ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
स्त्री-संग किया लेकिन शास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार, बड़े-बड़े गृहस्थ आचार्य भी हुए, उनकी संतानें भी हुईं अतः एकपलीव्रती ब्रह्मचारी ही कहा जाता है ।
कोई ऐसा न समझे कि हम तो छिपकर व्यभिचार कर लेंगे क्योंकि हमें कोई देख नहीं रहा है, अरे! तुम कहाँ तक छिपोगे, हमारे कर्मों के १४ साक्षी होते हैं, जो हमारे कर्मों को देखते हैं, उनसे हम कहीं छिप ही नहीं सकते हैं – सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इंद्रियां, चन्द्रमा, संध्या, रात, दिन, दिशाएं, जल, पृथ्वी, काल और धर्म-ये सब कर्मों के साक्षी हैं ।
जै श्रीहित हरिवंश नरक गति दुरभर, यम द्वारे कटियत नक छीके ।
वहाँ यमलोक में ऐसा हिसाब है कि कहाँ छींका, कब छींका, इतने पर ही वहाँ नाक काट दी जाती है । वहाँ उँगली उठाने पर भी दण्ड है कि कहाँ उँगली उठायी, किसको उठायी, क्यों उठायी अर्थात् वहाँ एक-एक कर्म का हिसाब होता है । यदि कोई सोचता है कि मुझे कौन देख रहा, मौज-मस्ती कर लो, तो यह अच्छी तरह से समझ लो कि आप बच नहीं सकते हो निश्चित नारकीय यातनायें भोगनी पड़ेंगी ।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।
‘मनुष्य को निजकृत शुभ या अशुभ कर्म का फल अवश्य मिलता है।’
यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम ।
अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ॥
‘मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है।’
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद् विमुच्यते ॥
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‘जीव स्वयं कर्म करता है और स्वयं उसका शुभाशुभ फल भोगता है। वह अपने ही कर्म से संसार में चक्कर लगाता है और अपने ही कर्मों से इन सबसे मुक्त भी होता है।’
इसीलिये श्रीकृष्णचन्द्रजू महाराज ने गीता जी में कहा –
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नाल्मानमवसादयेत् ।
आत्मेव ह्यात्मनो बन्धुरात्मेव रिपुरात्मनः ॥ (गी. ६/५)
‘अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करें और अपने को अधोगति में न डालें क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।’
इसीलिये सावधान - भूलि न देहि कुमारग पाऊ।
यदि कोई पुरुष काम से पीड़ित होकर के अगम्यागमन करता है अथवा स्त्री कामातुर होकर के पर पुरुष से समागम करती है तो उन्हें तप्तसूर्या नामक नरक में जाना पड़ता है। वहाँ तपाये हुए लोहे की स्त्री मूर्ति से पुरुष को एवं तपाये लोहे के पुरुष से स्त्री को बहुत काल तक आलिंगन कराया (चिपकाया) जाता है। ये दण्ड मिलता है -
सूर्या लोहमय्या पुरुषं आलिंगयन्ति स्त्रियं च पुरुष रूप्या सूर्या ।
(श्रीमद्भा० ५/२६/२०)
श्रीरामचरितमानस में अनुसूया जी ने भी कहा है -
पति वंचक परपति रति करई । रौरव नरक कल्प सत परई ॥
छन सुख लागि जनम सत कोटि । दुख न समुझ तेहि सम को खोटी ॥
पति प्रतिकूल जनम जहाँ जाई । विधवा होइ पाइ तरनाई ॥ (३/५)
जो स्त्री अपने पति को छोड़कर किसी पर पुरुष को कामुकता की दृष्टि से देखती हैं, उससे संपर्क करती है तो उसे सौ कल्पतक रौरव नरक में पड़ा रहना पड़ता है। क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन
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होगी। जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं भरी जवानी में विधवा हो जाती है और यदि स्त्री पतिव्रत धर्म से चलती है, तो उसे बिना कुछ साधना किये इतने से ही परम गति की प्राप्ति हो जाती है -
बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिव्रत धर्म छाड़ि छल गहई ॥
जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है।
अतः स्त्री-पुरुष दोनों को व्यवहार से बचना चाहिए क्योंकि -
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः।
दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥ (मनु स्मृति)
‘दुराचारी मनुष्य संसार में निन्दा का पात्र, सदा दुखी, रोग-ग्रस्त और अल्पायु होता है।’
अतः अगर भ्रष्ट आचरण करोगे तो तुम्हारी संतान कैसे बलवान होगी। गृहस्थी में भी जाना है तो तब तक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें जब तक आप गृहस्थ धर्म से युक्त न हो जाएँ और यदि विरक्त हैं तो आजीवन ब्रह्मचर्य धारण करें; थोड़े दिन यद्यपि जलन होगी लेकिन इसको यदि आप सह जायेंगे तो बहुत आनंद में रहेंगे, बड़ी शीतलता मिलेगी, द्वंद्वों से लड़ने की सामर्थ्य आयेगी, भगवत्प्राप्ति का उत्साह होगा।
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अष्टांग मैथुन का त्यागी ही सच्चा ब्रह्मचारी
योगदर्शन के भाष्य में भाष्यकार श्रीवेदव्यासजी ब्रह्मचर्य की परिभाषा लिखते हैं - 'ब्रह्मचर्य गुप्तेन्द्रियस्योपस्थस्य संयमः ।' अर्थात् गुप्त (उपस्थ) इन्द्रिय के संयम को ब्रह्मचर्य कहते हैं । अन्यत्र ब्रह्मचर्य की और सूक्ष्म व्याख्या भी मिलती है -
'ब्रह्मचर्य नाम सर्वावस्थासु मनोवाक्कायकर्मभिः सर्वत्र मैथुनत्यागः ।'
कायेन मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा ।
सर्वत्र मैथुन-त्यागो, ब्रह्मचर्य प्रचक्षते ॥
शरीर, मन और वचन से सभी अवस्थाओं में, सर्वदा और सर्वत्र मैथुन (सम्भोग) के त्याग को ब्रह्मचर्य कहा जाता है ।
कायिक ब्रह्मचर्य - आलिंगन, चुम्बन, अंगमर्दन तथा उपस्थेन्द्रिय के सञ्चालन से रहित होना ।
मानसिक ब्रह्मचर्य - विषय-चिंतन, सम्भोग के मनोरथ आदि को भलीभाँति त्याग देना ।
वाचिक ब्रह्मचर्य - प्राकृत प्रेमालाप, विषय सम्बन्धी चर्चा, गुह्य भाषण आदि से रहित होना ।
स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणम् ।
संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्पत्तिरेव च ॥
एतन्मैथुनमष्टांगं प्रवदन्ति मनीषिणः ।
विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मुमुक्षुभिः ॥ (दक्ष संहिता)
स्मरण, कीर्तन, केलि, प्रेक्षण, गुप्तभाषण, संकल्प, अध्यवसाय और क्रिया-निष्पत्ति - ये मैथुन के आठ अंग मनीषियों ने बताया हैं, इसके विपरीत इन सबका त्याग ही पूर्ण ब्रह्मचर्य माना जाता है ।
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(१) स्मरण – किसी चित्र या दृश्य में देखे हुए स्त्री के रूप का काम-भाव से चिंतन करना अथवा किसी आस-पड़ौस की रूपवती स्त्री को देखकर लंपट होकर निरन्तर उसका स्मरण करना; इससे ब्रह्मचर्य नष्ट हो जाता है। इसलिए यदि बुरे विचार कभी मन में उदित हों तो उन्हें तत्काल दूर कर देना चाहिए, कदापि मन में जमने नहीं देना चाहिए। वेदों में लिखा है 'तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु' मेरा मन शुद्ध विचारों वाला हो।
श्रीनारदजी महाराज ने भी भक्तिसूत्र में कहा है कि 'स्त्री, धन, बैरी तथा नास्तिक का चरित्र श्रवण नहीं करना चाहिए।' क्योंकि हम जिसकी चर्चा करते हैं तो हमारा चित्त उसी का चिंतन करने लगता है। जैसे किसी स्त्री के रूप और स्वभाव आदि की चर्चा सुनी तो मन उसी का चिंतन करने लगेगा और 'यस्य मनः स्त्रियाश्चिन्तने संलग्नं स भगवच्चिन्तनं कथमपि न कर्तुं शक्नोति।' जिसका मन स्त्री के चिंतन में संलग्न है, उसकी सामर्थ्य नहीं है कि वह भगवच्चिन्तन कर सके। जब हम स्त्री-सम्बन्धी चर्चा (स्त्री के रूप के विषय में वार्ता या स्त्री सुख की चर्चा) करते हैं तो हमारा चित्त उसका चिन्तन करने लगता है क्योंकि चित्त एक शुभ्र (श्वेत) वस्त्र की भाँति है, जो कुछ हम देखते हैं, सुनते हैं या चिंतन करते हैं वैसा ही रंग उस पर चढ़ जाता है, यदि हम आँखों से स्त्री के रूप को देखेंगे, कान से स्त्री-सुख-सम्बन्धी वार्ता सुनेंगे तो वही चिंतन चलने लगेगा और निश्चित हम भ्रष्ट हो जायेंगे।
श्रीकपिल भगवान् ने कहा है –
न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः ।
योपित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ (श्रीमद्भा० ३/३१/३५)
'इस पुरुष को किसी और के साथ से वैसा अज्ञान और बंधन नहीं हो सकता है, जैसा स्त्रियों के संग से अथवा स्त्रियों के चक्र में
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रहने वालों के साथ से होता है ।’ (यही सूत्र स्त्री साथकों के लिए भी है ।)
(२) कीर्तन – स्त्रियों के रूप, गुण और अंगों की चर्चा करना अथवा विषय-सम्बन्धी गीत गाना या गंदी बातें करना । काम सम्बन्धी चर्चा विषयी पुरुषों के पास ज्यादा मिलती है । इसीलिये उनका संग विलकुल हानिकारक है ।
(३) केलि – स्त्रियों के साथ खेल खेलना, हँसी-मजाक करना, अधिक बैठना-उठना आदि । बहुत लोगों की आदत होती है कि वे स्त्रियों में बैठकर हँसी-मजाक करते हैं, इन बातों से काम-वासना बढ़ती है, अंगों में उत्तेजना उत्पन्न होती है तथा वीर्य अपने स्थान से च्युत होता है ।
(४) प्रेक्षण – कामुकता की दृष्टि से स्त्रियों को घूरना, छिपकर के उन्हें देखना ।
(५) गुह्य भाषण – किसी स्त्री से एकांत में बातचीत करना । साधक को कभी भी ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए । भले ही वह भगवत्-सम्बन्धी वार्ता ही क्यों न हो ? सबके सामने करे एकांत में नहीं; क्योंकि पहले अपनी स्थिति देख ले कि क्या अभी हमारा पुरुषत्व का अभिमान सर्वथा नष्ट हो गया है अर्थात् किसी भी भावना से आपके हृदय में ये भाव नहीं आयेगा कि यह भोग्य-वस्तु है, तो फिर प्रभु की आप पर अपार कृपा है फिर त्रिभुवन में आपको कोई पतित नहीं कर सकता क्योंकि –
‘न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥’
‘ब्रह्मानन्दे निमग्नस्य विषयाशा न तद्भवेत् ॥’
जो आत्माराम बोधसंपन्न महापुरुष हैं जब उन्हें सर्वत्र यच्चिदानंद प्रभु दीख रहे हैं तो कौन उनको भ्रष्ट कर सकता है, लेकिन जब तक स्त्रीत्व-पुरुषत्व का अहं है, तब तक विपरीत शरीरधारी साधक
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के साथ एकांत में संभाषण करने से बचना चाहिए; लोकसंग्रह की दृष्टि से भी । यदि अति आवश्यक हो यानी बात करनी ही पड़े तो खुले में करो, जहाँ सब लोग आपको देख रहे हों । यदि आप एकांत में ऐसा कर रहे हैं तो आप ब्रह्मचर्य से नहीं रह सकते हो, ऐसा शास्त्र का कथन है ।
(६) संकल्प – किसी स्त्री को देखकर मैथुन का संकल्प करना ।
(७) अध्यवसाय – उस संकल्प को पूरा करने के लिए उपाय करना । अर्थात् शील-लज्जा आदि को छोड़कर उचित-अनुचित का विचार न करते हुए गंदे कृत्य करने के लिए निश्चय करना ।
(८) क्रिया-निष्पत्ति – क्रिया पूरी करना अर्थात् सम्भोग करके वीर्य स्वलित करना । इन ८ गलतियों से ब्रह्मचर्य क्षीण हो जाता है । ये जो ब्रह्मचर्य के नाशक अष्ट प्रकार के भाव हैं, इनसे पूर्णतया बचना चाहिए ।
जो साधक या साधिका ब्रह्मचर्य से रहना चाहें वे कभी भी कामुकता की दृष्टि से परस्पर शरीरों को न देखें और न ही कभी भी किसी भी भावना से विपरीत शरीरधारी को अपने निकट आने दें तथा न स्वयं उनके सन्निकट जायें । ऐसा भाव कभी मन में न आये कि मैं तो सिद्ध हूँ, मैं जैसा चाहूँ मनमाना आचरण कर सकता हूँ । भगवान व्यासदेव जी ने लिखा है कि बड़े-बड़े विद्वान् भी इस आकर्षण में गिर सकते हैं –
मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विवित्कासनो भवेत् ।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वान्समपि कर्षति ॥ (भा. ९/१९/१७)
‘मनुष्य को चाहिये कि अपनी माता, बहन अथवा पुत्री के साथ भी कभी एकांत में न रहे; क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं, वे विद्वान् पुरुष को भी अपनी तरफ खींच लेती हैं ।’
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गृहस्थ उपासक को भी अपनी पत्नी के सिवाय कभी भी किसी स्त्री से एकांत में संभाषण नहीं करना चाहिए ।
श्रीकपिल भगवान् ने कहा है कि 'जो पुरुष योग के परम पद पर आरूढ़ होना चाहता हो अथवा जिसे मेरी (प्रभु की) सेवा के प्रभाव से आत्मा-अनात्मा का विवेक हो गया हो, वह स्त्रियों का संग कभी न करे; ऐसा करने पर उसका पतन सुनिश्चित है ।'
अतः साधक को सदैव मार्ग में दृष्टि झुकाकर के चलना चाहिए ताकि कोई ऐसा दृश्य सामने न आ जाए जो विचलित कर दे । अजामिल के साथ यही तो हुआ था, वह बड़ा सदाचारी और समस्त दिव्य सद्गुणों से सम्पन्न, शास्त्र और गुरु की आज्ञा में चलने वाला उच्च कोटि का साधक था लेकिन एक दृश्य (वैश्या और शूद्र के विहार) ने उसको कितना पतित बना दिया ।
इसी तरह सौभरी ऋषि यमुना जल में तप कर रहे थे उनको भी एक दृश्य (मछली के विहार) ने ऐसा विचलित किया कि उन्हें मान्धाता की ५० कन्याओं से विवाह करना पड़ा और ५ हजार संतानों की उत्पत्ति हुई, बाद में बहुत पछताए और बोले -
अहो इमं पश्यत मे विनाशं तपस्विनः सच्चरितव्रतस्य ।
अन्तर्जले वारिचरप्रसङ्गात्प्रच्यावितं ब्रह्म चिरं धृतं यत् ॥
सङ्गं त्यजेत मिथुनव्रतिनां मुमुक्षुः
सर्वान्मना न विसृजेद् बहिरिन्द्रियाणि ॥
एकश्ररन् रहसि चित्तमनन्त ईशे
युञ्जीत तद्वतिषु साधुषु चेत् प्रसङ्गः ॥ (श्रीमद्भा० ९/६५/५०,५१)
'तपस्वी, सदाचारी, व्रतों का पालन करने वाले मेरे इस विनाश को देखो । जल के अन्दर मछली के प्रसंग से मैंने अपने ब्रह्मतेज को नष्ट कर दिया, जो चिरकाल से धारण किया था । मोक्ष का इच्छुक
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साधक भोगी प्राणियों का संग त्याग दे । सब प्रकार से इन्द्रियों को अन्तर्मुख कर ले । अकेला ही रहता हुआ एकान्त में मन को प्रभु में लगा दे । यदि संग करे तो भगवत्प्रेमी महात्माओं का करे ।'
इसलिए (मन पर कभी विश्वास नहीं करना कि हम बड़े ऊँचे संयमी साधक हैं, हमारे ऊपर किसी दृश्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। सावधान ! अगर इस तरह से मन की बात मानकर असावधानी पूर्वक हमने व्यवहार किया तो पतन होने से कोई बचा नहीं सकता है।)
इसलिए विपरीत शरीरधारी साधक से बात भी करो तो नजर झुकाकर के । इस तरह से इस आकर्षण से बचा जा सकता है, अगर नेत्र से नेत्र मिलाकर के देखोगे तो तुम्हारे चित्त का हरण हो जाएगा -
दर्शनात् हरते चित्तं, स्पर्शात् हरते बलम् ।
भोगात् हरते वीर्यं, स्त्री प्रत्यक्षा राक्षसी ॥
अर्थात् स्त्री शरीर को देखने मात्र से चित्त का हरण होता है (मन उन पर मोहित हो जाता है), उसके स्पर्श से बल का हरण होता है और उसके साथ समागम करने से वीर्य का हरण होता है, अतएव पराई स्त्री पुरुष के लिए और पर-पुरुष स्त्री के लिए साक्षात् विपत्ति के समान है; इसलिए महापुरुषों ने कहा है -
अरे नर परनारी मत ताक रे ।
जिन जिन ओर डायन के तिन तिन को गयी भाख रे ॥
दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैः अजितेन्द्रियः ।
प्रलोभितः पतत्यन्धे तमस्यग्नौ पतङ्गवत् ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता ११/८/७)
'जैसे रूपासक्त पतंग अग्नि में जा गिरता है । वैसे ही अजितेन्द्रिय पुरुष भी देवमाया स्त्री को देखकर उसके हाव-भावों से मोहित होकर घोर अन्धकार में गिर जाता है ।' यही बात स्त्री साधकों को पुरुष वर्ग के लिए ध्यान रखनी है ।'
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जब तक पूर्ण भगवदाकार वृत्ति नहीं हो जाती, तब तक 'काम' का संस्कार रहता ही है क्योंकि पूर्व जन्म-जन्मान्तरो के संस्कार चित्त पर जमा हैं। लेकिन जब हम सावधानी पूर्वक चलेंगे तो एक दिन ऐसा आयेगा कि हृदय एक दम शान्त और निर्मल होने लगेगा, संस्कार तनुत्व (कमजोर) अवस्था को जैसे-जैसे प्राप्त होंगे तो तरंगों की भाँति हो जायेंगे और फिर अन्ततोगत्वा दग्धबीज हो जायेंगे।
न मव्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते ।
भर्जिता कथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते ॥ (भा. १०/२२/२६)
‘जिनकी बुद्धि प्रभु में लगी हुयी है उनके अन्दर काम पैदा नहीं हो सकता। जैसे जिन बीजों को भून या उबाल दिया जाता है, वे अंकुर के रूप में उगने योग्य नहीं रह जाते हैं।’ किन्तु ये संस्कार बहुत दूर तक रहते हैं, जब तक भगवत्प्राप्ति नहीं होती तब तक रहते ही हैं। चिंगारी रूप से बने रहते हैं और जहाँ इनको हवा और ईधन मिला तो ज्वाला रूप हो जाते हैं। श्रीनारदजी महाराज कह रहे हैं कि जब उनको संयोग मिलता है तो वे समुद्र की भाँति हो जाते हैं – ‘तरंगायिता अपीमे संगाल्समुद्रायन्ति ॥’ ‘अर्थात् दुःसंग से ये (कामक्रोधादि) तरंग रूप से समुद्र जैसे विशालकाय रूप ग्रहण कर लेते हैं।’ कोई ये न समझ ले कि अवस्था से इनका नाश होता है। अवस्था से नहीं अपितु भगवत्प्राप्ति से नाश होता है, अब भगवत्प्राप्ति जब हो जाए तब आप निष्काम हो जायेंगे। जो भगवत्प्राप्त महापुरुष हैं त्रिकाल में ऐसा नहीं हो सकता कि कोई विकार आकर के अपना प्रभाव उनके ऊपर दिखा सके। जहाँ अभी थोड़ा भी जीवत्व है तो ये चिंगारी रूप में रहते हैं। यद्यपि चिंगारी में ताकत नहीं है लेकिन अगर उसको मसाला (ईधन) मिल जाए तो ज्वाला होने में देर नहीं लगती है। इसलिए जो अच्छे भजनानंदी साधक होते हैं वह भी डरते रहते हैं विषयों से।
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जैसे कोई साधक कहे हम तो किसी माता-बहिन को भगवद्भाव से देखते हैं लेकिन शास्त्र इसके लिए भी निषेध करता है । अगर धोखे से दृष्टि चली जाय तो उनमें भगवद्भाव करो लेकिन उनकी तरफ भगवद्भाव से भी नहीं देखो अन्यथा भ्रष्ट होने के पूर्ण अवसर होते हैं ।
श्रीलक्ष्मण जी इसी मर्यादा से चलते थे । ऋष्यमूक पर्वत पर जब सुग्रीव जी ने राम जी को सीता जी के आभूषण दिखाए तो प्रभु श्रीराम ने लक्ष्मण जी को दिखाकर कहा कि पहचानो क्या ये आभूषण सीता के ही हैं ? तब लक्ष्मण जी ने कहा -
नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले ।
नूपुरेत्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥ (वाल्मीकि रामायण)
‘हे प्रभो! मैं इन बाजूबन्दों को नहीं जानता और न ही इन कुण्डलों को जानता हूँ । हाँ, इन विछुओं (नूपुरों) को अवश्य पहचानता हूँ, क्योंकि चरण-वंदना करते इन्हें नित्य देखा करता था ।’ अर्थात् लक्ष्मण जी ने सीता जी के चरणों के अलावा उन्हें दृष्टि उठाकर नहीं देखा । भ्रष्ट वही साधक होता है जो शास्त्र और गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करता है, यदि इनकी आज्ञानुसार व्यवहार हो तो कभी नाश या पतन नहीं हो सकता है । अगर कभी किसी स्त्री के प्रति भूल से नेत्र जाएँ तो तत्काल उनमें भगवती का भाव या माता का भाव करो । ये आद्यशक्ति जगदम्बा की अंश स्वरूपा हैं-‘विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियाः समस्ताः सकला जगत्सु ।’ कोशिश कीजिये उनके मस्तक, नेत्र और केशों पर दृष्टि न जाए, केवल चरणों पर दृष्टि रहे । ज्यादा देर वार्ता मत करो, एकांत में वार्ता मत करो । जहाँ दृष्टि जाए तत्काल नेत्र हटा लो, अगर दर्शन होते ही आपने कामभाव से देख लिया तो आप ब्रह्मचारी नहीं रह सकते या वह साधिका ब्रह्मचारिणी नहीं रह सकती, जिसने पुरुष को कामभाव से देख लिया ।
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ब्रह्मचर्य में लाभकारी आहार एवं दिनचर्या
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ (गी. ६/१७)
‘जो साधक युक्त-आहार और युक्त-विहार करने वाला है, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाला है तथा परिमित शयन और जागरण करता है, ऐसे योगी का ‘योग’ उसके समस्त दुःखों का नाश कर देता है।’
ब्रह्मचर्य साधने के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है – खान-पान का संयम। शास्त्रों में लिखा है – को रुक्, को रुक्, को रुक् ? अर्थात् कौन स्वस्थ है तो इसका उत्तर है – हितभुक्, मितभुक्, ऋतभुक् । अर्थात् हितभुक् (हितकार भोजन ग्रहण करने वाला), मितभुक् (भूख से कम खाने वाला) और ऋतभुक् (न्याय-नीति से कमाया हुआ खाने वाला) ।
श्रुतियों में लिखा है – ‘अन्नमयं हि सौम्य मनः’ – अन्न के सूक्ष्मांश से मन का निर्माण होता है । इसलिए ‘आहार शुद्धौ सत्व शुद्धिः’ आहार शुद्ध होने से अन्तःकरण शुद्ध होता है अर्थात् सतोगुण की वृद्धि होती है और शुद्ध मन के द्वारा ही ब्रह्मचर्य सम्भव है । इसलिए ब्रह्मचर्य और भोजन में अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है । ब्रह्मचर्य के इच्छुक साधक को सादा, सात्विक और अल्पाहारी होना चाहिए, राजसी-तामसी आहार का पूर्णतया त्याग कर देना चाहिए अन्यथा वह वीर्य धारण नहीं कर सकता । भगवान् ने गीता जी में सात्विक-राजसादि आहार का वर्णन किया है –
आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ॥ (१७/८)
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‘रसयुक्त (फल, शकर, बताशा व दुग्धादि), चिकने (घी, किसमिस आदि), स्थिर रहने वाले (जिस भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहे) तथा हृदय को बल देने वाले आहार – ये सात्विक आहार हैं। इनसे आयु, सत्त्वगुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति की वृद्धि होती है।’ कदम्ललवणाल्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ (१७/८)
‘कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक आहार – ये राजस आहार हैं। ये दुःख, शोक तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले हैं।’ अर्थात् ब्रह्मचर्य के लिए बहुत हानिकारक हैं।
ब्रह्मचर्य में लाभप्रद आहार –
अन्न - जौ, गेहूँ, साठी, मूँग, अरहर, चना आदि। फल - (ऋतु के फल) सेब, अमरुद, पपीता, नासपाती, केला, नारियल, सिंघाड़ा, अनार, बेल आदि। शाक - (ऋतु के अनुसार) घिया (लौकी), परवल, तोरई, मटर, शिमला मिर्च, कद्दू, टिंडा, मूली, खीरा आदि।
ब्रह्मचर्य के लिए निषिद्ध खाद्य पदार्थ –
लाल मिर्च, गरम मशाला, राजमा, सोयाबीन एवं सोयाबीन बड़ी, मसूर दाल, साबुद उड़द, मशरूम, गाजर, चुकन्दर, मूगफली, काजू, बादाम, अखरोट, गुड़, प्याज, लहसुन, अचार, अत्यधिक उष्ण (गर्म), खट्टे, मीठे, नमकीन एवं तले हुए पदार्थ, पिज्जा, बर्गर, कचौड़ी-समोसा, मालपूआ, गरिष्ठ आहार, कोल्ड ड्रिंक्स एवं नशीले पदार्थ आदि।
ब्रह्मचर्य-साधना करने वाले को २४ घंटे में ज्यादा-से-ज्यादा दो बार भोजन करना चाहिए और जितनी भूख हो उससे आधा भोजन करना चाहिए, पेट भरकर खाना उचित नहीं है। दिन का भोजन दोपहर १ बजे से पूर्व एवं रात्रि का भोजन ८ बजे से पहले कर लेना चाहिए।
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भोजन पाते समय चिंतन दूषित नहीं होना चाहिए । मध्यान्ह भोजन के बाद १०-१५ मिनिट बारीं करवट लेटें एवं रात्रि भोजन के बाद थोड़ा टहलना आवश्यक है ।
साधक को २४ घंटे में कम से कम ३ से ५ लीटर और गर्मियों में ५ से ७ लीटर पानी पीना चाहिए । पानी बैठकर, मुँह से पात्र लगाकर, चुस्की लेकर, धीरे-धीरे मुँह में घुमाते हुए, घूँट-घूँट करके पीना चाहिए ताकि लार अन्दर जा सके, वह लाभकारी होती है । पानी सामान्य या हल्का गुनगुना पीना चाहिए परन्तु ठंडा (वर्फ डला या फ्रिज आदि का) पानी कदापि नहीं पीना चाहिए । खाना खाने के १ घंटे पहले या भोजन कर लेने के १ घंटे बाद पानी पीना चाहिए, भोजन के साथ नहीं और न ही भोजन करने के तुरंत बाद क्योंकि 'भोजनान्ते विषं वारि' भोजन के तुरंत बाद पानी पीना विष की तरह है; अगर भोजन के बीच में अति आवश्यकता हो तो बिल्कुल थोड़ा-सा पानी ले सकते हैं । खड़े होकर या लेटकर कभी पानी न पियें ।
ब्रह्मचर्य के लिए उपयोगी दिनचर्या – साधक को ब्रह्ममुहूर्त से पूर्व यानी ४ बजे तक उठ जाना चाहिये क्योंकि चार बजे के बाद ही अधिकांश ब्रह्मचर्य क्षीण होता है, जो ६ बजे तक सोते रहते हैं, वे ब्रह्मचारी कभी नहीं बन सकते; इसलिए रात्रि में जल्दी शयन और प्रातः जल्दी जगने का साधक को अभ्यास डालना चाहिये ।
उठने के बाद साधक को खाली पेट, बिना कुल्ला किये, काकासन या बज्रासन में बैठकर कम से कम १ से २ लीटर तक हल्का गर्म (गुनगुना) जल पीना चाहिए, इसे ऊषापान कहते हैं । यह बहुत ही लाभकारी अमृततुल्य होता है । यदि कब्ज हो तो थोड़ा नमक डालकर पीना चाहिये । ऊषापान के लिए सम्भव हो तो रात्रि में सोते समय ताँबे के पात्र में जल-भरकर ढककर उसे रख दें और प्रातःकाल
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उठते ही उसको पियें । फिर कुछ समय थोड़ा टहलें अथवा बज्रासन पर बैठें; तत्पश्चात् दैनिक कृत्य शौच-स्नानादि करें ।
नहाने से पहले नाभि पर जलधार डालें, फिर अच्छे से घर्षण करके नहायें, और ज्यादा गर्म पानी का उपयोग स्नान के लिए न करें, प्रतिदिन २ बार स्नान करें । प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर कुछ व्यायाम-प्राणायाम आदि करें ।
जिसे ब्रह्मचर्य का पालन करना है उसे नियमित व्यायाम करना अर्थात् शरीर को थकाना अत्यन्त ही आवश्यक है ।
ब्रह्मचर्य-संयम में सहायक आसन एवं प्राणायाम –
आसन – १. ब्रह्मचर्यासन, २. सिद्धासन, ३. बज्रासन, ४. पद्मासन, ५. पादपश्चिमोत्तानासन, ६. शीर्षासन, ७. जानुशिरासन, ८. पादांगुष्ठासन, ९. द्विपाद चक्रासन, १०. नाभ्यासन, ११. उत्थितएकैक-पादासन, १२. सम्प्रसारण भू नमनासन ।
(क्रमशः आसनों के चित्र)
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प्राणायाम – अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भस्त्रिका आदि ।
व्यायाम-प्राणायाम के तुरंत बाद लघुशंका अवश्य जाएँ और कम से कम ३० मिनिट तक कुछ खाएँ-पिएँ नहीं ।
औषधि सेवन – आंवला, त्रिफला चूर्ण एवं प्रातःकाल स्नानोपरान्त १ तुलसी की पत्ती पाएँ तथा शाम के समय १ नीम की पत्ती पाएँ, अगर वह पचने लगे तो धीरे-धीरे पाचन के अनुसार उनकी मात्रा में १० पत्तियों तक वृद्धि कर सकते हैं, ये बहुत लाभकारक औषधी है अथवा वीर्य पुष्टता के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सकों के परामर्श से कुछ दिनों के लिए औषधी ले लें और सेवन-विधि के अनुसार उसका सेवन करें ।
विशेष –
- (१) सूर्य नमस्कार एवं मूलबंध लगाना ब्रह्मचर्य में बहुत सहायक है ।
- (२) यदि संभव हो सके तो लँगोट (कौपीन) एवं खड़ाऊँ धारण करें ।
- (३) ब्रह्मचर्य पालन करने वाले साधक को कभी दिन में सोना नहीं चाहिए यदि रात्रि में नींद पूरी नहीं हुई हो तो १ घंटे विश्राम कर लें अन्यथा नहीं; एवं रात्रि में भी लघुशंका से निवृत्त होकर हाथ-पैर धुलकर, यदि सम्भव हो तो बायीं करवट सोना चाहिए ।
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(४) लघुशंका एवं शौच के वेग को कभी रोकना नहीं चाहिए तथा लघुशंका के उपरान्त जननेन्द्रिय पर कुछ पानी डालना चाहिए और हाथ-पैर धोकर आचमन करना चाहिए।
(५) सदैव साधन परायण रहना चाहिए यानी मन को कभी भी खाली नहीं छोड़ना चाहिए।
(६) ब्रह्मचर्य संयम के लिए शारीरिक श्रम करना अत्यन्त अनिवार्य है, जो उपासकजन हैं, वे नित्य धाम की परिक्रमा, आश्रम आदि की शरीर से सेवा अवश्य करें।
(७) व्यायाम-प्राणायाम आदि किसी योगाचार्य से समझकर ही करें।
(८) सबका मूल है - भगवत्तम जप, इससे शीघ्र अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और ब्रह्मचर्य धारण करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है।
(९) अत्यन्त आवश्यकता पड़ने पर ही किसी का स्पर्श करना चाहिए, अन्यथा उपासक किसी का स्पर्श न करे।
(१०) शरीर से शौचाचार का पूर्ण पालन करना चाहिए यानी शारीरिक पवित्रता पर भी पूर्ण ध्यान देना चाहिए।
(११) यदि दुग्ध पान करना है तो रात्रि में सोने से १ घण्टे पहले दूध पियें, अगर बहुत आवश्यकता हो तो थोड़ी-सी चीनी मिलायें, अन्यथा नहीं, एवं दूध अधिक गर्म नहीं होना चाहिए।
विचारों का संयम - यह ब्रह्मचर्य का मूल है, कोई व्यायाम-आसन-प्राणायाम कितना भी करता रहे यदि उसके विचारों का संयम नहीं है तो वह ब्रह्मचर्य कभी धारण नहीं कर सकता है। विचारों के संयम के लिए नित्य सत्संग करना एवं उत्तम ग्रंथों अर्थात् सत्साक्षों का नित्य स्वाध्याय करना आवश्यक है, क्योंकि उनसे हृदय में उत्तम भावनाओं का उदय होता है और मन में दूषित विचार आने कम हो जाते हैं।
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साधक को बाह्य संसर्ग यानि कुसंग (भोगी पुरुषों का संग, सिनेमा, खेल-तमासे, गंदे दृश्य आदि) से बहुत बचना चाहिए । मोबाइल (स्मार्टफोन) या इन्टरनेट के माध्यम से गंदे कामोत्तेजक भोग-सम्बन्धी दृश्य कभी नहीं देखने चाहिए ।
सार बात यह है कि साधक का खान-पान, पठन-पाठन, संग, चेष्टाएँ आदि सब कुछ सात्त्विक होना चाहिए, तभी अन्तःकरण में सत्त्वगुण की वृद्धि होगी, मन निर्मल होगा और ब्रह्मचर्य धारण करने की योग्यता प्राप्त होगी । यदि अन्तःकरण में रजोगुण-तमोगुण छाया रहेगा तो रोज ब्रह्मचर्य नष्ट होगा और साधक ब्रह्मचर्य संयम कदापि नहीं कर पायेगा । श्रीमद्भागवत में लिखा है –
आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च ।
ध्यानं मंत्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः ॥ (भा. ११/१३/४)
'शास्त्र, जल (खान-पान), प्रजा (संग), स्थान, समय, कर्म, जन्म, ध्यान, मंत्र और संस्कार – ये दस चीजें गुण परिवर्तन का हेतु हैं; ये यदि सात्त्विक हैं तो सत्त्वगुण की, राजस हैं तो रजोगुण की और यदि तामस हैं तो तमोगुण की अन्तःकरण में वृद्धि होती है ।
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पवित्र मन के द्वारा ही ब्रह्मचर्य सम्भव
एक मात्र विशुद्ध मन ही मनुष्य को ब्रह्मचारी एवं वीर्य धारण करने के लिए समर्थ बना सकता है और मन को शुद्ध करने के लिए सुयोग्य वैद्य हैं महात्माजन । बिना सत्पुरुषों की संगति के मन-बुद्धि पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं हो सकते हैं, इनकी शुद्धि तब मानी जाती है जब इनमें पूर्ण विवेक का प्रादुर्भाव हो जाय और विवेक की प्राप्ति एकमात्र सत्संग से ही होती है 'बिनु सत्संग बिबेक न होई ।' । अतः साधक को नित्य सत्संग करना चाहिए और सत्संग से प्राप्त विवेक के द्वारा शुद्ध हुआ मन वीर्यरक्षा के लिए दिव्यौषधि है । बाकी अन्य जितने ब्रह्मचर्य-संयम के उपाय हैं, वे अब आनुषंगिक हैं ।
इसलिए जो भी साधक (गृहस्थ या विरक्त) ब्रह्मचर्य धारण करना चाहता है तो उसे मन की शुद्धि पर बहुत ध्यान देना चाहिए, यदि मन अपवित्र है, कुसंस्कारों से युक्त है तो साधक ब्रह्मचारी रह ही नहीं सकता है । अतः ब्रह्मचर्य में सर्वाधिक आवश्यक है अध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा चित्त का परिवर्तन करना । हम बाहर से खान-पान आदि सब कुछ ठीक कर लें लेकिन चिन्तन यदि विषयों का बना हुआ है तो बहुत प्रयास करने पर भी हम ब्रह्मचर्य धारण करने में समर्थ नहीं हो पायेंगे, हम हार जायेंगे; ऐसा सैकड़ों प्रयासरत् साधकों का अनुभव है कि प्रयास करने पर भी हम सफल नहीं हो पाते हैं; हरि-गुरु आदि की सौगन्ध खाने पर भी हम सफल नहीं होते, तो इसका प्रधान कारण असत्-चिन्तन ही है ।
चिन्तन में हमारे यह बात दृढ़ता से बैठ गयी है कि इन्द्रियजल्प भोगों में बड़ा सुख है, यही जीवन का परम आनंद है । अब हम कुछ
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दिन तक तो किसी पूजनीय की सौगन्ध आदि खाकर के भले ही ब्रह्मचर्य को रोक सकते हैं लेकिन उससे ज्यादा वह नहीं रोका जा सकता है; क्योंकि विषयों के प्रति चित्त की महत्त्वबुद्धि बनी हुयी है । भगवान् ने गीता जी में भी यही बात कही है –
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ (२/५९,६०)
‘निराहार रहने वाले अर्थात् इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती है और आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ साधन परायण विद्वान् पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं अर्थात् उसे विषयों में गिरा देती हैं ।’ श्रीध्रुवदास जी महाराज ने भी कहा है –
रस बल छुटै न जौ विषय, सुख नहीं पावै कोइ ।
तन छोंड़े मन गहि रहै, दूनों दुख तहाँ होइ ॥
यदि चित्त से विषयासक्ति नष्ट नहीं हुई तो बाहर से विषय-सेवन त्याग देने पर भी साधक सुखी नहीं हो सकता ।
इसलिए आवश्यकता है हमें सत्संग के द्वारा चित्त में स्थित विषयासक्ति को नष्ट करने की अर्थात् चित्त का परिवर्तन करने की । भले ही हमारा भोजन सात्विक है, हम आसन-व्यायाम-प्राणायाम भी नियम से करते हैं किन्तु हमारा चिन्तन ठीक नहीं है तो हम विषय-संयोग होने पर उससे बच नहीं सकते हैं । हमारे मस्तिष्क में जो यह बात बैठी हुई है कि ‘स्त्री-शरीर में सुख है या स्त्री शरीरधारी साधिका
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