भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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सोचती है कि पुरुष शरीर में सुख है' – जब तक यह बात हमारी बुद्धि से नहीं निकलेगी तब तक हम बलात् इन्द्रियों एवं मन को कब तक रोक सकते हैं । मन से कितने समय तक लड़ सकते हैं, आखिरकार हमें परास्त होना ही पड़ेगा । वही बात आज सबके साथ हो रही है । अगर यह बात हम बुद्धि में बैठे लें कि विषय तो विष से भी ज्यादा विषैले, दुःखदायी, भय एवं अशांतिदायक हैं, तब विषयों से स्वाभाविक अरुचि होना संभव है । श्रीबिहारिन्देव जी महाराज कहते हैं –

सूकौ हाड़ हरखि गहै बिमुख विषै घर बात ।

लोहू अपने गाल को चाटि स्वानि इतरात ॥

‘जैसे कुत्ता सूखी हड्डी को चबाता है तो उसकी रगड़ से उसके अपने मसूड़े में से जो खून निकलता है, वह उसको चाटकर प्रसन्न होता है, इतराता है कि मुझे इस हड्डी में से रक्त पीने को मिल रहा है, ऐसे ही विषय सुख है, भोग में स्व जीवनी शक्ति का नाश करके भोगी पुरुष सोचता है कि स्त्री शरीर में सुख है, या स्त्री सोचती है कि पुरुष शरीर में सुख है ।’

श्रीबिहारी दास सुख विषय को ज्यों नख नैंक खुजाइ ।

बिस ब्यौरि सब अंग में पाछे पके पिराइ ॥

भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जू स्वयं गीता जी में कह रहे हैं –

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।

आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ (गी. ५/२२)

‘जितने इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषों को वे सुखरूप भासते हैं, किन्तु वे सब दुःखदायी और आदि-अन्तवाले अर्थात् अनित्य हैं । इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान विवेकी पुरुष उनमें रमण नहीं करते ।’

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