भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 74 में से

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दिन तक तो किसी पूजनीय की सौगन्ध आदि खाकर के भले ही ब्रह्मचर्य को रोक सकते हैं लेकिन उससे ज्यादा वह नहीं रोका जा सकता है; क्योंकि विषयों के प्रति चित्त की महत्त्वबुद्धि बनी हुयी है । भगवान् ने गीता जी में भी यही बात कही है –

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।

रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ (२/५९,६०)

‘निराहार रहने वाले अर्थात् इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती है और आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ साधन परायण विद्वान् पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं अर्थात् उसे विषयों में गिरा देती हैं ।’ श्रीध्रुवदास जी महाराज ने भी कहा है –

रस बल छुटै न जौ विषय, सुख नहीं पावै कोइ ।

तन छोंड़े मन गहि रहै, दूनों दुख तहाँ होइ ॥

यदि चित्त से विषयासक्ति नष्ट नहीं हुई तो बाहर से विषय-सेवन त्याग देने पर भी साधक सुखी नहीं हो सकता ।

इसलिए आवश्यकता है हमें सत्संग के द्वारा चित्त में स्थित विषयासक्ति को नष्ट करने की अर्थात् चित्त का परिवर्तन करने की । भले ही हमारा भोजन सात्विक है, हम आसन-व्यायाम-प्राणायाम भी नियम से करते हैं किन्तु हमारा चिन्तन ठीक नहीं है तो हम विषय-संयोग होने पर उससे बच नहीं सकते हैं । हमारे मस्तिष्क में जो यह बात बैठी हुई है कि ‘स्त्री-शरीर में सुख है या स्त्री शरीरधारी साधिका

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