ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 36, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्त्री-संग किया लेकिन शास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार, बड़े-बड़े गृहस्थ आचार्य भी हुए, उनकी संतानें भी हुईं अतः एकपलीव्रती ब्रह्मचारी ही कहा जाता है ।
कोई ऐसा न समझे कि हम तो छिपकर व्यभिचार कर लेंगे क्योंकि हमें कोई देख नहीं रहा है, अरे! तुम कहाँ तक छिपोगे, हमारे कर्मों के १४ साक्षी होते हैं, जो हमारे कर्मों को देखते हैं, उनसे हम कहीं छिप ही नहीं सकते हैं – सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इंद्रियां, चन्द्रमा, संध्या, रात, दिन, दिशाएं, जल, पृथ्वी, काल और धर्म-ये सब कर्मों के साक्षी हैं ।
जै श्रीहित हरिवंश नरक गति दुरभर, यम द्वारे कटियत नक छीके ।
वहाँ यमलोक में ऐसा हिसाब है कि कहाँ छींका, कब छींका, इतने पर ही वहाँ नाक काट दी जाती है । वहाँ उँगली उठाने पर भी दण्ड है कि कहाँ उँगली उठायी, किसको उठायी, क्यों उठायी अर्थात् वहाँ एक-एक कर्म का हिसाब होता है । यदि कोई सोचता है कि मुझे कौन देख रहा, मौज-मस्ती कर लो, तो यह अच्छी तरह से समझ लो कि आप बच नहीं सकते हो निश्चित नारकीय यातनायें भोगनी पड़ेंगी ।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।
‘मनुष्य को निजकृत शुभ या अशुभ कर्म का फल अवश्य मिलता है।’
यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम ।
अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ॥
‘मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है।’
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद् विमुच्यते ॥
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