ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउनके जो पुत्र-पुत्री कमाल और कमाली थे, वे उन्हें दैवेच्छा से प्राप्त हुए थे न कि सन्तानोत्पत्ति की क्रिया से । कबीरदास जी ने कहा है -
दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी, ज्यू की ल्यू धर दीन्हि रे चदरिया ।
इसी तरह से गीतगोविन्दकार श्रीजयदेवजी हुए हैं, उनकी धर्मपत्नी का नाम पद्मावती था, श्रीजगन्नाथ जी की इच्छा से जयदेव जी को विवाह करना पड़ा, किन्तु कभी स्त्री के साथ उन्होंने संसर्ग नहीं किया । उनकी स्त्री ने भी उनके नियम पालन में पूर्ण सहयोग किया ।
प्रभु की बड़ी कृपा है उनके ऊपर जो दम्पत्ति संयमपूर्वक जीवन बिताना चाहते हैं । विषय-भोग करना, स्वाप्निक भोगों में फँसना कोई कर्तव्य नहीं है । कर्तव्य तो एकमात्र यही है इस साधनधाम दुर्लभ मनुष्य शरीर से प्रभु के चरणारविन्दों का प्रेम प्राप्त करना । श्रीमद्भागवत में ऋषभ भगवान् ने अपने पुत्रों को उपदेश देते हुए यही बताया था कि -
नायं देहो देहभाजां नूलोके कष्टान् कामानर्हते विद्वुजां ये । तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्धयेद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ॥
(श्रीमद्भागवत ५/५/१)
‘मनुष्य लोक में शरीरधारी मनुष्यों का यह शरीर कष्ट देने वाले विषयों को भोगने के लिए नहीं है, क्योंकि यह विषय-भोग तो शूकरादि योनियों में सुलभ हैं । अतः हे पुत्रो ! इस शरीर से संयम पूर्वक रहते हुए दिव्य तप करना चाहिए, जिससे अन्तःकरण शुद्ध होता है और अपार आनंद की अर्थात् भगवद्-रस की प्राप्ति होती है ।’
आज ये जो बात हमारे हृदय में बैठ गई है कि ‘हम तो गृहस्थी हैं, हमें तो भोग-भोगने का लाइसेंस मिल गया’, - ये पूर्ण निकृष्टता की बात है । हाँ, जो संयमपूर्वक नहीं रह पा रहा है तो उसके लिए शास्त्रीय विधान है कि वह ऋतुकाल में स्त्री-समागम कर सकता है,
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