ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 33, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ेंगृहस्थ में जाते थे और जिनको नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का व्रत लेना होता था वे वैरागी होते थे। दोनों महान पुरुष बनते। एक गृहस्थ में जाकर के धर्म पूर्वक चलते हुए पुनः वैराग्य को धारण करता और दूसरा विरक्ति में जाकर महापुरुष बन जाता।
लेकिन आज स्थिति यह है कि २५ वर्ष तक तो लोगों की बड़ी दुर्गति हो जाती है, क्योंकि अब कुंभसुलभ हो गया है, ऐसे-ऐसे साधन चल पड़े हैं कि उनमें दृश्य देख-देखकर लोगों की भावनाएँ दूषित हो रही हैं और वो अपने जीवन को नष्ट कर रहे हैं। ब्रह्मचर्य नष्ट हो गया तो फिर ये अमूल्य मानव जीवन किस काम का रह गया। पूर्व में जब लोग संयम पूर्वक रहकर के गर्भाधान करते थे तो उनकी स्त्रियों के गर्भ से बड़े-बड़े धर्मनिष्ठ, भगवदनुरागी महापुरुष या देश व समाज के लिए सुखप्रद महान वीर पुरुष पैदा होते थे। गृहस्थ धर्म का भी एक नियम है, यदि उसमें ब्रह्मचर्य से रहा जाय तो निश्चित संतान दिव्य पैदा होती है।
वह गृहस्थ धन्य है जो ब्रह्मचर्य पूर्वक संतानोत्पत्ति की क्रिया करके भगवान् की अराधना करता है।
वे सद्-गृहस्थ बहुत महान हैं, जो गृहस्थ जीवन में भी संयम से रहकर के संत की तरह जीवन यापन कर रहे हैं अन्यथा विरक्त साधक होकर के भी गंदे आचरणों की प्रवृत्ति बनी रहती है। जो सद्-गृहस्थ तरुणावस्था से ही यह संकल्प ले लेते हैं कि हम आजीवन ब्रह्मचर्य से रहेंगे और उस संकल्प को पूरा करने में जो स्त्रियाँ अपने पति का सहयोग करती हैं, वे निश्चित ही कृपापात्र हैं।
गृहस्थ जीवन में ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने कभी अपनी स्त्री से संसर्ग नहीं किया, जैसे श्रीकबीरदासजी हुए उनकी स्त्री का नाम लोई था, कबीरदास जी ने कभी अपनी पत्नी से संसर्ग नहीं किया।
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