माद, बुद्धि-भ्रंश, क्षय, मधुमेह आदि रोग उत्पन्न होते हैं ।

ऐसा मनुष्य स्त्री-समागम के भी सर्वथा अयोग्य हो जाता है । उसका वीर्य पानी की तरह बिल्कुल पतला हो जाता है । हस्त-मैथुन द्वारा वीर्य निकलने से कलेजे पर बड़े जोरों का धक्का लगता है । इस धक्के से खाँसी, श्वास, यक्ष्मा जैसे भयानक रोग उत्पन्न हो जाते हैं और मनुष्य की आयु क्षीण हो जाती है । मन अत्यंत दुर्बल हो जाता है,

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संकल्पशक्ति कमजोर हो जाती है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, जरा भी प्रतिकूलता सहन नहीं होती, आत्मविश्वास कम हो जाता है, काम करने में उत्साह नहीं रहता, शरीर में आलस्य छाया रहता है, चित्त सदा संशंकित रहता है, मन में विषाद छाया रहता है, कोई भी नया काम हाथ में लेने में भय मालूम होता है, थोड़े-से भी मानसिक परिश्रम से दिमाग में थकान आ जाती है, बुद्धि मंद हो जाती है, अधिक सोचने की शक्ति नहीं रहती, असमय में ही वृद्धावस्था आ घेरती है और स्वल्पायु में मनुष्य काल के गाल में चला जाता है, चित्त स्थिर नहीं हो पता, मन और इन्द्रियाँ वश में नहीं हो पातीं और मनुष्य भगवत्प्राप्ति के मार्ग से कोसों दूर हट जाता है। वह न इस लोक में सुखी रह पाता है और न ही परलोक में।

नष्टवीर्य पुरुष सदा डरता रहता है, अपने से बड़े लोगों के सामने आँख उठाकर भी नहीं देख सकता है। वह सदा किसी महान अपराधी की भाँती शर्मिन्दा होकर नीचे देखता है अथवा मुख छिपाता फिरता है। सदा निरुत्साहित रहता है। उसकी आँखें भीतर धँस जाती हैं। गाल पिचक जाते हैं। आँखों के नीचे गड्ढा हो जाता है और काले धब्बे पड़ जाते हैं। बाल पकने और झड़ने लगते हैं। शरीर सूखता चला जाता है। अंग-प्रत्यंगों में शिथिलता छा जाती है। अच्छे कार्यों में उसका मन नहीं लगता है। थोड़े से परिश्रम से ही उसे थकावट आ जाती है। थोड़ा-सा दुःख उसे पहाड़ की तरह प्रतीत होने लगता है। दन्तों को सहने में वह सर्वथा असमर्थ हो जाता है। बार-बार भूख लगती है। अपच और कब्ज होता है। उसे अच्छी तरह नींद नहीं आती है। जागने पर भी उसके नेत्रों में आलस भरा रहता है। रात्रि में स्वप्न दोष होता है। वीर्य पतला हो जाता है। पेशाब के साथ बूँद-

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बूँद करके वीर्य गिरने लगता है । पुंस्त्व नष्ट हो जाता है । मुँह पर मुँहासे निकल आते हैं । उठते समय आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है । बहुत जल्दी उसे भूलने की आदत हो जाती है । उसका चित्त अत्यंत चंचल व दुर्बल हो जाता है । कोई भी कार्य पूरा किये बिना ही वह छोड़ देता है । वह क्षण-क्षण में विचारों को बदलता रहता है । उसकी आँखों में जलन पैदा होती है – ये सब वीर्यनाश के लक्षण हैं । जो हस्त क्रिया के द्वारा ब्रह्मचर्य क्षीण करते हैं, वे प्रतिक्षण काम से युक्त रहते हैं और उनके अन्दर वही चिंतन चलता रहता है । वीर्य-क्षय से मन मलिन हो जाता है । बड़े-बड़े श्रेष्ठ पुरुष भी ब्रह्मचर्य से पतित होते ही संसार में श्रीहीन हो जाते हैं । वीर्य क्षय से धातु-रोग, रक्त-विकार, दृष्टि-हीनता आदि रोग उत्पन्न होते हैं । वीर्य-नाश से आनन्द, साहस, धैर्य, वीरत्व, तेज, शान्ति, ज्ञान और सद्दिचार आदि सब दैवीय सम्पदा नष्ट हो जाती है और अति मैथुन से शूल, खाँसी, ज्वर, श्वास, दुर्बलता, पीलिया रोग, क्षय आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।

शूल कास ज्वर श्वास, कर्ष्य पाद्मामयक्षयाः ।

अति व्यवयाजायन्ते रोगाश्चाक्षेपकादयः ॥

वीर्य के अधीन ही शारीरिक और मानसिक सारी शक्तियाँ रहती हैं । इसी के प्रभाव से ब्रह्मचारियों का शरीर बल-वीर्य से पूर्ण, सुन्दर, दृष्ट-पुष्ट तथा पवित्र देखा जाता है । व्यभिचारी पुरुष क्षणिक सुख के लिए अपने वीर्य का नाश कर डालते हैं, अतः उनका शरीर निस्तेज, निर्बल तथा कुरूप हो जाता है । वीर्यनाश से ही मनुष्य की मृत्यु भी शीघ्र हो जाती है ।

इसलिए इस अमूल्य रत्न को केवल गर्भाधान के अभिप्राय से ही शरीर से बाहर निकालना चाहिए अन्यथा इसकी आवश्यकता न हो तो कभी भी शरीर से पृथक नहीं करना चाहिए ।

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शुक्र (वीर्य) के निर्माण की प्रक्रिया

रसाद् रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते ।

मेदस्यास्थिः ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसंभवः ॥

जब जठराग्नि अन्न को पचाती है तो अन्न का जो सारभाग रस निकलता है उस रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से शुक्र (वीर्य) का निर्माण होता है ।

धातौ रसदौ मज्जान्ते प्रत्येकं क्रमतो रसः ।

अहोरात्रात्स्वयं पञ्च, सार्धं दण्डञ्च तिष्ठति ॥

रस से लेकर मज्जा तक प्रत्येक धातु पाँच दिन-रात और डेढ़ घड़ी (३६ मिनिट) तक अपनी अवस्था में रहती है । तदनन्तर वीर्य बनता है अर्थात् ३० दिन-रात और ९ घड़ी (पौने चार घण्टे) में रस से वीर्य की उत्पत्ति होती है ।

करीब एक महीने में एक दिन खाए हुए अन्न का वीर्य बनता है और करीब ४० दिन के भोजन का उतना वीर्य बनता है, जितना एक बार की मैथुन क्रिया में नष्ट हो जाता है ।

शरीर में कोई ऐसा स्थान विशेष नियत नहीं है, जहाँ शुक्र (वीर्य) विशेष रूप से विद्यमान रहता हो । शुक्र सम्पूर्ण शरीर अर्थात् सर्वांग में व्याप्त रहता है; यदि वीर्य एक स्थान पर रहने वाला पदार्थ होता, तो इसके संरक्षण या नाश का अच्छा-बुरा प्रभाव सब अंगों पर न पड़ता । यथा पयसि सर्पिस्तु गूढश्चैतौ रसो यथा ।

एवं हि सकले काये शुक्रं तिष्ठति देहिनाम् ॥

‘जैसे दूध में घी और गन्ने में रस व्याप्त रहता है, उसी प्रकार देहधारियों के शरीर भर में शुक्र भी रहता है ।’

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वीर्य का पाचन नहीं होता है, यह ओज एवं तेज का रूप धारण कर लेता है। इसी कारण जो संयम से चलता है तो उसका एक अलग ही स्वरूप होता है, उसमें एक अलग उत्साह, अलग तेज, अलग चमक होती है।

अतः सावधान हो जाओ, इसको खिलवाड़ मत समझो। एक महीने की कमाई ससम धातु वीर्य (जो भगवत्स्वरूप है, जीवनी-शक्ति है) को लोग एक दिन में कितनी बार नष्ट कर रहे हैं। इसे मूर्खता नहीं कहा जाएगा तो क्या कहा जाएगा, जो इतनी कीमती वस्तु को केवल मनोरंजन के लिए बर्बाद कर रहे हो। ये घोर पतन का रास्ता है। ये कृत्य तन, मन और धन सबका नाश करने वाला है। सम्पूर्ण शरीर का सार है ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य के द्वारा ही हर परिस्थिति, हर द्रन्द्व को सहने की सामर्थ्य मिलती है। आज जितने मनुष्यों या साधकों की दुर्दशा हो रही है, उसका मूल कारण है शास्त्र विरुद्ध आचरण और ब्रह्मचर्य का नाश। यदि ब्रह्मचर्य की रक्षा की जाए तो ब्रह्मचर्य बहुत बड़ा अमृततत्व है लेकिन मूर्खता के कारण लोग इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, यदि गृहस्थी हो तो भी संयम से चलो।

जरा विचार करो, आप रात दिन पशुता का व्यवहार करके मलिन मन के द्वारा शान्ति प्राप्त करना चाहते हो, आनंद की अनुभूति करना चाहते हो तो कैसे हो सकता है? आज यौवनावस्था है, समझ में नहीं आ रहा लेकिन ये आदत कल कहाँ पहुँचा देगी सोच भी नहीं सकते हो। जब पहुँच जाओगे फिर कोई रास्ता नहीं है बचने का। कितने ऐसे बच्चे हैं जो इस बात से दुखी हैं कि मैं क्या करूँ? आत्महत्या कर लूँ। देखो पहुँचा दिया उन्हें मन ने वहाँ, जो अंतिम दुर्गति का केन्द्र है। यदि अभी सावधान नहीं हुए तो आप कुछ दिनों बाद ऐसे-ऐसे रोगों से ग्रसित हो जायेंगे कि ठीक से चलने लायक भी नहीं रहेंगे।

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गृहस्थ में रहते हुए ब्रह्मचर्य से कैसे रहें ?

प्रायः स्थूल बुद्धिवाले लोग इतना ही समझते हैं कि ब्रह्मचर्य जीवन का काल विवाह के पूर्व समाप्त हो जाता है और विवाह हो चुकने पर फिर यथेष्ट विहार कर सकते हैं यानी विवाह से पूर्व तक ही संयम बरतना है विवाह होने पर तो मनचाहा स्त्री-संसर्ग कर सकते हैं लेकिन उन्हें यह पता नहीं है कि गृहस्थाश्रम का वास्तविक उद्देश्य सन्तानोत्पत्ति है न कि जननेन्द्रिय को तृप्त करना ।

यदि कोई गृहस्थ जीवन में है तो वह केवल शुद्ध संतानोत्पत्ति के लिए ही ब्रह्मचर्य खण्डित करे, अन्यथा नहीं, यही शास्त्राज्ञा है -

यद् घ्राणभक्षो विहितः सुरायास्तथा पशोरालभनं न हिंसा ।

एवं व्यवयः प्रजया न रत्या इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम् ॥

(श्रीमद्भगवद् गीता ११/५/१३)

‘सौत्रामणि यज्ञ में सुरा (मंदिर) को नासिका से सँघने का विधान है, पीने का नहीं; यज्ञ में पशु के स्पर्श करने का विधान है, हिंसा का नहीं; इसी प्रकार गृहस्थ जीवन संतानोत्पत्ति के लिए हैं, विषय-भोग के लिए नहीं – यही विशुद्ध धर्म का स्वरूप है किन्तु इस अपने धर्म को लोग नहीं जानते हैं ।’ श्रीमनु महाराज ने भी मनुस्मृति में कहा कि –

प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टाः सन्तानार्थञ्च मानवम् (मनुस्मृति)

‘गर्भ धारण करने के लिए स्त्रियों और गर्भाधान करने के लिए पुरुषों की रचना हुई है । यदि कोई पुरुष सन्तान प्राप्ति के लिए अपनी स्त्री से ऋतुकाल में समागम करता है तो उसका ब्रह्मचर्य नष्ट नहीं माना जाता क्योंकि – ऋतुकालाभिगमनं ब्रह्मचर्यमिवोच्यते ।

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‘ऋतुकाल में संतानप्राप्ति के लिए अभिगमन (मैथुन) करना, यह ब्रह्मचर्य ही है ।’

ऋक्षतावृत्तौ स्वदारेषु संगतिं यत् विधानतः ।

ब्रह्मचर्यं तदेवोक्तं गृहस्थाश्रमवासिनाम् ॥

ऋतुकाल में अपनी स्त्री से विधियुक्त अर्थात् शास्त्राज्ञानुसार केवल संन्तान के हेतु समागम करने वाला पुरुष गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी ब्रह्मचारी ही है ।

इसी तरह युवती स्त्री को चाहिये कि मासिक धर्म से शुद्ध होकर अपने पति से नियत समय में संन्तान के लिए समागम करे तो वह भी ब्रह्मचारिणी ही है -

या नारी पतिभक्ता स्यात्सा सदा ब्रह्मचारिणी ।

जो स्त्री केवल अपने पति से अनुराग रखती है, उचित समय पर संतति की इच्छा से सहवास कर गर्भ धारण करती है, वह सर्वदा ब्रह्मचारिणी कहलाती है किन्तु अपने पति के साथ भी अनियमित मैथुन करना, यह व्यभिचार है और यह पाप है । इसी तरह पुरुष भी ऋतुकाल के अलावा भले ही अपनी धर्मपत्नी से समागम करता है तो वह पाप

है - रजोदर्शनतः पूर्वं न स्त्री-संसर्गं माचरेत् ।

‘रजोदर्शन होने से पहले स्त्री से समागम करना निषेध है ।’

अतः संतति की प्राप्ति के लिए भगवत्प्रार्थना से युक्त होकर के कि हे करुणानिधान ! मैं आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए अपने ब्रह्मचर्य को क्षीण करता हूँ और आपकी प्राप्ति के लिए यह गृहस्थ-धर्म रूपी पूजा स्वीकार करने के लिए आपसे प्रार्थना करता हूँ, यह पूजा है आप स्वीकार कीजिये ।

पूर्वकाल में आश्रम परम्परा में २५ वर्ष तक तो प्रायः सभी ब्रह्मचर्य धारण करते थे फिर जिनको गृहस्थ में जाना होता था वह

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गृहस्थ में जाते थे और जिनको नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का व्रत लेना होता था वे वैरागी होते थे। दोनों महान पुरुष बनते। एक गृहस्थ में जाकर के धर्म पूर्वक चलते हुए पुनः वैराग्य को धारण करता और दूसरा विरक्ति में जाकर महापुरुष बन जाता।

लेकिन आज स्थिति यह है कि २५ वर्ष तक तो लोगों की बड़ी दुर्गति हो जाती है, क्योंकि अब कुंभसुलभ हो गया है, ऐसे-ऐसे साधन चल पड़े हैं कि उनमें दृश्य देख-देखकर लोगों की भावनाएँ दूषित हो रही हैं और वो अपने जीवन को नष्ट कर रहे हैं। ब्रह्मचर्य नष्ट हो गया तो फिर ये अमूल्य मानव जीवन किस काम का रह गया। पूर्व में जब लोग संयम पूर्वक रहकर के गर्भाधान करते थे तो उनकी स्त्रियों के गर्भ से बड़े-बड़े धर्मनिष्ठ, भगवदनुरागी महापुरुष या देश व समाज के लिए सुखप्रद महान वीर पुरुष पैदा होते थे। गृहस्थ धर्म का भी एक नियम है, यदि उसमें ब्रह्मचर्य से रहा जाय तो निश्चित संतान दिव्य पैदा होती है।

वह गृहस्थ धन्य है जो ब्रह्मचर्य पूर्वक संतानोत्पत्ति की क्रिया करके भगवान् की अराधना करता है।

वे सद्-गृहस्थ बहुत महान हैं, जो गृहस्थ जीवन में भी संयम से रहकर के संत की तरह जीवन यापन कर रहे हैं अन्यथा विरक्त साधक होकर के भी गंदे आचरणों की प्रवृत्ति बनी रहती है। जो सद्-गृहस्थ तरुणावस्था से ही यह संकल्प ले लेते हैं कि हम आजीवन ब्रह्मचर्य से रहेंगे और उस संकल्प को पूरा करने में जो स्त्रियाँ अपने पति का सहयोग करती हैं, वे निश्चित ही कृपापात्र हैं।

गृहस्थ जीवन में ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने कभी अपनी स्त्री से संसर्ग नहीं किया, जैसे श्रीकबीरदासजी हुए उनकी स्त्री का नाम लोई था, कबीरदास जी ने कभी अपनी पत्नी से संसर्ग नहीं किया।

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उनके जो पुत्र-पुत्री कमाल और कमाली थे, वे उन्हें दैवेच्छा से प्राप्त हुए थे न कि सन्तानोत्पत्ति की क्रिया से । कबीरदास जी ने कहा है -

दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी, ज्यू की ल्यू धर दीन्हि रे चदरिया ।

इसी तरह से गीतगोविन्दकार श्रीजयदेवजी हुए हैं, उनकी धर्मपत्नी का नाम पद्मावती था, श्रीजगन्नाथ जी की इच्छा से जयदेव जी को विवाह करना पड़ा, किन्तु कभी स्त्री के साथ उन्होंने संसर्ग नहीं किया । उनकी स्त्री ने भी उनके नियम पालन में पूर्ण सहयोग किया ।

प्रभु की बड़ी कृपा है उनके ऊपर जो दम्पत्ति संयमपूर्वक जीवन बिताना चाहते हैं । विषय-भोग करना, स्वाप्निक भोगों में फँसना कोई कर्तव्य नहीं है । कर्तव्य तो एकमात्र यही है इस साधनधाम दुर्लभ मनुष्य शरीर से प्रभु के चरणारविन्दों का प्रेम प्राप्त करना । श्रीमद्भागवत में ऋषभ भगवान् ने अपने पुत्रों को उपदेश देते हुए यही बताया था कि -

नायं देहो देहभाजां नूलोके कष्टान् कामानर्हते विद्वुजां ये । तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्धयेद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ॥

(श्रीमद्भागवत ५/५/१)

‘मनुष्य लोक में शरीरधारी मनुष्यों का यह शरीर कष्ट देने वाले विषयों को भोगने के लिए नहीं है, क्योंकि यह विषय-भोग तो शूकरादि योनियों में सुलभ हैं । अतः हे पुत्रो ! इस शरीर से संयम पूर्वक रहते हुए दिव्य तप करना चाहिए, जिससे अन्तःकरण शुद्ध होता है और अपार आनंद की अर्थात् भगवद्-रस की प्राप्ति होती है ।’

आज ये जो बात हमारे हृदय में बैठ गई है कि ‘हम तो गृहस्थी हैं, हमें तो भोग-भोगने का लाइसेंस मिल गया’, - ये पूर्ण निकृष्टता की बात है । हाँ, जो संयमपूर्वक नहीं रह पा रहा है तो उसके लिए शास्त्रीय विधान है कि वह ऋतुकाल में स्त्री-समागम कर सकता है,

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परन्तु तब जब संतानोत्पत्ति की लालसा हो । नहीं तो वास्तविक बात तो यही है कि ब्रह्मचर्य से युक्त होकर के भगवदाराधन करते हुए आत्मकल्याण करके ये जन्म सुधार लिया जाय । इन भोगों की तो अन्य योनियों (सुअर, कुत्ता आदि) में बहुतायत है - सभी इन्हीं भोगों में रमे हुए हैं । इसलिए मनुष्य जीवन विषय-भोग रूपी कर्तव्य के लिए नहीं है । मनुष्यमात्र का तो एकमात्र यही धर्म है, प्रभु के चरणों में भक्ति हो जाना -

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।

अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १/२/६)

‘अधोक्षज भगवान् में अपना चित्त समर्पित हो जाना, उनके चरणों में प्रेम हो जाना - यही परम धर्म है जीवमात्र का । इसीलिये भगवान् गीताजी में आदेश करते हैं कि -

सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज ।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (१८/६६)

‘सब धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़ो और केवल मेरे चरणों का आश्रय लो ।

यदि संयम से चलोगे तो गृहस्थ-धर्म में रहकर भी भगवत्प्राप्ति के योग्य हो जाओगे । भगवान् ने गृहस्थ का इसीलिये रास्ता दिया कि पति-पत्नी मिलकर के काम पर विजय प्राप्त करें, इसलिए नहीं दिया कि रोज भ्रष्ट होते रहें । गृहस्थाश्रम एक सुरक्षित किला है जिसकी आड़ में उच्छृंखल काम प्रवृत्ति से बचा जा सकता है ।

ब्रह्मचर्य हानि का मतलब है कि तुम रोज मर रहे हो । रोज मृत्यु को गले लगा रहे हो । संयम से चलोगे तो आनंदित रहोगे । संयम एक बहुत बड़ी शक्ति है । जिसके निकालने में लोग आनंद समझते हैं उसके रोकने में कितना आनंद होगा ? केवल संतान उत्पत्ति के लिए संग करो । हम लोग ब्रह्मर्षियों की संतानें हैं, उन्होंने भी तो

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स्त्री-संग किया लेकिन शास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार, बड़े-बड़े गृहस्थ आचार्य भी हुए, उनकी संतानें भी हुईं अतः एकपलीव्रती ब्रह्मचारी ही कहा जाता है ।

कोई ऐसा न समझे कि हम तो छिपकर व्यभिचार कर लेंगे क्योंकि हमें कोई देख नहीं रहा है, अरे! तुम कहाँ तक छिपोगे, हमारे कर्मों के १४ साक्षी होते हैं, जो हमारे कर्मों को देखते हैं, उनसे हम कहीं छिप ही नहीं सकते हैं – सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इंद्रियां, चन्द्रमा, संध्या, रात, दिन, दिशाएं, जल, पृथ्वी, काल और धर्म-ये सब कर्मों के साक्षी हैं ।

जै श्रीहित हरिवंश नरक गति दुरभर, यम द्वारे कटियत नक छीके ।

वहाँ यमलोक में ऐसा हिसाब है कि कहाँ छींका, कब छींका, इतने पर ही वहाँ नाक काट दी जाती है । वहाँ उँगली उठाने पर भी दण्ड है कि कहाँ उँगली उठायी, किसको उठायी, क्यों उठायी अर्थात् वहाँ एक-एक कर्म का हिसाब होता है । यदि कोई सोचता है कि मुझे कौन देख रहा, मौज-मस्ती कर लो, तो यह अच्छी तरह से समझ लो कि आप बच नहीं सकते हो निश्चित नारकीय यातनायें भोगनी पड़ेंगी ।

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।

‘मनुष्य को निजकृत शुभ या अशुभ कर्म का फल अवश्य मिलता है।’

यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम ।

अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ॥

‘मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है।’

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।

स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद् विमुच्यते ॥

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