ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपरन्तु तब जब संतानोत्पत्ति की लालसा हो । नहीं तो वास्तविक बात तो यही है कि ब्रह्मचर्य से युक्त होकर के भगवदाराधन करते हुए आत्मकल्याण करके ये जन्म सुधार लिया जाय । इन भोगों की तो अन्य योनियों (सुअर, कुत्ता आदि) में बहुतायत है - सभी इन्हीं भोगों में रमे हुए हैं । इसलिए मनुष्य जीवन विषय-भोग रूपी कर्तव्य के लिए नहीं है । मनुष्यमात्र का तो एकमात्र यही धर्म है, प्रभु के चरणों में भक्ति हो जाना -
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।
अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १/२/६)
‘अधोक्षज भगवान् में अपना चित्त समर्पित हो जाना, उनके चरणों में प्रेम हो जाना - यही परम धर्म है जीवमात्र का । इसीलिये भगवान् गीताजी में आदेश करते हैं कि -
सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (१८/६६)
‘सब धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़ो और केवल मेरे चरणों का आश्रय लो ।
यदि संयम से चलोगे तो गृहस्थ-धर्म में रहकर भी भगवत्प्राप्ति के योग्य हो जाओगे । भगवान् ने गृहस्थ का इसीलिये रास्ता दिया कि पति-पत्नी मिलकर के काम पर विजय प्राप्त करें, इसलिए नहीं दिया कि रोज भ्रष्ट होते रहें । गृहस्थाश्रम एक सुरक्षित किला है जिसकी आड़ में उच्छृंखल काम प्रवृत्ति से बचा जा सकता है ।
ब्रह्मचर्य हानि का मतलब है कि तुम रोज मर रहे हो । रोज मृत्यु को गले लगा रहे हो । संयम से चलोगे तो आनंदित रहोगे । संयम एक बहुत बड़ी शक्ति है । जिसके निकालने में लोग आनंद समझते हैं उसके रोकने में कितना आनंद होगा ? केवल संतान उत्पत्ति के लिए संग करो । हम लोग ब्रह्मर्षियों की संतानें हैं, उन्होंने भी तो
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