ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगृहस्थ में रहते हुए ब्रह्मचर्य से कैसे रहें ?
प्रायः स्थूल बुद्धिवाले लोग इतना ही समझते हैं कि ब्रह्मचर्य जीवन का काल विवाह के पूर्व समाप्त हो जाता है और विवाह हो चुकने पर फिर यथेष्ट विहार कर सकते हैं यानी विवाह से पूर्व तक ही संयम बरतना है विवाह होने पर तो मनचाहा स्त्री-संसर्ग कर सकते हैं लेकिन उन्हें यह पता नहीं है कि गृहस्थाश्रम का वास्तविक उद्देश्य सन्तानोत्पत्ति है न कि जननेन्द्रिय को तृप्त करना ।
यदि कोई गृहस्थ जीवन में है तो वह केवल शुद्ध संतानोत्पत्ति के लिए ही ब्रह्मचर्य खण्डित करे, अन्यथा नहीं, यही शास्त्राज्ञा है -
यद् घ्राणभक्षो विहितः सुरायास्तथा पशोरालभनं न हिंसा ।
एवं व्यवयः प्रजया न रत्या इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम् ॥
(श्रीमद्भगवद् गीता ११/५/१३)
‘सौत्रामणि यज्ञ में सुरा (मंदिर) को नासिका से सँघने का विधान है, पीने का नहीं; यज्ञ में पशु के स्पर्श करने का विधान है, हिंसा का नहीं; इसी प्रकार गृहस्थ जीवन संतानोत्पत्ति के लिए हैं, विषय-भोग के लिए नहीं – यही विशुद्ध धर्म का स्वरूप है किन्तु इस अपने धर्म को लोग नहीं जानते हैं ।’ श्रीमनु महाराज ने भी मनुस्मृति में कहा कि –
प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टाः सन्तानार्थञ्च मानवम् (मनुस्मृति)
‘गर्भ धारण करने के लिए स्त्रियों और गर्भाधान करने के लिए पुरुषों की रचना हुई है । यदि कोई पुरुष सन्तान प्राप्ति के लिए अपनी स्त्री से ऋतुकाल में समागम करता है तो उसका ब्रह्मचर्य नष्ट नहीं माना जाता क्योंकि – ऋतुकालाभिगमनं ब्रह्मचर्यमिवोच्यते ।
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