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ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

संकल्पशक्ति कमजोर हो जाती है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, जरा भी प्रतिकूलता सहन नहीं होती, आत्मविश्वास कम हो जाता है, काम करने में उत्साह नहीं रहता, शरीर में आलस्य छाया रहता है, चित्त सदा संशंकित रहता है, मन में विषाद छाया रहता है, कोई भी नया काम हाथ में लेने में भय मालूम होता है, थोड़े-से भी मानसिक परिश्रम से दिमाग में थकान आ जाती है, बुद्धि मंद हो जाती है, अधिक सोचने की शक्ति नहीं रहती, असमय में ही वृद्धावस्था आ घेरती है और स्वल्पायु में मनुष्य काल के गाल में चला जाता है, चित्त स्थिर नहीं हो पता, मन और इन्द्रियाँ वश में नहीं हो पातीं और मनुष्य भगवत्प्राप्ति के मार्ग से कोसों दूर हट जाता है। वह न इस लोक में सुखी रह पाता है और न ही परलोक में।

नष्टवीर्य पुरुष सदा डरता रहता है, अपने से बड़े लोगों के सामने आँख उठाकर भी नहीं देख सकता है। वह सदा किसी महान अपराधी की भाँती शर्मिन्दा होकर नीचे देखता है अथवा मुख छिपाता फिरता है। सदा निरुत्साहित रहता है। उसकी आँखें भीतर धँस जाती हैं। गाल पिचक जाते हैं। आँखों के नीचे गड्ढा हो जाता है और काले धब्बे पड़ जाते हैं। बाल पकने और झड़ने लगते हैं। शरीर सूखता चला जाता है। अंग-प्रत्यंगों में शिथिलता छा जाती है। अच्छे कार्यों में उसका मन नहीं लगता है। थोड़े से परिश्रम से ही उसे थकावट आ जाती है। थोड़ा-सा दुःख उसे पहाड़ की तरह प्रतीत होने लगता है। दन्तों को सहने में वह सर्वथा असमर्थ हो जाता है। बार-बार भूख लगती है। अपच और कब्ज होता है। उसे अच्छी तरह नींद नहीं आती है। जागने पर भी उसके नेत्रों में आलस भरा रहता है। रात्रि में स्वप्न दोष होता है। वीर्य पतला हो जाता है। पेशाब के साथ बूँद-

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बूँद करके वीर्य गिरने लगता है । पुंस्त्व नष्ट हो जाता है । मुँह पर मुँहासे निकल आते हैं । उठते समय आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है । बहुत जल्दी उसे भूलने की आदत हो जाती है । उसका चित्त अत्यंत चंचल व दुर्बल हो जाता है । कोई भी कार्य पूरा किये बिना ही वह छोड़ देता है । वह क्षण-क्षण में विचारों को बदलता रहता है । उसकी आँखों में जलन पैदा होती है – ये सब वीर्यनाश के लक्षण हैं । जो हस्त क्रिया के द्वारा ब्रह्मचर्य क्षीण करते हैं, वे प्रतिक्षण काम से युक्त रहते हैं और उनके अन्दर वही चिंतन चलता रहता है । वीर्य-क्षय से मन मलिन हो जाता है । बड़े-बड़े श्रेष्ठ पुरुष भी ब्रह्मचर्य से पतित होते ही संसार में श्रीहीन हो जाते हैं । वीर्य क्षय से धातु-रोग, रक्त-विकार, दृष्टि-हीनता आदि रोग उत्पन्न होते हैं । वीर्य-नाश से आनन्द, साहस, धैर्य, वीरत्व, तेज, शान्ति, ज्ञान और सद्दिचार आदि सब दैवीय सम्पदा नष्ट हो जाती है और अति मैथुन से शूल, खाँसी, ज्वर, श्वास, दुर्बलता, पीलिया रोग, क्षय आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।

शूल कास ज्वर श्वास, कर्ष्य पाद्मामयक्षयाः ।

अति व्यवयाजायन्ते रोगाश्चाक्षेपकादयः ॥

वीर्य के अधीन ही शारीरिक और मानसिक सारी शक्तियाँ रहती हैं । इसी के प्रभाव से ब्रह्मचारियों का शरीर बल-वीर्य से पूर्ण, सुन्दर, दृष्ट-पुष्ट तथा पवित्र देखा जाता है । व्यभिचारी पुरुष क्षणिक सुख के लिए अपने वीर्य का नाश कर डालते हैं, अतः उनका शरीर निस्तेज, निर्बल तथा कुरूप हो जाता है । वीर्यनाश से ही मनुष्य की मृत्यु भी शीघ्र हो जाती है ।

इसलिए इस अमूल्य रत्न को केवल गर्भाधान के अभिप्राय से ही शरीर से बाहर निकालना चाहिए अन्यथा इसकी आवश्यकता न हो तो कभी भी शरीर से पृथक नहीं करना चाहिए ।

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शुक्र (वीर्य) के निर्माण की प्रक्रिया

रसाद् रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते ।

मेदस्यास्थिः ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसंभवः ॥

जब जठराग्नि अन्न को पचाती है तो अन्न का जो सारभाग रस निकलता है उस रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से शुक्र (वीर्य) का निर्माण होता है ।

धातौ रसदौ मज्जान्ते प्रत्येकं क्रमतो रसः ।

अहोरात्रात्स्वयं पञ्च, सार्धं दण्डञ्च तिष्ठति ॥

रस से लेकर मज्जा तक प्रत्येक धातु पाँच दिन-रात और डेढ़ घड़ी (३६ मिनिट) तक अपनी अवस्था में रहती है । तदनन्तर वीर्य बनता है अर्थात् ३० दिन-रात और ९ घड़ी (पौने चार घण्टे) में रस से वीर्य की उत्पत्ति होती है ।

करीब एक महीने में एक दिन खाए हुए अन्न का वीर्य बनता है और करीब ४० दिन के भोजन का उतना वीर्य बनता है, जितना एक बार की मैथुन क्रिया में नष्ट हो जाता है ।

शरीर में कोई ऐसा स्थान विशेष नियत नहीं है, जहाँ शुक्र (वीर्य) विशेष रूप से विद्यमान रहता हो । शुक्र सम्पूर्ण शरीर अर्थात् सर्वांग में व्याप्त रहता है; यदि वीर्य एक स्थान पर रहने वाला पदार्थ होता, तो इसके संरक्षण या नाश का अच्छा-बुरा प्रभाव सब अंगों पर न पड़ता । यथा पयसि सर्पिस्तु गूढश्चैतौ रसो यथा ।

एवं हि सकले काये शुक्रं तिष्ठति देहिनाम् ॥

‘जैसे दूध में घी और गन्ने में रस व्याप्त रहता है, उसी प्रकार देहधारियों के शरीर भर में शुक्र भी रहता है ।’

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वीर्य का पाचन नहीं होता है, यह ओज एवं तेज का रूप धारण कर लेता है। इसी कारण जो संयम से चलता है तो उसका एक अलग ही स्वरूप होता है, उसमें एक अलग उत्साह, अलग तेज, अलग चमक होती है।

अतः सावधान हो जाओ, इसको खिलवाड़ मत समझो। एक महीने की कमाई ससम धातु वीर्य (जो भगवत्स्वरूप है, जीवनी-शक्ति है) को लोग एक दिन में कितनी बार नष्ट कर रहे हैं। इसे मूर्खता नहीं कहा जाएगा तो क्या कहा जाएगा, जो इतनी कीमती वस्तु को केवल मनोरंजन के लिए बर्बाद कर रहे हो। ये घोर पतन का रास्ता है। ये कृत्य तन, मन और धन सबका नाश करने वाला है। सम्पूर्ण शरीर का सार है ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य के द्वारा ही हर परिस्थिति, हर द्रन्द्व को सहने की सामर्थ्य मिलती है। आज जितने मनुष्यों या साधकों की दुर्दशा हो रही है, उसका मूल कारण है शास्त्र विरुद्ध आचरण और ब्रह्मचर्य का नाश। यदि ब्रह्मचर्य की रक्षा की जाए तो ब्रह्मचर्य बहुत बड़ा अमृततत्व है लेकिन मूर्खता के कारण लोग इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, यदि गृहस्थी हो तो भी संयम से चलो।

जरा विचार करो, आप रात दिन पशुता का व्यवहार करके मलिन मन के द्वारा शान्ति प्राप्त करना चाहते हो, आनंद की अनुभूति करना चाहते हो तो कैसे हो सकता है? आज यौवनावस्था है, समझ में नहीं आ रहा लेकिन ये आदत कल कहाँ पहुँचा देगी सोच भी नहीं सकते हो। जब पहुँच जाओगे फिर कोई रास्ता नहीं है बचने का। कितने ऐसे बच्चे हैं जो इस बात से दुखी हैं कि मैं क्या करूँ? आत्महत्या कर लूँ। देखो पहुँचा दिया उन्हें मन ने वहाँ, जो अंतिम दुर्गति का केन्द्र है। यदि अभी सावधान नहीं हुए तो आप कुछ दिनों बाद ऐसे-ऐसे रोगों से ग्रसित हो जायेंगे कि ठीक से चलने लायक भी नहीं रहेंगे।

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गृहस्थ में रहते हुए ब्रह्मचर्य से कैसे रहें ?

प्रायः स्थूल बुद्धिवाले लोग इतना ही समझते हैं कि ब्रह्मचर्य जीवन का काल विवाह के पूर्व समाप्त हो जाता है और विवाह हो चुकने पर फिर यथेष्ट विहार कर सकते हैं यानी विवाह से पूर्व तक ही संयम बरतना है विवाह होने पर तो मनचाहा स्त्री-संसर्ग कर सकते हैं लेकिन उन्हें यह पता नहीं है कि गृहस्थाश्रम का वास्तविक उद्देश्य सन्तानोत्पत्ति है न कि जननेन्द्रिय को तृप्त करना ।

यदि कोई गृहस्थ जीवन में है तो वह केवल शुद्ध संतानोत्पत्ति के लिए ही ब्रह्मचर्य खण्डित करे, अन्यथा नहीं, यही शास्त्राज्ञा है -

यद् घ्राणभक्षो विहितः सुरायास्तथा पशोरालभनं न हिंसा ।

एवं व्यवयः प्रजया न रत्या इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम् ॥

(श्रीमद्भगवद् गीता ११/५/१३)

‘सौत्रामणि यज्ञ में सुरा (मंदिर) को नासिका से सँघने का विधान है, पीने का नहीं; यज्ञ में पशु के स्पर्श करने का विधान है, हिंसा का नहीं; इसी प्रकार गृहस्थ जीवन संतानोत्पत्ति के लिए हैं, विषय-भोग के लिए नहीं – यही विशुद्ध धर्म का स्वरूप है किन्तु इस अपने धर्म को लोग नहीं जानते हैं ।’ श्रीमनु महाराज ने भी मनुस्मृति में कहा कि –

प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टाः सन्तानार्थञ्च मानवम् (मनुस्मृति)

‘गर्भ धारण करने के लिए स्त्रियों और गर्भाधान करने के लिए पुरुषों की रचना हुई है । यदि कोई पुरुष सन्तान प्राप्ति के लिए अपनी स्त्री से ऋतुकाल में समागम करता है तो उसका ब्रह्मचर्य नष्ट नहीं माना जाता क्योंकि – ऋतुकालाभिगमनं ब्रह्मचर्यमिवोच्यते ।

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‘ऋतुकाल में संतानप्राप्ति के लिए अभिगमन (मैथुन) करना, यह ब्रह्मचर्य ही है ।’

ऋक्षतावृत्तौ स्वदारेषु संगतिं यत् विधानतः ।

ब्रह्मचर्यं तदेवोक्तं गृहस्थाश्रमवासिनाम् ॥

ऋतुकाल में अपनी स्त्री से विधियुक्त अर्थात् शास्त्राज्ञानुसार केवल संन्तान के हेतु समागम करने वाला पुरुष गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी ब्रह्मचारी ही है ।

इसी तरह युवती स्त्री को चाहिये कि मासिक धर्म से शुद्ध होकर अपने पति से नियत समय में संन्तान के लिए समागम करे तो वह भी ब्रह्मचारिणी ही है -

या नारी पतिभक्ता स्यात्सा सदा ब्रह्मचारिणी ।

जो स्त्री केवल अपने पति से अनुराग रखती है, उचित समय पर संतति की इच्छा से सहवास कर गर्भ धारण करती है, वह सर्वदा ब्रह्मचारिणी कहलाती है किन्तु अपने पति के साथ भी अनियमित मैथुन करना, यह व्यभिचार है और यह पाप है । इसी तरह पुरुष भी ऋतुकाल के अलावा भले ही अपनी धर्मपत्नी से समागम करता है तो वह पाप

है - रजोदर्शनतः पूर्वं न स्त्री-संसर्गं माचरेत् ।

‘रजोदर्शन होने से पहले स्त्री से समागम करना निषेध है ।’

अतः संतति की प्राप्ति के लिए भगवत्प्रार्थना से युक्त होकर के कि हे करुणानिधान ! मैं आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए अपने ब्रह्मचर्य को क्षीण करता हूँ और आपकी प्राप्ति के लिए यह गृहस्थ-धर्म रूपी पूजा स्वीकार करने के लिए आपसे प्रार्थना करता हूँ, यह पूजा है आप स्वीकार कीजिये ।

पूर्वकाल में आश्रम परम्परा में २५ वर्ष तक तो प्रायः सभी ब्रह्मचर्य धारण करते थे फिर जिनको गृहस्थ में जाना होता था वह

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गृहस्थ में जाते थे और जिनको नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का व्रत लेना होता था वे वैरागी होते थे। दोनों महान पुरुष बनते। एक गृहस्थ में जाकर के धर्म पूर्वक चलते हुए पुनः वैराग्य को धारण करता और दूसरा विरक्ति में जाकर महापुरुष बन जाता।

लेकिन आज स्थिति यह है कि २५ वर्ष तक तो लोगों की बड़ी दुर्गति हो जाती है, क्योंकि अब कुंभसुलभ हो गया है, ऐसे-ऐसे साधन चल पड़े हैं कि उनमें दृश्य देख-देखकर लोगों की भावनाएँ दूषित हो रही हैं और वो अपने जीवन को नष्ट कर रहे हैं। ब्रह्मचर्य नष्ट हो गया तो फिर ये अमूल्य मानव जीवन किस काम का रह गया। पूर्व में जब लोग संयम पूर्वक रहकर के गर्भाधान करते थे तो उनकी स्त्रियों के गर्भ से बड़े-बड़े धर्मनिष्ठ, भगवदनुरागी महापुरुष या देश व समाज के लिए सुखप्रद महान वीर पुरुष पैदा होते थे। गृहस्थ धर्म का भी एक नियम है, यदि उसमें ब्रह्मचर्य से रहा जाय तो निश्चित संतान दिव्य पैदा होती है।

वह गृहस्थ धन्य है जो ब्रह्मचर्य पूर्वक संतानोत्पत्ति की क्रिया करके भगवान् की अराधना करता है।

वे सद्-गृहस्थ बहुत महान हैं, जो गृहस्थ जीवन में भी संयम से रहकर के संत की तरह जीवन यापन कर रहे हैं अन्यथा विरक्त साधक होकर के भी गंदे आचरणों की प्रवृत्ति बनी रहती है। जो सद्-गृहस्थ तरुणावस्था से ही यह संकल्प ले लेते हैं कि हम आजीवन ब्रह्मचर्य से रहेंगे और उस संकल्प को पूरा करने में जो स्त्रियाँ अपने पति का सहयोग करती हैं, वे निश्चित ही कृपापात्र हैं।

गृहस्थ जीवन में ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने कभी अपनी स्त्री से संसर्ग नहीं किया, जैसे श्रीकबीरदासजी हुए उनकी स्त्री का नाम लोई था, कबीरदास जी ने कभी अपनी पत्नी से संसर्ग नहीं किया।

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उनके जो पुत्र-पुत्री कमाल और कमाली थे, वे उन्हें दैवेच्छा से प्राप्त हुए थे न कि सन्तानोत्पत्ति की क्रिया से । कबीरदास जी ने कहा है -

दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी, ज्यू की ल्यू धर दीन्हि रे चदरिया ।

इसी तरह से गीतगोविन्दकार श्रीजयदेवजी हुए हैं, उनकी धर्मपत्नी का नाम पद्मावती था, श्रीजगन्नाथ जी की इच्छा से जयदेव जी को विवाह करना पड़ा, किन्तु कभी स्त्री के साथ उन्होंने संसर्ग नहीं किया । उनकी स्त्री ने भी उनके नियम पालन में पूर्ण सहयोग किया ।

प्रभु की बड़ी कृपा है उनके ऊपर जो दम्पत्ति संयमपूर्वक जीवन बिताना चाहते हैं । विषय-भोग करना, स्वाप्निक भोगों में फँसना कोई कर्तव्य नहीं है । कर्तव्य तो एकमात्र यही है इस साधनधाम दुर्लभ मनुष्य शरीर से प्रभु के चरणारविन्दों का प्रेम प्राप्त करना । श्रीमद्भागवत में ऋषभ भगवान् ने अपने पुत्रों को उपदेश देते हुए यही बताया था कि -

नायं देहो देहभाजां नूलोके कष्टान् कामानर्हते विद्वुजां ये । तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्धयेद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ॥

(श्रीमद्भागवत ५/५/१)

‘मनुष्य लोक में शरीरधारी मनुष्यों का यह शरीर कष्ट देने वाले विषयों को भोगने के लिए नहीं है, क्योंकि यह विषय-भोग तो शूकरादि योनियों में सुलभ हैं । अतः हे पुत्रो ! इस शरीर से संयम पूर्वक रहते हुए दिव्य तप करना चाहिए, जिससे अन्तःकरण शुद्ध होता है और अपार आनंद की अर्थात् भगवद्-रस की प्राप्ति होती है ।’

आज ये जो बात हमारे हृदय में बैठ गई है कि ‘हम तो गृहस्थी हैं, हमें तो भोग-भोगने का लाइसेंस मिल गया’, - ये पूर्ण निकृष्टता की बात है । हाँ, जो संयमपूर्वक नहीं रह पा रहा है तो उसके लिए शास्त्रीय विधान है कि वह ऋतुकाल में स्त्री-समागम कर सकता है,

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परन्तु तब जब संतानोत्पत्ति की लालसा हो । नहीं तो वास्तविक बात तो यही है कि ब्रह्मचर्य से युक्त होकर के भगवदाराधन करते हुए आत्मकल्याण करके ये जन्म सुधार लिया जाय । इन भोगों की तो अन्य योनियों (सुअर, कुत्ता आदि) में बहुतायत है - सभी इन्हीं भोगों में रमे हुए हैं । इसलिए मनुष्य जीवन विषय-भोग रूपी कर्तव्य के लिए नहीं है । मनुष्यमात्र का तो एकमात्र यही धर्म है, प्रभु के चरणों में भक्ति हो जाना -

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।

अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १/२/६)

‘अधोक्षज भगवान् में अपना चित्त समर्पित हो जाना, उनके चरणों में प्रेम हो जाना - यही परम धर्म है जीवमात्र का । इसीलिये भगवान् गीताजी में आदेश करते हैं कि -

सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज ।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (१८/६६)

‘सब धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़ो और केवल मेरे चरणों का आश्रय लो ।

यदि संयम से चलोगे तो गृहस्थ-धर्म में रहकर भी भगवत्प्राप्ति के योग्य हो जाओगे । भगवान् ने गृहस्थ का इसीलिये रास्ता दिया कि पति-पत्नी मिलकर के काम पर विजय प्राप्त करें, इसलिए नहीं दिया कि रोज भ्रष्ट होते रहें । गृहस्थाश्रम एक सुरक्षित किला है जिसकी आड़ में उच्छृंखल काम प्रवृत्ति से बचा जा सकता है ।

ब्रह्मचर्य हानि का मतलब है कि तुम रोज मर रहे हो । रोज मृत्यु को गले लगा रहे हो । संयम से चलोगे तो आनंदित रहोगे । संयम एक बहुत बड़ी शक्ति है । जिसके निकालने में लोग आनंद समझते हैं उसके रोकने में कितना आनंद होगा ? केवल संतान उत्पत्ति के लिए संग करो । हम लोग ब्रह्मर्षियों की संतानें हैं, उन्होंने भी तो

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स्त्री-संग किया लेकिन शास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार, बड़े-बड़े गृहस्थ आचार्य भी हुए, उनकी संतानें भी हुईं अतः एकपलीव्रती ब्रह्मचारी ही कहा जाता है ।

कोई ऐसा न समझे कि हम तो छिपकर व्यभिचार कर लेंगे क्योंकि हमें कोई देख नहीं रहा है, अरे! तुम कहाँ तक छिपोगे, हमारे कर्मों के १४ साक्षी होते हैं, जो हमारे कर्मों को देखते हैं, उनसे हम कहीं छिप ही नहीं सकते हैं – सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इंद्रियां, चन्द्रमा, संध्या, रात, दिन, दिशाएं, जल, पृथ्वी, काल और धर्म-ये सब कर्मों के साक्षी हैं ।

जै श्रीहित हरिवंश नरक गति दुरभर, यम द्वारे कटियत नक छीके ।

वहाँ यमलोक में ऐसा हिसाब है कि कहाँ छींका, कब छींका, इतने पर ही वहाँ नाक काट दी जाती है । वहाँ उँगली उठाने पर भी दण्ड है कि कहाँ उँगली उठायी, किसको उठायी, क्यों उठायी अर्थात् वहाँ एक-एक कर्म का हिसाब होता है । यदि कोई सोचता है कि मुझे कौन देख रहा, मौज-मस्ती कर लो, तो यह अच्छी तरह से समझ लो कि आप बच नहीं सकते हो निश्चित नारकीय यातनायें भोगनी पड़ेंगी ।

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।

‘मनुष्य को निजकृत शुभ या अशुभ कर्म का फल अवश्य मिलता है।’

यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम ।

अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ॥

‘मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है।’

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।

स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद् विमुच्यते ॥

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‘जीव स्वयं कर्म करता है और स्वयं उसका शुभाशुभ फल भोगता है। वह अपने ही कर्म से संसार में चक्कर लगाता है और अपने ही कर्मों से इन सबसे मुक्त भी होता है।’

इसीलिये श्रीकृष्णचन्द्रजू महाराज ने गीता जी में कहा –

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नाल्मानमवसादयेत् ।

आत्मेव ह्यात्मनो बन्धुरात्मेव रिपुरात्मनः ॥ (गी. ६/५)

‘अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करें और अपने को अधोगति में न डालें क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।’

इसीलिये सावधान - भूलि न देहि कुमारग पाऊ।

यदि कोई पुरुष काम से पीड़ित होकर के अगम्यागमन करता है अथवा स्त्री कामातुर होकर के पर पुरुष से समागम करती है तो उन्हें तप्तसूर्या नामक नरक में जाना पड़ता है। वहाँ तपाये हुए लोहे की स्त्री मूर्ति से पुरुष को एवं तपाये लोहे के पुरुष से स्त्री को बहुत काल तक आलिंगन कराया (चिपकाया) जाता है। ये दण्ड मिलता है -

सूर्या लोहमय्या पुरुषं आलिंगयन्ति स्त्रियं च पुरुष रूप्या सूर्या ।

(श्रीमद्भा० ५/२६/२०)

श्रीरामचरितमानस में अनुसूया जी ने भी कहा है -

पति वंचक परपति रति करई । रौरव नरक कल्प सत परई ॥

छन सुख लागि जनम सत कोटि । दुख न समुझ तेहि सम को खोटी ॥

पति प्रतिकूल जनम जहाँ जाई । विधवा होइ पाइ तरनाई ॥ (३/५)

जो स्त्री अपने पति को छोड़कर किसी पर पुरुष को कामुकता की दृष्टि से देखती हैं, उससे संपर्क करती है तो उसे सौ कल्पतक रौरव नरक में पड़ा रहना पड़ता है। क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन

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होगी। जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं भरी जवानी में विधवा हो जाती है और यदि स्त्री पतिव्रत धर्म से चलती है, तो उसे बिना कुछ साधना किये इतने से ही परम गति की प्राप्ति हो जाती है -

बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिव्रत धर्म छाड़ि छल गहई ॥

जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है।

अतः स्त्री-पुरुष दोनों को व्यवहार से बचना चाहिए क्योंकि -

दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः।

दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥ (मनु स्मृति)

‘दुराचारी मनुष्य संसार में निन्दा का पात्र, सदा दुखी, रोग-ग्रस्त और अल्पायु होता है।’

अतः अगर भ्रष्ट आचरण करोगे तो तुम्हारी संतान कैसे बलवान होगी। गृहस्थी में भी जाना है तो तब तक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें जब तक आप गृहस्थ धर्म से युक्त न हो जाएँ और यदि विरक्त हैं तो आजीवन ब्रह्मचर्य धारण करें; थोड़े दिन यद्यपि जलन होगी लेकिन इसको यदि आप सह जायेंगे तो बहुत आनंद में रहेंगे, बड़ी शीतलता मिलेगी, द्वंद्वों से लड़ने की सामर्थ्य आयेगी, भगवत्प्राप्ति का उत्साह होगा।

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अष्टांग मैथुन का त्यागी ही सच्चा ब्रह्मचारी

योगदर्शन के भाष्य में भाष्यकार श्रीवेदव्यासजी ब्रह्मचर्य की परिभाषा लिखते हैं - 'ब्रह्मचर्य गुप्तेन्द्रियस्योपस्थस्य संयमः ।' अर्थात् गुप्त (उपस्थ) इन्द्रिय के संयम को ब्रह्मचर्य कहते हैं । अन्यत्र ब्रह्मचर्य की और सूक्ष्म व्याख्या भी मिलती है -

'ब्रह्मचर्य नाम सर्वावस्थासु मनोवाक्कायकर्मभिः सर्वत्र मैथुनत्यागः ।'

कायेन मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा ।

सर्वत्र मैथुन-त्यागो, ब्रह्मचर्य प्रचक्षते ॥

शरीर, मन और वचन से सभी अवस्थाओं में, सर्वदा और सर्वत्र मैथुन (सम्भोग) के त्याग को ब्रह्मचर्य कहा जाता है ।

कायिक ब्रह्मचर्य - आलिंगन, चुम्बन, अंगमर्दन तथा उपस्थेन्द्रिय के सञ्चालन से रहित होना ।

मानसिक ब्रह्मचर्य - विषय-चिंतन, सम्भोग के मनोरथ आदि को भलीभाँति त्याग देना ।

वाचिक ब्रह्मचर्य - प्राकृत प्रेमालाप, विषय सम्बन्धी चर्चा, गुह्य भाषण आदि से रहित होना ।

स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणम् ।

संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्पत्तिरेव च ॥

एतन्मैथुनमष्टांगं प्रवदन्ति मनीषिणः ।

विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मुमुक्षुभिः ॥ (दक्ष संहिता)

स्मरण, कीर्तन, केलि, प्रेक्षण, गुप्तभाषण, संकल्प, अध्यवसाय और क्रिया-निष्पत्ति - ये मैथुन के आठ अंग मनीषियों ने बताया हैं, इसके विपरीत इन सबका त्याग ही पूर्ण ब्रह्मचर्य माना जाता है ।

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(१) स्मरण – किसी चित्र या दृश्य में देखे हुए स्त्री के रूप का काम-भाव से चिंतन करना अथवा किसी आस-पड़ौस की रूपवती स्त्री को देखकर लंपट होकर निरन्तर उसका स्मरण करना; इससे ब्रह्मचर्य नष्ट हो जाता है। इसलिए यदि बुरे विचार कभी मन में उदित हों तो उन्हें तत्काल दूर कर देना चाहिए, कदापि मन में जमने नहीं देना चाहिए। वेदों में लिखा है 'तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु' मेरा मन शुद्ध विचारों वाला हो।

श्रीनारदजी महाराज ने भी भक्तिसूत्र में कहा है कि 'स्त्री, धन, बैरी तथा नास्तिक का चरित्र श्रवण नहीं करना चाहिए।' क्योंकि हम जिसकी चर्चा करते हैं तो हमारा चित्त उसी का चिंतन करने लगता है। जैसे किसी स्त्री के रूप और स्वभाव आदि की चर्चा सुनी तो मन उसी का चिंतन करने लगेगा और 'यस्य मनः स्त्रियाश्चिन्तने संलग्नं स भगवच्चिन्तनं कथमपि न कर्तुं शक्नोति।' जिसका मन स्त्री के चिंतन में संलग्न है, उसकी सामर्थ्य नहीं है कि वह भगवच्चिन्तन कर सके। जब हम स्त्री-सम्बन्धी चर्चा (स्त्री के रूप के विषय में वार्ता या स्त्री सुख की चर्चा) करते हैं तो हमारा चित्त उसका चिन्तन करने लगता है क्योंकि चित्त एक शुभ्र (श्वेत) वस्त्र की भाँति है, जो कुछ हम देखते हैं, सुनते हैं या चिंतन करते हैं वैसा ही रंग उस पर चढ़ जाता है, यदि हम आँखों से स्त्री के रूप को देखेंगे, कान से स्त्री-सुख-सम्बन्धी वार्ता सुनेंगे तो वही चिंतन चलने लगेगा और निश्चित हम भ्रष्ट हो जायेंगे।

श्रीकपिल भगवान् ने कहा है –

न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः ।

योपित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ (श्रीमद्भा० ३/३१/३५)

'इस पुरुष को किसी और के साथ से वैसा अज्ञान और बंधन नहीं हो सकता है, जैसा स्त्रियों के संग से अथवा स्त्रियों के चक्र में

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रहने वालों के साथ से होता है ।’ (यही सूत्र स्त्री साथकों के लिए भी है ।)

(२) कीर्तन – स्त्रियों के रूप, गुण और अंगों की चर्चा करना अथवा विषय-सम्बन्धी गीत गाना या गंदी बातें करना । काम सम्बन्धी चर्चा विषयी पुरुषों के पास ज्यादा मिलती है । इसीलिये उनका संग विलकुल हानिकारक है ।

(३) केलि – स्त्रियों के साथ खेल खेलना, हँसी-मजाक करना, अधिक बैठना-उठना आदि । बहुत लोगों की आदत होती है कि वे स्त्रियों में बैठकर हँसी-मजाक करते हैं, इन बातों से काम-वासना बढ़ती है, अंगों में उत्तेजना उत्पन्न होती है तथा वीर्य अपने स्थान से च्युत होता है ।

(४) प्रेक्षण – कामुकता की दृष्टि से स्त्रियों को घूरना, छिपकर के उन्हें देखना ।

(५) गुह्य भाषण – किसी स्त्री से एकांत में बातचीत करना । साधक को कभी भी ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए । भले ही वह भगवत्-सम्बन्धी वार्ता ही क्यों न हो ? सबके सामने करे एकांत में नहीं; क्योंकि पहले अपनी स्थिति देख ले कि क्या अभी हमारा पुरुषत्व का अभिमान सर्वथा नष्ट हो गया है अर्थात् किसी भी भावना से आपके हृदय में ये भाव नहीं आयेगा कि यह भोग्य-वस्तु है, तो फिर प्रभु की आप पर अपार कृपा है फिर त्रिभुवन में आपको कोई पतित नहीं कर सकता क्योंकि –

‘न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥’

‘ब्रह्मानन्दे निमग्नस्य विषयाशा न तद्भवेत् ॥’

जो आत्माराम बोधसंपन्न महापुरुष हैं जब उन्हें सर्वत्र यच्चिदानंद प्रभु दीख रहे हैं तो कौन उनको भ्रष्ट कर सकता है, लेकिन जब तक स्त्रीत्व-पुरुषत्व का अहं है, तब तक विपरीत शरीरधारी साधक

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के साथ एकांत में संभाषण करने से बचना चाहिए; लोकसंग्रह की दृष्टि से भी । यदि अति आवश्यक हो यानी बात करनी ही पड़े तो खुले में करो, जहाँ सब लोग आपको देख रहे हों । यदि आप एकांत में ऐसा कर रहे हैं तो आप ब्रह्मचर्य से नहीं रह सकते हो, ऐसा शास्त्र का कथन है ।

(६) संकल्प – किसी स्त्री को देखकर मैथुन का संकल्प करना ।

(७) अध्यवसाय – उस संकल्प को पूरा करने के लिए उपाय करना । अर्थात् शील-लज्जा आदि को छोड़कर उचित-अनुचित का विचार न करते हुए गंदे कृत्य करने के लिए निश्चय करना ।

(८) क्रिया-निष्पत्ति – क्रिया पूरी करना अर्थात् सम्भोग करके वीर्य स्वलित करना । इन ८ गलतियों से ब्रह्मचर्य क्षीण हो जाता है । ये जो ब्रह्मचर्य के नाशक अष्ट प्रकार के भाव हैं, इनसे पूर्णतया बचना चाहिए ।

जो साधक या साधिका ब्रह्मचर्य से रहना चाहें वे कभी भी कामुकता की दृष्टि से परस्पर शरीरों को न देखें और न ही कभी भी किसी भी भावना से विपरीत शरीरधारी को अपने निकट आने दें तथा न स्वयं उनके सन्निकट जायें । ऐसा भाव कभी मन में न आये कि मैं तो सिद्ध हूँ, मैं जैसा चाहूँ मनमाना आचरण कर सकता हूँ । भगवान व्यासदेव जी ने लिखा है कि बड़े-बड़े विद्वान् भी इस आकर्षण में गिर सकते हैं –

मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विवित्कासनो भवेत् ।

बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वान्समपि कर्षति ॥ (भा. ९/१९/१७)

‘मनुष्य को चाहिये कि अपनी माता, बहन अथवा पुत्री के साथ भी कभी एकांत में न रहे; क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं, वे विद्वान् पुरुष को भी अपनी तरफ खींच लेती हैं ।’

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गृहस्थ उपासक को भी अपनी पत्नी के सिवाय कभी भी किसी स्त्री से एकांत में संभाषण नहीं करना चाहिए ।

श्रीकपिल भगवान् ने कहा है कि 'जो पुरुष योग के परम पद पर आरूढ़ होना चाहता हो अथवा जिसे मेरी (प्रभु की) सेवा के प्रभाव से आत्मा-अनात्मा का विवेक हो गया हो, वह स्त्रियों का संग कभी न करे; ऐसा करने पर उसका पतन सुनिश्चित है ।'

अतः साधक को सदैव मार्ग में दृष्टि झुकाकर के चलना चाहिए ताकि कोई ऐसा दृश्य सामने न आ जाए जो विचलित कर दे । अजामिल के साथ यही तो हुआ था, वह बड़ा सदाचारी और समस्त दिव्य सद्गुणों से सम्पन्न, शास्त्र और गुरु की आज्ञा में चलने वाला उच्च कोटि का साधक था लेकिन एक दृश्य (वैश्या और शूद्र के विहार) ने उसको कितना पतित बना दिया ।

इसी तरह सौभरी ऋषि यमुना जल में तप कर रहे थे उनको भी एक दृश्य (मछली के विहार) ने ऐसा विचलित किया कि उन्हें मान्धाता की ५० कन्याओं से विवाह करना पड़ा और ५ हजार संतानों की उत्पत्ति हुई, बाद में बहुत पछताए और बोले -

अहो इमं पश्यत मे विनाशं तपस्विनः सच्चरितव्रतस्य ।

अन्तर्जले वारिचरप्रसङ्गात्प्रच्यावितं ब्रह्म चिरं धृतं यत् ॥

सङ्गं त्यजेत मिथुनव्रतिनां मुमुक्षुः

सर्वान्मना न विसृजेद् बहिरिन्द्रियाणि ॥

एकश्ररन् रहसि चित्तमनन्त ईशे

युञ्जीत तद्वतिषु साधुषु चेत् प्रसङ्गः ॥ (श्रीमद्भा० ९/६५/५०,५१)

'तपस्वी, सदाचारी, व्रतों का पालन करने वाले मेरे इस विनाश को देखो । जल के अन्दर मछली के प्रसंग से मैंने अपने ब्रह्मतेज को नष्ट कर दिया, जो चिरकाल से धारण किया था । मोक्ष का इच्छुक

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साधक भोगी प्राणियों का संग त्याग दे । सब प्रकार से इन्द्रियों को अन्तर्मुख कर ले । अकेला ही रहता हुआ एकान्त में मन को प्रभु में लगा दे । यदि संग करे तो भगवत्प्रेमी महात्माओं का करे ।'

इसलिए (मन पर कभी विश्वास नहीं करना कि हम बड़े ऊँचे संयमी साधक हैं, हमारे ऊपर किसी दृश्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। सावधान ! अगर इस तरह से मन की बात मानकर असावधानी पूर्वक हमने व्यवहार किया तो पतन होने से कोई बचा नहीं सकता है।)

इसलिए विपरीत शरीरधारी साधक से बात भी करो तो नजर झुकाकर के । इस तरह से इस आकर्षण से बचा जा सकता है, अगर नेत्र से नेत्र मिलाकर के देखोगे तो तुम्हारे चित्त का हरण हो जाएगा -

दर्शनात् हरते चित्तं, स्पर्शात् हरते बलम् ।

भोगात् हरते वीर्यं, स्त्री प्रत्यक्षा राक्षसी ॥

अर्थात् स्त्री शरीर को देखने मात्र से चित्त का हरण होता है (मन उन पर मोहित हो जाता है), उसके स्पर्श से बल का हरण होता है और उसके साथ समागम करने से वीर्य का हरण होता है, अतएव पराई स्त्री पुरुष के लिए और पर-पुरुष स्त्री के लिए साक्षात् विपत्ति के समान है; इसलिए महापुरुषों ने कहा है -

अरे नर परनारी मत ताक रे ।

जिन जिन ओर डायन के तिन तिन को गयी भाख रे ॥

दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैः अजितेन्द्रियः ।

प्रलोभितः पतत्यन्धे तमस्यग्नौ पतङ्गवत् ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता ११/८/७)

'जैसे रूपासक्त पतंग अग्नि में जा गिरता है । वैसे ही अजितेन्द्रिय पुरुष भी देवमाया स्त्री को देखकर उसके हाव-भावों से मोहित होकर घोर अन्धकार में गिर जाता है ।' यही बात स्त्री साधकों को पुरुष वर्ग के लिए ध्यान रखनी है ।'

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जब तक पूर्ण भगवदाकार वृत्ति नहीं हो जाती, तब तक 'काम' का संस्कार रहता ही है क्योंकि पूर्व जन्म-जन्मान्तरो के संस्कार चित्त पर जमा हैं। लेकिन जब हम सावधानी पूर्वक चलेंगे तो एक दिन ऐसा आयेगा कि हृदय एक दम शान्त और निर्मल होने लगेगा, संस्कार तनुत्व (कमजोर) अवस्था को जैसे-जैसे प्राप्त होंगे तो तरंगों की भाँति हो जायेंगे और फिर अन्ततोगत्वा दग्धबीज हो जायेंगे।

न मव्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते ।

भर्जिता कथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते ॥ (भा. १०/२२/२६)

‘जिनकी बुद्धि प्रभु में लगी हुयी है उनके अन्दर काम पैदा नहीं हो सकता। जैसे जिन बीजों को भून या उबाल दिया जाता है, वे अंकुर के रूप में उगने योग्य नहीं रह जाते हैं।’ किन्तु ये संस्कार बहुत दूर तक रहते हैं, जब तक भगवत्प्राप्ति नहीं होती तब तक रहते ही हैं। चिंगारी रूप से बने रहते हैं और जहाँ इनको हवा और ईधन मिला तो ज्वाला रूप हो जाते हैं। श्रीनारदजी महाराज कह रहे हैं कि जब उनको संयोग मिलता है तो वे समुद्र की भाँति हो जाते हैं – ‘तरंगायिता अपीमे संगाल्समुद्रायन्ति ॥’ ‘अर्थात् दुःसंग से ये (कामक्रोधादि) तरंग रूप से समुद्र जैसे विशालकाय रूप ग्रहण कर लेते हैं।’ कोई ये न समझ ले कि अवस्था से इनका नाश होता है। अवस्था से नहीं अपितु भगवत्प्राप्ति से नाश होता है, अब भगवत्प्राप्ति जब हो जाए तब आप निष्काम हो जायेंगे। जो भगवत्प्राप्त महापुरुष हैं त्रिकाल में ऐसा नहीं हो सकता कि कोई विकार आकर के अपना प्रभाव उनके ऊपर दिखा सके। जहाँ अभी थोड़ा भी जीवत्व है तो ये चिंगारी रूप में रहते हैं। यद्यपि चिंगारी में ताकत नहीं है लेकिन अगर उसको मसाला (ईधन) मिल जाए तो ज्वाला होने में देर नहीं लगती है। इसलिए जो अच्छे भजनानंदी साधक होते हैं वह भी डरते रहते हैं विषयों से।

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जैसे कोई साधक कहे हम तो किसी माता-बहिन को भगवद्भाव से देखते हैं लेकिन शास्त्र इसके लिए भी निषेध करता है । अगर धोखे से दृष्टि चली जाय तो उनमें भगवद्भाव करो लेकिन उनकी तरफ भगवद्भाव से भी नहीं देखो अन्यथा भ्रष्ट होने के पूर्ण अवसर होते हैं ।

श्रीलक्ष्मण जी इसी मर्यादा से चलते थे । ऋष्यमूक पर्वत पर जब सुग्रीव जी ने राम जी को सीता जी के आभूषण दिखाए तो प्रभु श्रीराम ने लक्ष्मण जी को दिखाकर कहा कि पहचानो क्या ये आभूषण सीता के ही हैं ? तब लक्ष्मण जी ने कहा -

नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले ।

नूपुरेत्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥ (वाल्मीकि रामायण)

‘हे प्रभो! मैं इन बाजूबन्दों को नहीं जानता और न ही इन कुण्डलों को जानता हूँ । हाँ, इन विछुओं (नूपुरों) को अवश्य पहचानता हूँ, क्योंकि चरण-वंदना करते इन्हें नित्य देखा करता था ।’ अर्थात् लक्ष्मण जी ने सीता जी के चरणों के अलावा उन्हें दृष्टि उठाकर नहीं देखा । भ्रष्ट वही साधक होता है जो शास्त्र और गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करता है, यदि इनकी आज्ञानुसार व्यवहार हो तो कभी नाश या पतन नहीं हो सकता है । अगर कभी किसी स्त्री के प्रति भूल से नेत्र जाएँ तो तत्काल उनमें भगवती का भाव या माता का भाव करो । ये आद्यशक्ति जगदम्बा की अंश स्वरूपा हैं-‘विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियाः समस्ताः सकला जगत्सु ।’ कोशिश कीजिये उनके मस्तक, नेत्र और केशों पर दृष्टि न जाए, केवल चरणों पर दृष्टि रहे । ज्यादा देर वार्ता मत करो, एकांत में वार्ता मत करो । जहाँ दृष्टि जाए तत्काल नेत्र हटा लो, अगर दर्शन होते ही आपने कामभाव से देख लिया तो आप ब्रह्मचारी नहीं रह सकते या वह साधिका ब्रह्मचारिणी नहीं रह सकती, जिसने पुरुष को कामभाव से देख लिया ।

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