ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 32, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ें‘ऋतुकाल में संतानप्राप्ति के लिए अभिगमन (मैथुन) करना, यह ब्रह्मचर्य ही है ।’
ऋक्षतावृत्तौ स्वदारेषु संगतिं यत् विधानतः ।
ब्रह्मचर्यं तदेवोक्तं गृहस्थाश्रमवासिनाम् ॥
ऋतुकाल में अपनी स्त्री से विधियुक्त अर्थात् शास्त्राज्ञानुसार केवल संन्तान के हेतु समागम करने वाला पुरुष गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी ब्रह्मचारी ही है ।
इसी तरह युवती स्त्री को चाहिये कि मासिक धर्म से शुद्ध होकर अपने पति से नियत समय में संन्तान के लिए समागम करे तो वह भी ब्रह्मचारिणी ही है -
या नारी पतिभक्ता स्यात्सा सदा ब्रह्मचारिणी ।
जो स्त्री केवल अपने पति से अनुराग रखती है, उचित समय पर संतति की इच्छा से सहवास कर गर्भ धारण करती है, वह सर्वदा ब्रह्मचारिणी कहलाती है किन्तु अपने पति के साथ भी अनियमित मैथुन करना, यह व्यभिचार है और यह पाप है । इसी तरह पुरुष भी ऋतुकाल के अलावा भले ही अपनी धर्मपत्नी से समागम करता है तो वह पाप
है - रजोदर्शनतः पूर्वं न स्त्री-संसर्गं माचरेत् ।
‘रजोदर्शन होने से पहले स्त्री से समागम करना निषेध है ।’
अतः संतति की प्राप्ति के लिए भगवत्प्रार्थना से युक्त होकर के कि हे करुणानिधान ! मैं आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए अपने ब्रह्मचर्य को क्षीण करता हूँ और आपकी प्राप्ति के लिए यह गृहस्थ-धर्म रूपी पूजा स्वीकार करने के लिए आपसे प्रार्थना करता हूँ, यह पूजा है आप स्वीकार कीजिये ।
पूर्वकाल में आश्रम परम्परा में २५ वर्ष तक तो प्रायः सभी ब्रह्मचर्य धारण करते थे फिर जिनको गृहस्थ में जाना होता था वह
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