भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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संकल्पशक्ति कमजोर हो जाती है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, जरा भी प्रतिकूलता सहन नहीं होती, आत्मविश्वास कम हो जाता है, काम करने में उत्साह नहीं रहता, शरीर में आलस्य छाया रहता है, चित्त सदा संशंकित रहता है, मन में विषाद छाया रहता है, कोई भी नया काम हाथ में लेने में भय मालूम होता है, थोड़े-से भी मानसिक परिश्रम से दिमाग में थकान आ जाती है, बुद्धि मंद हो जाती है, अधिक सोचने की शक्ति नहीं रहती, असमय में ही वृद्धावस्था आ घेरती है और स्वल्पायु में मनुष्य काल के गाल में चला जाता है, चित्त स्थिर नहीं हो पता, मन और इन्द्रियाँ वश में नहीं हो पातीं और मनुष्य भगवत्प्राप्ति के मार्ग से कोसों दूर हट जाता है। वह न इस लोक में सुखी रह पाता है और न ही परलोक में।

नष्टवीर्य पुरुष सदा डरता रहता है, अपने से बड़े लोगों के सामने आँख उठाकर भी नहीं देख सकता है। वह सदा किसी महान अपराधी की भाँती शर्मिन्दा होकर नीचे देखता है अथवा मुख छिपाता फिरता है। सदा निरुत्साहित रहता है। उसकी आँखें भीतर धँस जाती हैं। गाल पिचक जाते हैं। आँखों के नीचे गड्ढा हो जाता है और काले धब्बे पड़ जाते हैं। बाल पकने और झड़ने लगते हैं। शरीर सूखता चला जाता है। अंग-प्रत्यंगों में शिथिलता छा जाती है। अच्छे कार्यों में उसका मन नहीं लगता है। थोड़े से परिश्रम से ही उसे थकावट आ जाती है। थोड़ा-सा दुःख उसे पहाड़ की तरह प्रतीत होने लगता है। दन्तों को सहने में वह सर्वथा असमर्थ हो जाता है। बार-बार भूख लगती है। अपच और कब्ज होता है। उसे अच्छी तरह नींद नहीं आती है। जागने पर भी उसके नेत्रों में आलस भरा रहता है। रात्रि में स्वप्न दोष होता है। वीर्य पतला हो जाता है। पेशाब के साथ बूँद-

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