भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

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भोजन पाते समय चिंतन दूषित नहीं होना चाहिए । मध्यान्ह भोजन के बाद १०-१५ मिनिट बारीं करवट लेटें एवं रात्रि भोजन के बाद थोड़ा टहलना आवश्यक है ।

साधक को २४ घंटे में कम से कम ३ से ५ लीटर और गर्मियों में ५ से ७ लीटर पानी पीना चाहिए । पानी बैठकर, मुँह से पात्र लगाकर, चुस्की लेकर, धीरे-धीरे मुँह में घुमाते हुए, घूँट-घूँट करके पीना चाहिए ताकि लार अन्दर जा सके, वह लाभकारी होती है । पानी सामान्य या हल्का गुनगुना पीना चाहिए परन्तु ठंडा (वर्फ डला या फ्रिज आदि का) पानी कदापि नहीं पीना चाहिए । खाना खाने के १ घंटे पहले या भोजन कर लेने के १ घंटे बाद पानी पीना चाहिए, भोजन के साथ नहीं और न ही भोजन करने के तुरंत बाद क्योंकि 'भोजनान्ते विषं वारि' भोजन के तुरंत बाद पानी पीना विष की तरह है; अगर भोजन के बीच में अति आवश्यकता हो तो बिल्कुल थोड़ा-सा पानी ले सकते हैं । खड़े होकर या लेटकर कभी पानी न पियें ।

ब्रह्मचर्य के लिए उपयोगी दिनचर्या – साधक को ब्रह्ममुहूर्त से पूर्व यानी ४ बजे तक उठ जाना चाहिये क्योंकि चार बजे के बाद ही अधिकांश ब्रह्मचर्य क्षीण होता है, जो ६ बजे तक सोते रहते हैं, वे ब्रह्मचारी कभी नहीं बन सकते; इसलिए रात्रि में जल्दी शयन और प्रातः जल्दी जगने का साधक को अभ्यास डालना चाहिये ।

उठने के बाद साधक को खाली पेट, बिना कुल्ला किये, काकासन या बज्रासन में बैठकर कम से कम १ से २ लीटर तक हल्का गर्म (गुनगुना) जल पीना चाहिए, इसे ऊषापान कहते हैं । यह बहुत ही लाभकारी अमृततुल्य होता है । यदि कब्ज हो तो थोड़ा नमक डालकर पीना चाहिये । ऊषापान के लिए सम्भव हो तो रात्रि में सोते समय ताँबे के पात्र में जल-भरकर ढककर उसे रख दें और प्रातःकाल

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