भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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साधक को बाह्य संसर्ग यानि कुसंग (भोगी पुरुषों का संग, सिनेमा, खेल-तमासे, गंदे दृश्य आदि) से बहुत बचना चाहिए । मोबाइल (स्मार्टफोन) या इन्टरनेट के माध्यम से गंदे कामोत्तेजक भोग-सम्बन्धी दृश्य कभी नहीं देखने चाहिए ।

सार बात यह है कि साधक का खान-पान, पठन-पाठन, संग, चेष्टाएँ आदि सब कुछ सात्त्विक होना चाहिए, तभी अन्तःकरण में सत्त्वगुण की वृद्धि होगी, मन निर्मल होगा और ब्रह्मचर्य धारण करने की योग्यता प्राप्त होगी । यदि अन्तःकरण में रजोगुण-तमोगुण छाया रहेगा तो रोज ब्रह्मचर्य नष्ट होगा और साधक ब्रह्मचर्य संयम कदापि नहीं कर पायेगा । श्रीमद्भागवत में लिखा है –

आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च ।

ध्यानं मंत्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः ॥ (भा. ११/१३/४)

'शास्त्र, जल (खान-पान), प्रजा (संग), स्थान, समय, कर्म, जन्म, ध्यान, मंत्र और संस्कार – ये दस चीजें गुण परिवर्तन का हेतु हैं; ये यदि सात्त्विक हैं तो सत्त्वगुण की, राजस हैं तो रजोगुण की और यदि तामस हैं तो तमोगुण की अन्तःकरण में वृद्धि होती है ।

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