ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 54, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ेंपवित्र मन के द्वारा ही ब्रह्मचर्य सम्भव
एक मात्र विशुद्ध मन ही मनुष्य को ब्रह्मचारी एवं वीर्य धारण करने के लिए समर्थ बना सकता है और मन को शुद्ध करने के लिए सुयोग्य वैद्य हैं महात्माजन । बिना सत्पुरुषों की संगति के मन-बुद्धि पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं हो सकते हैं, इनकी शुद्धि तब मानी जाती है जब इनमें पूर्ण विवेक का प्रादुर्भाव हो जाय और विवेक की प्राप्ति एकमात्र सत्संग से ही होती है 'बिनु सत्संग बिबेक न होई ।' । अतः साधक को नित्य सत्संग करना चाहिए और सत्संग से प्राप्त विवेक के द्वारा शुद्ध हुआ मन वीर्यरक्षा के लिए दिव्यौषधि है । बाकी अन्य जितने ब्रह्मचर्य-संयम के उपाय हैं, वे अब आनुषंगिक हैं ।
इसलिए जो भी साधक (गृहस्थ या विरक्त) ब्रह्मचर्य धारण करना चाहता है तो उसे मन की शुद्धि पर बहुत ध्यान देना चाहिए, यदि मन अपवित्र है, कुसंस्कारों से युक्त है तो साधक ब्रह्मचारी रह ही नहीं सकता है । अतः ब्रह्मचर्य में सर्वाधिक आवश्यक है अध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा चित्त का परिवर्तन करना । हम बाहर से खान-पान आदि सब कुछ ठीक कर लें लेकिन चिन्तन यदि विषयों का बना हुआ है तो बहुत प्रयास करने पर भी हम ब्रह्मचर्य धारण करने में समर्थ नहीं हो पायेंगे, हम हार जायेंगे; ऐसा सैकड़ों प्रयासरत् साधकों का अनुभव है कि प्रयास करने पर भी हम सफल नहीं हो पाते हैं; हरि-गुरु आदि की सौगन्ध खाने पर भी हम सफल नहीं होते, तो इसका प्रधान कारण असत्-चिन्तन ही है ।
चिन्तन में हमारे यह बात दृढ़ता से बैठ गयी है कि इन्द्रियजल्प भोगों में बड़ा सुख है, यही जीवन का परम आनंद है । अब हम कुछ
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