ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषयेन्द्रियसंयोगाद्यतदग्नेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ (गी. १८/३८)
‘जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से प्राप्त होता है, वह पहले भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होता है, पर परिणाम में वह विष के तुल्य है।’
अतः शास्त्रों के आधार पर अथवा सन्तों के अनुभव के आधार पर यह सुनिश्चित है कि विषयों में लेशमात्र भी सुख नहीं है, सुख तो एकमात्र सुखसिन्धु प्रभु में ही है ।
‘जो आनंद सिंधु सुखरासी । सीकर तं त्रैलोक सुपासी ॥’
‘एतस्यैवानन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥’
अगर ऐसी दृढ़ धारणा बन जाए तो काम का जड़मूल से नाश हो सकता है अन्यथा असंभव है क्योंकि हमारा मन ये मान बैठा है कि विषयों में सुख है, इसलिए हम बार-बार विषयों से पराजित हो जाते हैं । अगर ये बात अभी मन में बैठ जाए कि आनंदसिन्धु तो प्रभु हैं, उन्हीं में सुख है तो सारे विषय स्वतः ही सारहीन और विषवत् प्रतीत होने लगेंगे । गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी कह रहे हैं –
जो मोहि राम लागते मीठे ।
तो नवरस षट्तरस रस अनरस, है जाते सब सीठे ॥
श्रीनारायणस्वामी जी के भी वचन हैं –
ब्रह्मादिक के भोग सुख विष सम लागत ताहि ।
नारायन ब्रज-चन्द्र की लगन लगी है जाहि ॥
श्रीपादप्रबोधानंदसरस्वती जी कह रहे हैं कि यदि श्रीकिशोरीजी के चरणों में उपासक का मन लग जाय तो भगवान् के मोहनी अवतार में भी सामर्थ्य नहीं, जो ऐसे उपासक के मन में क्षोभ पैदा कर सके ।
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